Bihar News : नवगछिया का 423 साल पुराना तेतरी दुर्गा मंदिर, चमत्कारिक मेढ़ और एक सपने से जुड़ी है इस ऐतिहासिक शक्तिपीठ की स्थापना की कहानी

Bihar News : बिहार की पावन भूमि पर आस्था, श्रद्धा और चमत्कारों से जुड़ी अनगिनत गाथाएं फैली हुई हैं। इन्हीं में से एक भागलपुर के नवगछिया अनुमंडल अंतर्गत तेतरी गांव का प्रसिद्ध 'शक्तिपीठ देवी दुर्गा मंदिर' है.....पढ़िए आगे

423 साल पुराना तेतरी दुर्गा मंदिर- फोटो : SOCIAL MEDIA

BHAGALPUR : बिहार की धरती पर शक्ति की भक्ति और चमत्कारों की अनगिनत कहानियां बिखरी पड़ी हैं। इनमें से एक सबसे अनूठी और ऐतिहासिक कहानी नवगछिया के तेतरी गांव स्थित 'शक्तिपीठ देवी दुर्गा मंदिर' की है। 423 साल पुराने इस मंदिर में विराजमान मां दुर्गा की प्रतिमा केवल मिट्टी की मूरत नहीं है, बल्कि यह ग्रामीणों के उस गहरे विश्वास का प्रतीक है, जिसकी शुरुआत 1600 ईसवी में आए एक चमत्कारिक स्वप्न से हुई थी। आज भी यह मंदिर अपनी भव्यता और उस मेढ़ के चमत्कार के लिए लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र है।

एक स्वपन, एक मेढ़ और मंदिर की स्थापना की चमत्कारिक कहानी

तेतरी शक्तिपीठ के इतिहास की कहानी जितनी पुरानी है, उतनी ही रोचक भी, मेला समिति के मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1600 में की गई थी। एक बार तेतरी गांव के लोगों को रात में स्वपन आया कि पास की कलबलिया धार में एक मेढ़ बहकर आया है, उस मेढ़ पर मां दुर्गा की प्रतिमा बनाकर पूजा-अर्चना शुरू करो। सुबह होते ही जब ग्रामीण कलबलिया धार पहुंचे, तो सच में वहां एक मेढ़ पड़ा हुआ था। पांच-छह ग्रामीणों ने मिलकर उस मेढ़ को उठाया और तेतरी की ओर चल पड़े। रास्ते में थकावट होने पर, जिस जगह पर आज मंदिर है, ग्रामीणों ने मेढ़ को नीचे रख दिया और विश्राम करने लगे।

जब खरीक के लोगों से नहीं उठा मेढ़

तभी वहां खरीक प्रखंड के काजीकौरेया गांव के कुछ लोग अपना खोया हुआ मेढ़ खोजते हुए पहुंच गए। उन्होंने तेतरी के लोगों से कहा कि यह मेढ़ उनका है। तेतरी के लोग खुशी-खुशी मेढ़ वापस करने को तैयार हो गए। लेकिन चमत्कार तब हुआ जब काजीकौरेया के लोगों ने मेढ़ को उठाने की कोशिश की। कई लोगों के जोर लगाने के बाद भी वह मेढ़ तनिक भी नहीं हिला।अंत में हार मानकर वे लोग खाली हाथ अपने गांव लौट गए। इसके बाद तेतरी के ग्रामीणों ने सोचा कि मेढ़ को गांव के बीचो-बीच ले जाकर स्थापित किया जाए, लेकिन उनके लाख प्रयास करने के बाद भी वह मेढ़ अपनी जगह से 'टस से मस' नहीं हुआ। इसे मां दुर्गा का स्पष्ट संकेत और इच्छा मानकर, उसी स्थान पर वह मेढ़ स्थापित कर दिया गया और एक भव्य मंदिर का निर्माण हुआ।

पूर्णिया के टिकापट्टी परिवार से जुड़ा है मूर्तिकला का इतिहास

इस मंदिर की एक और सबसे बड़ी खासियत यहां की प्रतिमा है। मान्यता है कि मां के निर्देशानुसार ही यहां प्रतिमा स्थापित की जाती है। वर्षों से पूर्णिया जिले के टिकापट्टी परिवार के एक ही वंश के कलाकार पीढ़ी दर पीढ़ी इस मंदिर में मां की प्रतिमा बनाते आ रहे हैं। यह परंपरा आज भी कायम है। तेतरी शक्तिपीठ में आज भी लोगों की वैसी ही अटूट आस्था है, जैसी सदियों पहले थी। नवरात्र के दौरान यहां लगने वाला भव्य मेला और श्रद्धालुओं की भीड़ इस बात का सबूत है। 

स्थानीय बताते हैं 

स्थानीय निवासी रोहित राज बताते है, "यह सिर्फ एक मंदिर नहीं है, यह हमारे तेतरी गांव का गौरव और रक्षक है। हमारे पूर्वजों ने जो चमत्कार देखा, उसे हम आज भी महसूस करते हैं। जब नवरात्रि आती है, तो पूरा इलाका मां की भक्ति में डूब जाता है। यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है।"स्थानीय निवासी संतोष कुमार का कहना है, "तेतरी शक्तिपीठ का इतिहास हमें अपने पूर्वजों और मां की शक्ति से जोड़ता है। सबसे ज्यादा भावुक करने वाला पल विजयादशमी का होता है। उस दिन मां की भव्य प्रतिमा को गाड़ी से नहीं, बल्कि लाखों श्रद्धालुओं द्वारा अपने कंधों पर उठाकर कलबलिया नदी तक विसर्जन के लिए ले जाया जाता है, उस समय हर आंख नम होती है।" तेतरी का यह दुर्गा मंदिर यह साबित करता है कि जब आस्था और विश्वास का जन्म किसी ईश्वरीय संकेत से होता है, तो वह 400 साल बाद भी वैसा ही अडिग रहता है, जैसा वह चमत्कारिक मेढ़ था।