Bihar Rail Connectivity: 32 साल बाद पटरी पर लौटी सियासी फाइल, अलौली-कुशेश्वरस्थान परियोजना के लिए निकला टेंडर, रेलवे ने खोल दिया खजाना

Bihar Rail Connectivity: बिहार की सियासत में लंबे अरसे से धूल खा रही एक अहम रेल परियोजना अब आखिरकार पटरी पर उतरती नजर आ रही है.

32 साल बाद पटरी पर लौटी सियासी फाइल- फोटो : social Media

Bihar Rail Connectivity: बिहार की सियासत में लंबे अरसे से धूल खा रही एक अहम रेल परियोजना अब आखिरकार पटरी पर उतरती नजर आ रही है. अलौली से चेरा खेड़ा के बीच करीब 4.5 किलोमीटर लंबी नई ब्रॉड गेज रेल लाइन बिछाने की कवायद शुरू कर दी गई है. रेलवे महकमे ने इस हिस्से के निर्माण के लिए 211.41 करोड़ रुपये का टेंडर जारी कर दिया है. यह हिस्सा अलौली से कुशेश्वरस्थान तक प्रस्तावित बड़ी रेल परियोजना का अहम कड़ी माना जा रहा है.

रेलवे के आला अफसरों के मुताबिक, अलौली से कुशेश्वरस्थान तक रेल लाइन और पुल निर्माण के लिए पहले ही 1384.16 करोड़ रुपये की मंजूरी मिल चुकी है. सरकार और रेलवे का दावा है कि इस पूरे प्रोजेक्ट को दिसंबर 2028 तक मुकम्मल कर लिया जाएगा. हालांकि, स्थानीय सियासी हलकों में यह चर्चा भी तेज है कि क्या यह डेडलाइन वाकई पूरी हो पाएगी या फिर यह भी कई सरकारी वादों की तरह फाइलों में ही कैद रह जाएगी.

दिलचस्प बात यह है कि शुरुआत में इस रेल परियोजना की लंबाई 42.308 किलोमीटर तय की गई थी, लेकिन बाद में तकनीकी और प्रशासनिक वजहों से इसे संशोधित कर 40.953 किलोमीटर कर दिया गया. फिलहाल अलौली से चेरा खेड़ा के बीच निर्माण की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है, जबकि चेरा खेड़ा से कुशेश्वरस्थान तक के हिस्से के लिए भी जल्द टेंडर और कॉन्ट्रैक्ट जारी होने की उम्मीद जताई जा रही है.

यह रेल लाइन खगड़िया और दरभंगा जिलों से होकर गुजरेगी, जिससे इलाके की आवाजाही और तिजारत को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है. पूरे प्रोजेक्ट के लिए करीब 301 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है और जमीन अधिग्रहण का अमल भी फेज वाइज तरीके से जारी है.

इस परियोजना की सबसे बड़ी चुनौती बाढ़ प्रभावित इलाका है. अलौली से आगे करीब 15 किलोमीटर का हिस्सा करेह, कोसी और कमला बलान नदियों के तटबंधों के पास से गुजरता है. यहां हर साल बाढ़ और कटाव का खतरा रहता है, इसलिए पुल और तटबंधों का डिजाइन जल विशेषज्ञों की राय के बाद तैयार किया गया है.गौरतलब है कि इस रेल लाइन का प्रस्ताव पहली बार 1996–97 में सामने आया था, जब इसकी लागत महज 78.21 करोड़ रुपये आंकी गई थी. लेकिन वक्त के साथ फाइलों में हुए संशोधन और महंगाई के असर ने इसकी लागत को बढ़ाकर 1384.16 करोड़ रुपये तक पहुंचा दिया. अब देखना यह है कि तीन दशक बाद शुरू हुई यह परियोजना कब तक सियासत के वादों से निकलकर हकीकत की पटरी पर दौड़ती है.