Samrat chaudhary के CM बनते ही नीतीश की शराबबंदी पर उठे सवाल, सियासत में मचा घमासान।

बिहार में नई सरकार के गठन और नीतीश कुमार के दिल्ली जाने के साथ ही उनकी सबसे बड़ी नीति—शराबबंदी—पर सवालों का दौर तेज हो गया है। हैरानी की बात यह है कि ये सवाल अब NDA के भीतर से ही उठने लगे हैं। खबर (विस्तार):

Bihar की सियासत में एक बार फिर शराबबंदी चर्चा में  है।  राज्य में नई सरकार बंनने के 24 हुए और नीतीश कुमार सक्रिय राजनीति से दिल्ली की ओर बढ़े, उनकी सबसे चर्चित नीति—शराबबंदी—अब सवालों के घेरे में आ गई है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इस बार विपक्ष नहीं, बल्कि NDA के अपने ही विधायक इस कानून के खिलाफ खुलकर आवाज उठा रहे हैं। इससे साफ संकेत मिल रहे हैं कि नई सरकार के सामने यह मुद्दा बड़ी चुनौती बनने वाला है।

माधव आनंद ने शराबबंदी को लेकर तीखा सवाल उठाते हुए कहा कि इस कानून के कारण बिहार को भारी राजस्व नुकसान हो रहा है। 

उनका कहना है कि एक तरफ सरकार को करोड़ों की आय का नुकसान झेलना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर अवैध शराब का कारोबार धड़ल्ले से जारी है।

उन्होंने साफ कहा कि जब जमीनी स्तर पर शराबबंदी पूरी तरह लागू नहीं हो पा रही है, तो सरकार को इस पर पुनर्विचार करना चाहिए। यह मुद्दा पहले भी बजट सत्र में उठाया गया था, 

लेकिन अब नई सरकार बनने के बाद इसे और आक्रामक तरीके से उठाया जा रहा है।

पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने शराबबंदी को लेकर कई बार खुलकर विरोध किया है। वे लगातार कहते रहे हैं,

 कि इस कानून के कारण गरीब और वंचित दलित समाज के लोग बड़ी संख्या में जेल में बंद हैं, जबकि बड़े कारोबारी और शराब तस्कर बाहर घूम रहे हैं।

 इसलिए इस कानून की समीक्षा करना जरूरी है। 

वही नई सरकार बनने के तुरंत बाद नीतीश कुमार की पार्टी से कई बार के

 बहुबली  मोकामा के विधायक अनंत सिंह ने तो शराबबंदी को खत्म करने की मांग कर दी है।

 उन्होंने नई सरकार से इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करने और मुख्यमंत्री से बातचीत करने तक की बात कही है।

2016 से लागू इस कानून के बावजूद बिहार में लगातार शराब की खेप पकड़ी जा रही है। पुलिस की कार्रवाई के बावजूद तस्करी का नेटवर्क कमजोर नहीं पड़ा है।

 इसके साथ ही जहरीली शराब से होने वाली मौतों ने भी इस कानून की सफलता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

हालांकि सरकार की ओर से इसे सफल बनाने के लिए कई पहल की गई हैं, लेकिन अब जब अपने ही विधायक सवाल उठा रहे हैं, तो यह मुद्दा और गंभीर हो गया है।

अब नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सम्राट चौधरी के नेतृत्व में बनी नई सरकार इस पर क्या फैसले लेती है । क्या सरकार पुराने फैसले पर कायम रहेगी या फिर बढ़ते दबाव के बीच कोई बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा?

बिहार की सियासत में शराबबंदी एक बार फिर बड़ा और  मुद्दा बनकर उभर रहा है।