Bihar Politics: विधानसभा सत्र से पहले कांग्रेस का नया दांव, संगठन मजबूत करने में जुटी पार्टी, एक दिसंबर की बैठक में होगा बड़ा फैसला

Bihar Politics:विधानसभा चुनाव में लगातार घटती प्रभावशीलता, घटता जनाधार और गठबंधन राजनीति में पिछलग्गू बनने की छवि से तंग आकर कांग्रेस अब सूबे में एकला चलो की राह पर आगे बढ़ने का फैसला कर चुकी है।

विधानसभा सत्र से पहले कांग्रेस का नया दांव- फोटो : social Media

Bihar Politics: बिहार की राजनीति में कांग्रेस ने बड़ा राजनीतिक मोड़ ले लिया है। विधानसभा चुनाव में लगातार घटती प्रभावशीलता, घटता जनाधार और गठबंधन राजनीति में पिछलग्गू बनने की छवि से तंग आकर पार्टी अब सूबे में ‘एकला चलो’ की राह पर आगे बढ़ने का फैसला कर चुकी है। दिल्ली में आयोजित उच्चस्तरीय बैठकों, जहां राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे, में यह रणनीति अंतिम रूप ले चुकी है। कांग्रेस नेतृत्व ने साफ संकेत दे दिया है कि बिहार में संगठन को मजबूती देने का रास्ता अब अकेले लड़ने से ही निकलेगा।

दिल्ली में तीन दिनों से चल रहे मंथन में उम्मीदवारों, जमीनी नेताओं और रणनीतिकारों ने प्रदेश की राजनीतिक वास्तविकता को खुलकर रखा। सभी का मत था कि महागठबंधन में रहने से न केवल कांग्रेस का वोट बैंक सिकुड़ा, बल्कि कई क्षेत्रों में संगठन लगभग समाप्ति की कगार पर पहुंच गया। प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम, प्रभारी कृष्णा अल्लावरु और पूर्व विधायक दल नेता शकील अहमद खान ने पार्टी नेतृत्व के सामने वही सच रखा—कि राजद के प्रभाव वाले इलाकों में कांग्रेस की पहचान मिट गई है। गठबंधन के आक्रामक व्यवहार से परंपरागत वोटर दूरी बनाने लगे हैं। 2010 में अकेले लड़कर चार सीटें लाने वाली कांग्रेस, सात दलों के गठबंधन में होने के बाद भी केवल छह सीट पर अटक गई यह स्वयं बड़ा संकेत है।

इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस ने फैसला किया है कि अब बिहार में पूरे दमखम से अकेले चुनावी जमीन तैयार की जाएगी। इसकी शुरुआत 14 दिसंबर को दिल्ली में प्रस्तावित ‘वोट चोरी के खिलाफ’ रैली से होगी। इसके लिए एक दिसंबर को पटना के सदाकत आश्रम में सभी जिलाध्यक्षों और फ्रंटल संगठनों की बैठक बुलाई गई है, ताकि भीड़ जुटाने के साथ-साथ संगठनात्मक ढांचा नए सिरे से बनाया जा सके।

शीर्ष नेताओं के अनुसार अगला चरण जिला और प्रखंड स्तर के दौरों का होगा। राज्यभर में वरिष्ठ नेता कार्यकर्ताओं से मुलाक़ात करेंगे, हार के बाद टूटे मनोबल को फिर से खड़ा करेंगे और बूथ स्तर पर नई टीम तैयार करने का ब्लूप्रिंट बनाएंगे। कांग्रेस अब उन इलाकों पर खास ध्यान देगी जहाँ वह राजद के प्रभाव के कारण मजबूत कार्यक्रम चलाने से बचती थी।

कांग्रेस नेताओं की राय स्पष्ट है कि अगर पार्टी को बिहार में अपना वजूद बचाना है और पहचान फिर से मजबूत करनी है, तो स्वतंत्र और आक्रामक राजनीतिक उपस्थिति ही एकमात्र रास्ता है। फिलहाल बिहार में कोई बड़ा चुनाव नहीं है, यही वह समय है जब कांग्रेस अपने संगठन की रीढ़ को फिर मजबूत कर सकती है।नया नारा और नई राजनीतिक दिशा के साथ कांग्रेस अब मैदान में उतर रही है और यह देखना दिलचस्प होगा कि एकला चलो की यह यात्रा पार्टी को नई ऊर्जा दे पाती है या नहीं।