सन्नाटे में बदला कभी गुलजार रहने वाला हॉल्ट: कोविड काल के बाद नहीं रुकीं ट्रेनें, चालू करने को लेकर अनशन पर बैठे ग्रामीण
कोविड के बाद से बंद पड़े जमुई जिले के कटौना हाल्ट को फिर शुरु करने की मांग जोरो पर है। आक्रोशित ग्रामीणों ने रेल प्रशासन को चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो वे उग्र आंदोलन करते हुए रेल चक्का जाम करने को मजबूर होंगे....
Jamui : जिले से एक बड़ी खबर सामने आई है, जहां कभी हजारों रेल यात्रियों की आवाजाही से दिन-रात गुलजार रहने वाला कटौना हॉल्ट आज पूरी तरह वीरान पड़ा है। कोविड-19 महामारी के दौरान एहतियातन बंद किए गए सात जोड़ी लोकल ट्रेनों के ठहराव को दोबारा बहाल कराने की मांग को लेकर अब एक बड़ा जनआंदोलन खड़ा हो गया है। इलाके के करीब 50 गांवों के ग्रामीण पिछले पांच वर्षों से लगातार धरना, भूख हड़ताल और आमरण अनशन जैसे शांतिपूर्ण माध्यमों से अपनी आवाज बुलंद कर रहे हैं। अब आक्रोशित ग्रामीणों ने रेल प्रशासन को दो टूक चेतावनी दी है कि यदि जल्द ही उनकी मांगें पूरी नहीं हुईं, तो वे उग्र आंदोलन करते हुए रेल चक्का जाम करने को मजबूर होंगे।
1999 से था लाखों लोगों का सहारा: बंद होने से जेब पर पड़ रही भारी मार
कटौना हॉल्ट की स्थापना वर्ष 1999 में हुई थी और तब से यह इलाका किसानों, मजदूरों, छात्र-छात्राओं और नौकरीपेशा लोगों के लिए लाइफलाइन बना हुआ था। यहाँ से लोग जमुई, किउल, झाझा और राजधानी पटना समेत कई बड़े शहरों तक बेहद कम खर्च में सुलभ सफर तय करते थे। ट्रेनों का ठहराव बंद होने का सबसे सीधा और बुरा असर आम जनता की जेब पर पड़ा है। ग्रामीणों ने बताया कि पहले जहां मात्र 10 से 20 रुपये के मामूली रेल टिकट में रोजाना का सफर पूरा हो जाता था, वहीं अब लोगों को ऑटो और अन्य निजी वाहनों पर प्रतिदिन 100 रुपये या उससे अधिक फूंकने पड़ रहे हैं। इससे गरीब परिवारों और पढ़ाई के लिए बाहर जाने वाले छात्रों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
मंजूरी के 17 महीने बाद भी आदेश ठंडे बस्ते में: दिग्विजय सिंह के प्रयासों को किया याद
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे चंद्रचूड़ सिंह ने रेल प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाते हुए एक बड़ा खुलासा किया। उन्होंने बताया कि 9 जनवरी 2025 को ही कटौना हॉल्ट पर लोकल ट्रेनों के दोबारा ठहराव को आधिकारिक मंजूरी मिल चुकी थी। इसके बावजूद करीब 17 महीने बीत जाने के बाद भी इस आदेश को धरातल पर लागू नहीं किया जा सका, जो रेल विभाग की घोर संवेदनहीनता को दर्शाता है। उन्होंने भावुक होते हुए याद दिलाया कि तत्कालीन रेल राज्य मंत्री स्वर्गीय दिग्विजय सिंह के विशेष और अथक प्रयासों से ही वर्ष 1999 में कटौना हॉल्ट का निर्माण हुआ था, और उसी दौरान यहाँ आरपीएसएफ (RPSF) ट्रेनिंग सेंटर स्थापित करने की भी योजना बनी थी, जो आज तक अधूरी पड़ी है।
नेताओं के वादों से ठगे गए युवा: चुनाव खत्म होते ही भूल जाते हैं समस्याएं
प्रदर्शन में शामिल युवा छात्रों और स्थानीय लोगों का गुस्सा जनप्रतिनिधियों के खिलाफ भी जमकर फूटा। युवाओं ने तीखे शब्दों में कहा कि चुनाव के समय तमाम राजनीतिक दलों के नेता और जनप्रतिनिधि वोट बटोरने के लिए बड़े-बड़े लोकलुभावन वादे करते हैं, लेकिन चुनाव संपन्न होते ही इस पिछड़े इलाके की बुनियादी समस्याओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। छात्रों ने साफ तौर पर कहा कि वे अब और बहानों को बर्दाश्त नहीं करेंगे और यदि जल्द ही सातों जोड़ी ट्रेनों का ठहराव शुरू नहीं किया गया, तो इस आंदोलन को पूरे जिले में व्यापक रूप से फैलाया जाएगा।
झाझा आरपीएफ की टीम ने की मध्यस्थता: आश्वासन के बाद फिलहाल टला चक्का जाम
कटौना हॉल्ट पर भारी संख्या में ग्रामीणों और उग्र युवाओं के जुटने की गुप्त सूचना मिलने के बाद झाझा आरपीएफ (RPF) की टीम दलबल के साथ तुरंत मौके पर पहुंची। आरपीएफ अधिकारियों ने आंदोलनकारियों से काफी देर तक वार्ता की और उनकी मांगों को उच्चाधिकारियों तक पहुंचाकर जल्द सकारात्मक पहल करने का ठोस आश्वासन दिया। अधिकारियों की इस मध्यस्थता और आश्वासन के बाद ग्रामीणों ने फिलहाल अपना रेल चक्का जाम करने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया है। हालांकि, ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि जब तक कोविड से पहले की तरह सभी 7 जोड़ी लोकल ट्रेनों का परिचालन और ठहराव बहाल नहीं होता, उनका यह लोकतांत्रिक संघर्ष अनवरत जारी रहेगा।
सुमित की रिपोर्ट