संभल हिंसा मामले में मुल्ला अफरोज की NSA हिरासत रद्द, सुप्रीम कोर्ट ने UP की भाजपा सरकार पर लगाया ₹10 लाख जुर्माना
संभल हिंसा से जुड़े मामले में उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ सरकार को बड़ा झटका लगा है. सुप्रीम कोर्ट ने न सिर्फ इस हिंसा मामले में NSA का सामना कर रहे मुल्ला अफरोज को राहत दी है बल्कि यूपी सरकार पर 10 लाख का जुर्माना भी लगाया है
संभल हिंसा मामले में आरोपी मुल्ला अफरोज को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने उसके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत जारी हिरासत आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। मामला नवंबर 2024 में शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा से जुड़ा है, जिसमें चार लोगों की मौत हुई थी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने कहा कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को किसी व्यक्ति के खिलाफ निवारक हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि यदि घटना के पहले दिन से सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध थे, तो अफरोज की गिरफ्तारी में करीब 54 दिन की देरी क्यों हुई।
कबूलनामे को बनाया गया था आधार
मामले में अफरोज को जनवरी 2025 में गिरफ्तार किया गया था। उपलब्ध अदालती रिकॉर्ड के मुताबिक, पुलिस ने उसके खिलाफ दर्ज कुछ मामलों में कथित पुलिस-कस्टडी कबूलनामे को जांच का महत्वपूर्ण आधार बताया था। हालांकि, याचिकाकर्ता की ओर से इस कबूलनामे की स्वीकार्यता पर सवाल उठाए गए थे।
बाद में 13 अक्टूबर 2025 को संभल के जिलाधिकारी ने NSA की धारा 3(2) के तहत अफरोज के खिलाफ हिरासत आदेश जारी किया। राज्य सरकार ने दलील दी थी कि रिहा होने पर उसके दोबारा ऐसी गतिविधियों में शामिल होने और सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित करने की आशंका थी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में इस चुनौती को खारिज कर दिया था, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने उठाए थे सवाल
8 सितंबर को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने खास तौर पर यह सवाल उठाया था कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर NSA के तहत किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने के लिए जरूरी ‘subjective satisfaction’ कैसे कायम की जा सकती है। इसके बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
अफरोज की ओर से यह भी दलील दी गई थी कि उसके खिलाफ पुलिस के पास शुरुआत में प्रत्यक्ष या इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नहीं थे। वहीं उत्तर प्रदेश सरकार ने हाईकोर्ट के समक्ष दावा किया था कि जांच में उसके खिलाफ पर्याप्त सामग्री मिली थी और उसकी गतिविधियों से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित हुई थी।