Bihar Inspirational story: दृष्टिहीन प्रशांत ने 80 फीसदी अंकों से रचा इतिहास, सपने आंखों से नहीं, हौसलों से देखे जाते हैं,प्रशांत ने कर दिखाया,ये कहानी पढ़कर आपकी आंखें नम हो जाएंगी

Bihar Inspirational story: ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है। इक़बाल का ये शेर एक दृष्टिहीन छात्र पर सटीक बैठता है।

प्रशांत की कहानी रुला भी देगी, जगा भी देगी- फोटो : reporter

Bihar Inspirational story: ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है… अल्लामा इक़बाल का ये शेर आज बिहार के दरभंगा और बेगूसराय की मिट्टी में सच होता नजर आया। एक ऐसा अफसाना, जहां अंधेरों ने हार मानी और हौसलों ने उजाले की नई दास्तान लिख दी।

ये कहानी है बेगूसराय के मटिहानी क्षेत्र के शाहपुर गांव के रहने वाले 18 वर्षीय प्रशांत कुमार सिंह की, जिसकी आंखों की रौशनी तो 2017 में ही बुझ गई थी, लेकिन उसके ख्वाबों का सूरज कभी डूबा नहीं। महज 9 साल की उम्र में Retinitis Pigmentosa जैसी लाइलाज बीमारी ने उसकी दुनिया को अंधेरे में धकेल दिया। घर में मातम सा माहौल था, मां ममता कुमारी की आंखों से आंसुओं का सैलाब थमने का नाम नहीं ले रहा था, क्योंकि उनका इकलौता चिराग अचानक अंधेरे में खो गया था।

मगर कहते हैं ना जहां चाह, वहां राह। प्रशांत के लिए ये राह बनी उसकी बहन मुस्कान,जो खुद NEET की तैयारी कर रही है। मुस्कान ने सिर्फ बहन का फर्ज नहीं निभाया, बल्कि अपने भाई की तीसरी आंख बन गई। उसकी आवाज़, उसकी किताबें, उसका सहारा  सब कुछ बनकर उसने प्रशांत के टूटे हौसलों को फिर से उड़ान दी।

प्रशांत ने हार मानने से इंकार कर दिया। उसने वॉइस टाइपिंग के जरिए पढ़ाई शुरू की, ऑनलाइन क्लासेस लीं और जब दिल भारी होता, तो गिटार की धुनों में अपनी रूह को सुकून देता। उसके हर सुर में एक दर्द भी था और एक उम्मीद भी। 2026 में जब उसने 10वीं बोर्ड परीक्षा में बैठने की जिद ठानी, तो ये सिर्फ एक ख्वाब नहीं बल्कि एक चुनौती थी  सिस्टम के लिए भी और हालात के लिए भी। स्कूल प्रशासन ने पहल की, दरभंगा के शिक्षा अधिकारियों से अनुमति मांगी, और आखिरकार जिला प्रशासन के सहयोग से उसे एक राइटिंग हेल्पर  आठवीं के छात्र रामा  के साथ परीक्षा देने की इजाजत मिल गई।

परीक्षा के दौरान एक अनोखा नजारा देखने को मिला   प्रशांत सवाल सुनता, जवाब सोचता और रामा उसे कागज पर उतारता। वहां मौजूद अधिकारी भी इस जज्बे को देखकर हैरान रह गए। ये सिर्फ एक परीक्षा नहीं थी, ये इरादों की जीत का एलान था। और जब रिजल्ट आया  तो हर आंख नम थी, हर दिल गर्व से भर गया। प्रशांत ने करीब 80 फीसदी अंक हासिल कर ना सिर्फ अपने स्कूल और परिवार, बल्कि पूरे बेगूसराय और दरभंगा का नाम रौशन कर दिया। 

वहीं नेत्रहीन प्रशांत के इस जज्बे की जानकारी जब बेगूसराय जिलाधिकारी श्री कांत शास्त्री को लगी तो उन्होंने फौरन बेगूसराय शिक्षा विभाग को सम्मानित करने का निर्देश दिया। जिसके बाद बेगूसराय DEO ने प्रशांत से बात की और उनसे एग्जाम्स के बारे में पूछा फिर उन्हें सम्मानित किया। ये सम्मान छात्र का नहीं पूरे शिक्षा विभाग का था।शिक्षिका मां के सपनों को बेटे ने उड़ान तोदे हीं दिया था।

आज प्रशांत ये साबित कर चुका है कि सपने आंखों से नहीं, दिल से देखे जाते हैं। उसकी कहानी सिर्फ एक खबर नहीं, बल्कि एक पैगाम है  कि अगर हौसले बुलंद हों, तो तकदीर भी झुककर पूछती है, बता तेरी रज़ा क्या है…

बेगूसराय से अजय शास्त्री की रिपोर्ट