कटिहार के हसनगंज में दीपावली की अनूठी परंपरा: बांस और रंग-बिरंगे कागजों से पीढ़ी दर पीढ़ी फानूस बना रहे कारीगर, सजता है खास बाजार

दीपावली के मौके पर घरों की छतों पर टगने वाला कैंडिल अब बाजार से तकरीबन गायब हो चुका है, लेकिन कटिहार के हसनगंज में आधा दर्जन से अधिक परिवार इस पंरपरा को बनाए रखे हुए है....

कटिहार के हसनगंज में दीपावली की अनूठी परंपरा- फोटो : श्याम

Katihar : दीपावली के पावन पर्व पर आज भी ग्रामीण इलाकों में घरों की छतों और आँगन को रोशन करने के लिए पारंपरिक फानूस (Phanush) या कैंडल लगाने की परंपरा पूरी शिद्दत के साथ कायम है। बात अगर कटिहार जिले के ग्रामीण इलाके हसनगंज की करें, तो यहाँ आज भी आधा दर्जन से अधिक परिवारों में लोग पीढ़ी दर पीढ़ी पारंपरिक फानूस बनाने के इस हुनर और संस्कृति को सहेजे हुए हैं।


सुख-शांति और समृद्धि की मान्यता के साथ जलाए जाते हैं फानूस

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, बांस की खच्चियों (पतली तीलियों) और रंग-बिरंगे प्लास्टिक या कागजों के सहारे तैयार किए जाने वाले इस फानूस के भीतर दीया जलाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि पारंपरिक फानूस की रोशनी से घरों में सुख, शांति, वैभव और समृद्धि का आगमन होता है, यही कारण है कि आधुनिक चकाचौंध के बीच भी लोग इसे विशेष रूप से अपने घरों में लगाते हैं।


शहरीकरण के दौर में भी ग्रामीण बाजारों में सजता है फानूस का खास बाजार

तेजी से हो रहे शहरीकरण के इस दौर में आधुनिक लाइटें और झालरें बाजार में भले ही हावी हों, लेकिन इसके बावजूद शहरों से लेकर ग्रामीण अंचलों तक पारंपरिक फानूस का एक अलग और जीवंत बाजार सजता है। दीपावली के ठीक पहले सजने वाले इन बाजारों में लोगों की भीड़ उमड़ती है, जो इस प्राचीन लोक कला के प्रति लोगों के लगाव को दर्शाती है।


त्योहारी सीजन में स्थानीय कारीगरों को होती है अच्छी आमदनी

दीपावली के इस बड़े अवसर पर फानूस बनाने वाले स्थानीय कारीगरों और उनके परिवारों को अच्छी-खासी आमदनी हो जाती है। पुश्तैनी पेशे से जुड़े ये कारीगर महीनों पहले से इसकी तैयारी में जुट जाते हैं। त्योहार के दिनों में मिलने वाले इस रोजगार से उनकी आजीविका को भी एक मजबूत आर्थिक संबल मिलता है।


संस्कृति और रोजगार का अनूठा संगम बन रही यह परंपरा

आधुनिकता की दौड़ के बीच कटिहार के हसनगंज के ये कारीगर न केवल अपनी पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए हैं, बल्कि अपनी कला के माध्यम से संस्कृति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक बेहतरीन संतुलन भी पेश कर रहे हैं। पर्व-त्योहारों के मौके पर जलने वाले ये पारंपरिक फानूस आज भी हमारी समृद्ध विरासत की अमिट पहचान बने हुए हैं।


श्याम की रिपोर्ट