Bihar Politics: दरभंगा में बदला सियासी मिजाज, ब्राह्मणों ने BJP से बनाई दूरी, RJD की जीत में छिपी MY समीकरण की चिंता, पढ़िए इनसाइड स्टोरी
Bihar Politics: दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनावी नतीजे ने बिहार की सियासत में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। ...
Bihar Politics: दरभंगा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनावी नतीजे ने बिहार की सियासत में कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को करारा झटका लगा है, वहीं जीत हासिल करने के बावजूद राष्ट्रीय जनता दल के लिए भी नतीजे पूरी तरह राहत देने वाले नहीं हैं। मिथिलांचल में लंबे अरसे से भाजपा और एनडीए के मजबूत समर्थक माने जाने वाले ब्राह्मण मतदाताओं का राजद प्रत्याशी अनिल झा के पक्ष में खुलकर लामबंद होना सियासी तौर पर अहम संकेत माना जा रहा है।
दरअसल, चुनाव प्रचार के दौरान राजद कार्यकर्ताओं ने यूजीसी बिल के मुद्दे को ब्राह्मण मतदाताओं के बीच जोर-शोर से उठाया। इस मुद्दे ने समुदाय के एक हिस्से को प्रभावित किया और भाजपा के परंपरागत वोट बैंक में सेंधमारी होती दिखाई दी। ब्राह्मणों का यह रुख भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय बन सकता है। हालांकि, इस समर्थन के बावजूद अनिल झा को मतगणना के शुरुआती दौर में कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। प्रथम वरीयता के मतों की गिनती में वह लगातार पिछड़ते रहे।इसकी बड़ी वजह मुस्लिम और यादव मतों का बिखराव माना जा रहा है। राजद का परंपरागत एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण इस चुनाव में पूरी तरह एकजुट नजर नहीं आया।
जनसुराज ने बिगाड़ा राजद का चुनावी गणित
प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी ने मुस्लिम प्रत्याशी मोहम्मद इम्तियाज को मैदान में उतारकर राजद के सामने नई चुनौती पेश कर दी। इम्तियाज को मुस्लिम मतदाताओं का अच्छा समर्थन मिला और उन्हें प्रथम वरीयता के 10 हजार से अधिक वोट प्राप्त हुए। दिलचस्प बात यह रही कि अंतिम दौर में इन्हीं के बैलेट पर मिले द्वितीय वरीयता के मतों ने अनिल झा की जीत का रास्ता साफ किया।इससे साफ है कि जनसुराज ने जहां राजद के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाई, वहीं अंतिम परिणाम में उसकी भूमिका निर्णायक भी साबित हुई।
यादव वोट बैंक में भी लगी सेंध?
इस चुनाव का एक और अहम पहलू यादव मतदाताओं का बिखराव रहा। छात्र नेता दिलीप कुमार, जो यादव समुदाय से आते हैं, उन्हें करीब छह हजार प्रथम वरीयता के मत मिले। इससे संकेत मिलता है कि राजद का पारंपरिक यादव वोट बैंक भी पूरी तरह उसके साथ नहीं रहा।वहीं कांग्रेस ने भी अलग चुनाव लड़ते हुए ब्राह्मण प्रत्याशी को मैदान में उतारा। कांग्रेस उम्मीदवार को करीब चार हजार प्रथम वरीयता के मत मिले। इससे विपक्षी मतों का विभाजन और गहरा हुआ।
तेजस्वी यादव के सामने MY समीकरण बचाने की चुनौती
दरभंगा का चुनाव राजद के लिए एक चेतावनी भी है। लालू प्रसाद यादव के दौर से पार्टी का मजबूत आधार मुस्लिम और यादव मतदाता रहे हैं। कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में भी इन समुदायों ने राजद का साथ दिया है। लेकिन इस चुनाव में दोनों समुदायों के मतों का बंटना पार्टी के लिए चिंता का विषय बन सकता है।
तेजस्वी यादव के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक तरफ कांग्रेस जैसे सहयोगियों को साथ लेकर चलना है, तो दूसरी तरफ मुस्लिम-यादव समीकरण में आई दरार को भरना है। दरभंगा की जीत ने भाजपा को झटका जरूर दिया है, लेकिन राजद के लिए यह जीत भविष्य की सियासी चुनौतियों का आईना भी साबित हो सकती है।