Indian Railways: ट्रेन के टॉयलेट की बदबू से बेहाल यात्री, CAG रिपोर्ट ने खोली रेलवे की सफाई व्यवस्था की पोल, करोड़ों का बजट फिर भी हाल बेहाल

Indian Railways: लंबे रेल सफर में टॉयलेट यात्रियों के लिए सुविधा से ज्यादा मजबूरी बनता जा रहा है। सफर के दौरान जरूरत पड़ने पर जिस टॉयलेट को यात्री राहत की जगह मानता है, वही अब बदबू, गंदगी और जलभराव के कारण परेशानी का सबब बन रहा है। ...

ट्रेन के टॉयलेट की बदबू से बेहाल यात्री- फोटो : Hiresh Kumar

Indian Railways: लंबे रेल सफर में टॉयलेट यात्रियों के लिए सुविधा से ज्यादा मजबूरी बनता जा रहा है। सफर के दौरान जरूरत पड़ने पर जिस टॉयलेट को यात्री राहत की जगह मानता है, वही अब बदबू, गंदगी और जलभराव के कारण परेशानी का सबब बन रहा है। नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक यानी CAG की ताजा रिपोर्ट ने रेलवे की सफाई व्यवस्था और बायो-टॉयलेट के रखरखाव पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक ट्रेनों में ऑन-बोर्ड सफाई व्यवस्था से करीब 50 फीसदी यात्री असंतुष्ट मिले। सर्वे में 40 फीसदी से ज्यादा यात्रियों ने टॉयलेट में बदबू और जलभराव को लेकर नाराजगी जताई। वहीं 50 फीसदी से अधिक यात्री ऑन-बोर्ड हाउसकीपिंग यानी OBHS सेवाओं और सफाई कर्मचारियों की अनुपस्थिति से परेशान पाए गए।यानी रेलवे की चमचमाती ट्रेनों और आधुनिक सुविधाओं के दावों के बीच टॉयलेट की जमीनी हकीकत यात्रियों को खासी तकलीफ दे रही है।

CAG की रिपोर्ट में सबसे बड़ा सवाल बजट के इस्तेमाल को लेकर उठाया गया है। रेलवे हर साल स्वच्छता और रखरखाव के लिए भारी-भरकम राशि आवंटित करता है, लेकिन ऑडिट टीम को यह स्पष्ट करने वाला पारदर्शी लेखा-जोखा नहीं मिल सका कि सफाई पर वास्तव में कितना पैसा खर्च हुआ और कितनी राशि इस्तेमाल ही नहीं हो पाई।CAG ने ठेकेदारों की जवाबदेही को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। नियमों का उल्लंघन होने पर जुर्माना लगाने और भुगतान से राशि काटने की कार्रवाई का कोई पारदर्शी केंद्रीय डाटा रेलवे के पास नहीं मिला। रेलवे ने कार्रवाई किए जाने का दावा जरूर किया, लेकिन ऑडिट टीम को इसके पर्याप्त साक्ष्य और कुल जुर्माने की राशि का रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराया जा सका।ऐसे में CAG की रिपोर्ट ने रेलवे की सफाई व्यवस्था पर सिर्फ गंदगी का सवाल नहीं उठाया, बल्कि बजट, निगरानी, ठेकेदारों की जवाबदेही और वित्तीय पारदर्शिता पूरी व्यवस्था पर सवालिया निशान लगा दिया है। 

रिपोर्ट में बजटीय आंकड़ों और वित्तीय कार्रवाई के रिकॉर्ड को लेकर गंभीर अनियमितता की ओर इशारा किया गया है। यानी पैसा आवंटित होने के बावजूद उसकी जमीनी तस्वीर और खर्च का हिसाब सवालों के घेरे में है।ट्रेनों की सफाई व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए ऑटोमेटिक कोच वाशिंग प्लांट (ACWP) जैसी परियोजनाएं शुरू की जानी थीं, लेकिन इनके समयबद्ध क्रियान्वयन की स्थिति बेहद खराब रही। रिपोर्ट के अनुसार निर्धारित परियोजनाओं का समय पर कार्यान्वयन शून्य प्रतिशत रहा। झांसी और ग्वालियर जैसे महत्वपूर्ण स्टेशनों के लिए बजट उपलब्ध होने के बावजूद परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ सकीं।करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद अगर यात्री बदबूदार और जलभराव वाले टॉयलेट से जूझ रहे हैं, तो रेलवे के स्वच्छता दावों और जमीनी हकीकत के बीच की खाई साफ दिखाई देती है।