Bihar News : हाँ, मैं जिन्दा हूँ...सबूत लेकर दफ्तरों के चक्कर लगा रहा भोजपुर का मुन्ना प्रसाद, विकास मित्र की गलती से बना ‘भूत’

ARA : बिहार के भोजपुर जिले में सरकारी तंत्र की एक ऐसी लापरवाही सामने आई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक सतर्कता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। बड़हरा प्रखंड के महुदही गांव निवासी मुन्ना प्रसाद को सरकारी रिकॉर्ड में 'मृत' घोषित कर दिया गया है, जबकि वे हकीकत में जीवित हैं। अक्टूबर 2025 में एक विकास मित्र की कथित रिपोर्ट के आधार पर उन्हें कागजों पर मृत दिखा दिया गया, जिसके बाद से वे अपनी ही पहचान और अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं।

सरकारी दफ्तरों की चौखट पर न्याय की गुहार

कागजों में मृत घोषित होने के कारण मुन्ना प्रसाद को पिछले कई महीनों से भारी मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना झेलनी पड़ रही है। वे बड़हरा प्रखंड कार्यालय से लेकर जिला मुख्यालय आरा तक के दर्जनों चक्कर काट चुके हैं। अपने 'जीवित' होने का प्रमाण हाथ में लेकर वे हर उस अधिकारी के पास पहुंचे जो उन्हें सरकारी फाइलों में वापस 'जिंदा' कर सके, लेकिन महीनों बीत जाने के बाद भी प्रशासन की नींद नहीं खुली है।

अधिकारों और योजनाओं से हुए वंचित

सरकारी रिकॉर्ड में मौत दर्ज हो जाने का सीधा असर मुन्ना प्रसाद के अधिकारों पर पड़ा है। 'मृत' होने के कारण उन्हें सरकार द्वारा मिलने वाली विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं और सुविधाओं से वंचित कर दिया गया है। उनके राशन कार्ड से लेकर अन्य महत्वपूर्ण पहचान पत्रों पर भी इसका संकट मंडरा रहा है। मुन्ना का कहना है कि एक गलत रिपोर्ट ने उन्हें जीते-जी एक ऐसी स्थिति में ला दिया है जहाँ उन्हें खुद को इंसान साबित करने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

एसडीएम कार्यालय में लगाई गुहार

सोमवार दोपहर करीब 1 बजे मुन्ना प्रसाद एक बार फिर उम्मीद के साथ भोजपुर एसडीएम कार्यालय पहुंचे। अपने सभी जरूरी दस्तावेजों के साथ उन्होंने अधिकारियों के समक्ष पेश होकर गुहार लगाई कि वे जिंदा हैं और उनके साथ हुए इस अन्याय को सुधारा जाए। उन्होंने कहा कि महीनों की भागदौड़ के बावजूद अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है, जिससे वे बेहद हताश और निराश महसूस कर रहे हैं।

प्रशासनिक लापरवाही पर उठते सवाल

यह मामला न केवल बड़हरा प्रखंड के प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही को उजागर करता है, बल्कि यह भी बताता है कि जमीनी स्तर पर डेटा का सत्यापन कितना कमजोर है। सवाल यह है कि बिना किसी ठोस डॉक्टरी प्रमाण या भौतिक सत्यापन के किसी व्यक्ति को मृत कैसे घोषित कर दिया गया? अब देखना यह है कि मुन्ना प्रसाद की इस गुहार के बाद क्या भोजपुर प्रशासन अपनी गलती सुधारता है या एक जिंदा व्यक्ति को अपनी मौत के कागजों के साथ ही जीना होगा।

आशीष की रिपोर्ट