Monsoon Session: छात्रों पर बैलेट गन चली तो बदल गया सियासी खेल, दो-तिहाई बहुमत की ओर बढ़ते एनडीए को लगा झटका, विपक्षी एकजुटता ने सरकार को बैकफुट पर धकेला

विपक्ष ने अयोध्या के राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी और दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को बड़ा सियासी हथियार बना लिया।इस इस हथियार के आगें सरकार की एक नहीं चली....

विपक्षी एकजुटता ने केंद्र सरकार को बैकफुट पर धकेला- फोटो : social Media

Monsoon Session: संसद का मानसून सत्र गुरुवार, 13 अगस्त 2026 को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया, लेकिन इस बार सदन की कार्यवाही से ज्यादा सियासी घमासान सुर्खियों में रहा। लोकसभा में महज 19 फीसदी और राज्यसभा में करीब 39 फीसदी कामकाज हो सका। सबसे अहम बात यह रही कि पूरे सत्र में एक भी दिन प्रश्नकाल और शून्यकाल नहीं चल सका। यानी जिन मंचों से सरकार से जवाब-तलब और जनहित के सवाल उठने थे, वे लगातार हंगामे और नारेबाजी की भेंट चढ़ गए।

विपक्ष ने अयोध्या के राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी और दिल्ली में प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई को बड़ा सियासी हथियार बना लिया। विपक्षी सांसद गृह मंत्री अमित शाह के बयान की मांग पर अड़े रहे। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सुलह-सफाई की तमाम कोशिशें हुईं, लेकिन कोई साझा जमीन नहीं बन सकी। नतीजा यह हुआ कि संसद का पहिया बार-बार स्थगन के दलदल में फंसता रहा।

सत्र की शुरुआत में विपक्ष मनोवैज्ञानिक दबाव में जरूर दिखाई दे रहा था, लेकिन छात्रों के प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई ने सियासी समीकरण पलट दिए। कांग्रेस की अगुवाई में विपक्ष ने मोर्चाबंदी मजबूत की और सरकार को बैकफुट पर ला दिया। बिहार के बांकीपुर और मध्य प्रदेश के दतिया उपचुनाव में भाजपा की शिकस्त ने भी विपक्ष के हौसले बुलंद कर दिए।इसी दबाव का असर महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे अहम विधेयकों पर भी दिखा। सरकार ने इन मुद्दों को आगे बढ़ाने से परहेज किया, जबकि एफसीआरए संशोधन विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति के हवाले करना पड़ा। विकसित भारत शिक्षा अधिष्ठान विधेयक पर भी व्यापक बहस पूरी नहीं हो सकी।

तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के बीच राजनीतिक तनातनी के बावजूद डीएमके विपक्षी खेमे से अलग होती नहीं दिखी। नीट, कावेरी जल समझौते और वंदे मातरम् बिल जैसे मुद्दों पर उसके तेवर तल्ख रहे। डीएमके सांसद कनिमोझी ने वंदे मातरम् बिल को राष्ट्रवाद की आड़ में छिपा हिंदुत्व एजेंडा बताया।

सत्र की सबसे बड़ी सियासी उपलब्धि विपक्ष के लिए यह रही कि कांग्रेस, सपा और अन्य दलों ने मुद्दों के आधार पर तालमेल कायम रखा। चढ़ावा चोरी के मुद्दे पर सपा आगे रही तो कांग्रेस ने उसका साथ दिया। छात्रों के मुद्दे पर कांग्रेस ने मोर्चा संभाला और पूरा विपक्ष उसके पीछे खड़ा हो गया। सरकार की कोशिशों के बावजूद यह एकजुटता टूट नहीं सकी।

हालांकि विपक्ष के सामने अब असली इम्तिहान इन मुद्दों को संसद से बाहर लंबे समय तक जिंदा रखने का है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक चढ़ावा चोरी का मुद्दा कायम रखना आसान नहीं होगा। दूसरी ओर कांग्रेस छात्र आंदोलन और पुलिस कार्रवाई को जिला स्तर तक ले जाने की रणनीति बना रही है।

राज्यसभा में भी हालात कमोबेश ऐसे ही रहे। पूरे सत्र में सदन केवल 37 घंटे 21 मिनट चला और उत्पादकता करीब 39 फीसदी रही। सभापति सीपी राधाकृष्णन ने लगातार व्यवधान पर चिंता जताते हुए कहा कि इससे राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर सार्थक चर्चा के लिए उपलब्ध समय का नुकसान हुआ।कुल मिलाकर मानसून सत्र कानून बनाने से ज्यादा सत्ता और विपक्ष की सियासी रस्साकशी का अखाड़ा बनकर रह गया। सरकार जहां विपक्षी हंगामे को संसद की कार्यवाही में बाधा बताती रही, वहीं विपक्ष ने इसे सरकार को कठघरे में खड़ा करने का मौका बनाया। अब सवाल यही है कि संसद में थमा यह सियासी तूफान क्या आने वाले यूपी चुनावी मैदान में और तेज होगा?