UGC के नए नियमों पर फिर होगा मंथन, केंद्र सरकार बनाएगी विशेष समिति, सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

UGC ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए नए नियम अधिसूचित किए थे। इनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई और वंचित समूहों के लिए बेहतर संस्थागत व्यवस्था तैयार करना था।

UGC 2026 Regulations- फोटो : news4nation

विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में समानता और जातिगत भेदभाव से जुड़े UGC के नए नियमों को लेकर केंद्र सरकार एक बार फिर समीक्षा की तैयारी में है। केंद्र ने गुरुवार, 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट को बताया कि वह विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के 2026 के इक्विटी रेगुलेशंस पर दोबारा विचार करने के लिए एक विशेष समिति गठित करने पर विचार कर रही है।


केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ को बताया कि सरकार विद्यार्थियों की चिंताओं को दूर करना चाहती है। कोशिश है कि नए नियमों के तहत किसी भी वर्ग के छात्र को उपेक्षित, असुरक्षित या आशंकित महसूस न हो। सरकार नई पीढ़ी के हितों को ध्यान में रखकर इस पूरे ढांचे की समीक्षा कर रही है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि नियमों का उद्देश्य सभी विद्यार्थियों के हितों की रक्षा करना होना चाहिए। किसी एक वर्ग की चिंता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अदालत ने केंद्र को नियमों पर फिर से विचार करने की सलाह दी। इसके बाद मामले की सुनवाई चार सप्ताह के लिए टाल दी गई। 

 


जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी रोक

UGC ने 13 जनवरी 2026 को उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के लिए नए नियम अधिसूचित किए थे। इनका उद्देश्य विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों पर कार्रवाई और वंचित समूहों के लिए बेहतर संस्थागत व्यवस्था तैयार करना था।


हालांकि, नियमों के कुछ प्रावधानों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गईं। 29 जनवरी 2026 को सुनवाई के दौरान अदालत ने इन नियमों के प्रावधानों को प्रथम दृष्टया अस्पष्ट और दुरुपयोग की आशंका वाला बताया था। अदालत ने कहा था कि ऐसे प्रावधानों के सामाजिक स्तर पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसके बाद कोर्ट ने 2026 के नियमों के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी और स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई तक UGC के 2012 के नियम लागू रहेंगे। 

 

किन प्रावधानों पर उठे थे सवाल?

विवाद का एक प्रमुख मुद्दा 2026 के नियमों में जातिगत भेदभाव की परिभाषा और शिकायत निवारण व्यवस्था को लेकर है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नियमों के तहत जातिगत भेदभाव की परिभाषा में अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के विद्यार्थियों को विशेष रूप से शामिल किया गया है, जबकि सामान्य वर्ग के विद्यार्थियों को समान शिकायत निवारण सुरक्षा नहीं मिलती। याचिकाकर्ताओं ने यह भी आशंका जताई कि नियमों का दुरुपयोग हो सकता है और झूठी शिकायतों से प्रभावित विद्यार्थियों के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था नहीं है। दूसरी ओर, नए नियमों के समर्थकों का तर्क है कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था जरूरी है। 

 


नए नियमों में क्या व्यवस्था की गई थी?

UGC के 2026 के नियमों के तहत विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और डीम्ड यूनिवर्सिटी में समान अवसर केंद्र (Equal Opportunity Centres) और इक्विटी कमेटियों के गठन का प्रावधान किया गया था। इनका उद्देश्य भेदभाव से जुड़ी शिकायतों पर विचार करना, प्रभावित विद्यार्थियों को सहायता देना और शिक्षण संस्थानों में समानता का माहौल सुनिश्चित करना था। नियमों में संस्थानों के लिए निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था भी रखी गई थी। नियमों का पालन नहीं करने वाले संस्थानों पर UGC की योजनाओं और अनुदान से जुड़ी कार्रवाई का प्रावधान था। 

 


रोहित वेमुला और पायल तड़वी मामले से जुड़ा है विवाद

इस पूरे मामले की पृष्ठभूमि वर्ष 2019 में दाखिल एक याचिका से जुड़ी है। रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं ने उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के लिए मजबूत व्यवस्था बनाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। दोनों विद्यार्थियों की मौत के बाद कैंपस में कथित जातिगत उत्पीड़न का मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आया था। इसी पृष्ठभूमि में UGC ने 2012 के पुराने नियमों की जगह जनवरी 2026 में नया इक्विटी रेगुलेशन अधिसूचित किया था। अब सुप्रीम कोर्ट की आपत्तियों के बाद केंद्र सरकार इस ढांचे की समीक्षा की तैयारी कर रही है। 

 

फिलहाल 2026 के नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की रोक बरकरार है और 2012 के नियम ही लागू हैं। केंद्र सरकार की ओर से समिति गठित करने पर विचार की जानकारी दी गई है, लेकिन समिति के गठन और उसकी संरचना का औपचारिक विवरण अभी सामने नहीं आया है। चार सप्ताह बाद होने वाली सुनवाई में इस दिशा में आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।