जेडीयू सांसद का बड़ा बयान, 'बिहार में शराबबंदी हटाना ही एकमात्र विकल्प'

बिहार में साल 2016 से लागू शराबबंदी कानून अब एनडीए गठबंधन के भीतर ही विवादों के घेरे में है। जेडीयू सांसद देवेश चंद्र ठाकुर के हालिया बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा है कि यह नीति व्यावहारिक नहीं है।

PATNA - : बिहार की राजनीति में शराबबंदी कानून को लेकर एक बार फिर भूचाल आ गया है। अब तक विपक्षी दल ही इस नीति की विफलता पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को घेर रहे थे, लेकिन अब उनकी अपनी ही पार्टी, जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के वरिष्ठ नेता और सीतामढ़ी के सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने शराबबंदी को 'अवव्यावहारिक' बताकर इसे हटाने की मांग कर दी है। सांसद ने दो टूक कहा कि नीतीश कुमार की मंशा भले ही नेक थी, लेकिन यह नीति धरातल पर पूरी तरह विफल रही है और इसे हटा देना ही राज्य के हित में होगा।

अपनों के ही निशाने पर मुख्यमंत्री की 'ड्रीम प्रोजेक्ट'

सांसद देवेश चंद्र ठाकुर ने एक निजी चैनल से बातचीत के दौरान बिहार सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजना 'शराबबंदी' की पोल खोलकर रख दी। उन्होंने कहा कि पूरी दुनिया के इतिहास में आज तक कहीं भी शराबबंदी की नीति सफल नहीं हुई है। ठाकुर के अनुसार, मुख्यमंत्री चाहते थे कि समाज से नशाखोरी खत्म हो और गरीबों के घर बर्बाद न हों, लेकिन व्यवहारिक रूप से यह संभव नहीं हो पा रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सीमावर्ती राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल से भारी मात्रा में अवैध शराब की खेप बिहार पहुँच रही है, जिसे रोकना नामुमकिन है।

शपथ ग्रहण से दूरी और मुख्यमंत्री को दो टूक जवाब

रिपोर्ट के अनुसार, देवेश चंद्र ठाकुर ने उस समय के एक रोचक वाकये का भी जिक्र किया जब नीतीश कुमार ने विधानसभा और विधान परिषद के सदस्यों को शराब न पीने की शपथ दिलाई थी। सांसद ने खुलासा किया कि वे उस शपथ ग्रहण कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए थे। जब मुख्यमंत्री ने उनसे उनकी अनुपस्थिति का कारण पूछा, तो ठाकुर ने स्पष्टता से कहा था कि वे बिहार की सीमा के भीतर शराब का सेवन नहीं करेंगे, लेकिन राज्य से बाहर जाने पर उन्हें इससे कोई परहेज नहीं है। उनके इस बयान ने यह साफ कर दिया है कि सत्ता पक्ष के भीतर भी इस कानून को लेकर किस तरह की असहजता बनी हुई है।

एनडीए के सहयोगी दलों का भी समर्थन

शराबबंदी को खत्म करने या इसकी समीक्षा करने की मांग केवल जेडीयू तक सीमित नहीं है। एनडीए गठबंधन के अन्य घटक दल भी लगातार इस पर दबाव बना रहे हैं। केंद्रीय मंत्री जीतनराम मांझी लंबे समय से इसे गरीबों के लिए उत्पीड़न का जरिया बता रहे हैं। वहीं, हाल ही में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी के नेता माधव आनंद, केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और भाजपा विधायक विनय बिहारी ने भी शराबबंदी की समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया है। इन नेताओं का तर्क है कि इस कानून ने पुलिस और तस्करों के बीच एक अवैध गठजोड़ पैदा कर दिया है, जिससे सरकार को राजस्व की हानि हो रही है और माफिया फल-फूल रहे हैं।

आंकड़ों में शराबबंदी: 10 लाख केस और अरबों का नुकसान

बिहार में 2016 से लागू इस कानून के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति काफी भयावह नजर आती है। पिछले आठ वर्षों में शराबबंदी के उल्लंघन के 10 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए हैं और करीब 16 लाख गिरफ्तारियां की गई हैं। पुलिस ने अब तक 4.50 करोड़ लीटर शराब जब्त की है, लेकिन तस्करी थमने का नाम नहीं ले रही है।  एक अनुमान के मुताबिक, राज्य सरकार को हर साल 30,000 से 40,000 करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो रहा है, जबकि जहरीली शराब के कारण दर्जनों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं।