बिहार में जमीन के लिए चल रहा काला खेल,गरीब के लिए कानून सख्त, माफिया के लिए नरम, प्रशासन के नाक के नीचे हो रहा अवैध निर्माण, ये कैसा सिस्टम?

Bihar Land illegal plotting: एक ही जमीन के लिए सरकार के अधीन बैठे अफसरों की दोहरी नीति ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है।...

ये कैसा सिस्टम?- फोटो : reporter

Bihar Land illegal plotting: बिहार की जमीन पर इन दिनों एक ऐसा खेल चल रहा है, जहां कानून किताबों में बंद है और हकीकत में सेटिंग-गेटिंग का सिक्का चल रहा है।मुजफ्फरपुर में  एक ही जमीन के लिए सरकार के अधीन बैठे अफसरों की दोहरी नीति ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। गरीब इंसाफ के लिए दफ्तर-दफ्तर ठोकरें खाता है, जबकि जमीन माफिया का काम चंद लम्हों में फाइनल हो जाता है।

सरकार भले ही जनता दरबार लगाकर अवाम को राहत देने की बातें करती हो, लेकिन हकीकत ये है कि आम आदमी की फाइल सालों तक धूल फांकती रहती है। उसकी फरियाद पेंडिंग के अंधेरे में गुम हो जाती है। वहीं दूसरी तरफ, माफिया की एंट्री होते ही फाइलों में रफ्तार आ जाती है, और सारे रुकावटें चुपचाप रास्ता छोड़ देती हैं। कथित तौर पर वजह साफ है जहां गरीब अफसरों की मांग पूरी नहीं कर पाता, वहीं माफिया इशारों में सब कुछ निपटा देता है!

इस पूरे खेल का सबसे खतरनाक चेहरा सामने आया है बूढ़ी गंडक नदी के किनारे। नेपाल से निकलकर चंपारण होते हुए मुजफ्फरपुर पहुंचने वाली ये नदी अब अपने वजूद के लिए जंग लड़ रही है। अहियापुर के दादर पुल से लेकर सिकंदरपुर के अखाड़ाघाट तक, नदी के सीने पर अवैध कब्जे की इमारतें खड़ी हो रही हैं। बीच धारा में प्लॉटिंग हो रही है, बहुमंजिला बिल्डिंग्स खड़ी की जा रही हैं और सिस्टम खामोश तमाशबीन बना हुआ है।

ये कोई मामूली अतिक्रमण नहीं, बल्कि खुला जुर्म है। सवाल ये है कि आखिर नदी के बीचों-बीच जमीन की खरीद-फरोख्त कैसे हो रही है? किसके इशारे पर ये गोरखधंधा चल रहा है? और सबसे अहम किसने इन इमारतों को हरी झंडी दी?अधिकारियों की मानें तो जांच होगी, दोषियों पर कार्रवाई होगी। लेकिन ये वही घिसा-पिटा बयान है, जो हर बार सुनने को मिलता है और फिर मामला ठंडे बस्ते में दफन हो जाता है।

अब सवाल सीधा है क्या कानून सिर्फ गरीबों के लिए है? क्या माफिया के लिए अलग रास्ता बना हुआ है? अगर यही हाल रहा, तो वो दिन दूर नहीं जब बूढ़ी गंडक सिर्फ नक्शों में रह जाएगी और हकीकत में कंक्रीट का जंगल उसका कफन बन जाएगा।

रिपोर्ट- मणिभूषण शर्मा