पंचायत सचिवों के ट्रांसफर नीति में गड़बड़झाला, मृत और निलंबित कर्मचारियों का भी हो गया तबादला

Panchayat Sachiv Transfer: पंचायतों की व्यवस्था की अहम कड़ी माने जाने वाले पंचायत सचिवों के तबादले को लेकर सवालों का अंबार खड़ा हो गया है। आलम यह है कि मंत्री कुछ और कह रहे हैं, जबकि विभागीय सचिव के स्तर से कुछ और तस्वीर पेश की जा रही है।

पंचायत सचिवों के तबादले पर सवाल- फोटो : social Media

Panchayat Sachiv Transfer Controversy: बिहार में एक पुरानी कहावत है आपकी सब बात सही, पर खूंटा तो यहीं गड़ेगा। पंचायती राज विभाग की कार्यप्रणाली पर इन दिनों यह कहावत बिल्कुल सटीक बैठती नजर आ रही है। पंच ही परमेश्वर की अवधारणा को जमीन पर उतारने के लिए पंचायतों को अधिकार दिए गए, लेकिन पंचायतों की व्यवस्था की अहम कड़ी माने जाने वाले पंचायत सचिवों के तबादले को लेकर अब सवालों का अंबार खड़ा हो गया है। आलम यह है कि मंत्री कुछ और कह रहे हैं, जबकि विभागीय सचिव मनोज कुमार के स्तर से कुछ और तस्वीर पेश की जा रही है।

इस पूरे मामले की कहानी वर्ष 2014 से शुरू होती है। पंचायती राज विभाग ने पंचायत सचिवों के करीब 3100 पदों पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन निकाला था। नियुक्ति प्रक्रिया पूरी होते-होते वर्ष 2022 आ गया। चूंकि मूल विज्ञापन 2014 का था, इसलिए इसमें महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण का लाभ नहीं मिल सका। नियुक्ति के बाद करीब 2500 पंचायत सचिवों को दूसरे जिलों में पदस्थापित कर दिया गया। इससे पहले पंचायत सचिवों की पदस्थापना सामान्यतः गृह जिले में ही रहने की परंपरा थी। कई कर्मियों को अपने घर से लगभग 300 किलोमीटर तक दूर भेज दिया गया।

पंचायत सचिवों के इस तबादले के खिलाफ बिहार राज्य पंचायत सचिव संघ ने आवाज बुलंद की। लगातार विरोध और मांगों के बाद विभाग ने पंचायत सचिव स्थानांतरण एवं पदस्थापन विनियमावली, 2025 तैयार की। इसे ज्ञापांक 8370, दिनांक 4 जुलाई 2025 को अधिसूचित किया गया। इसके बाद 1 अगस्त 2025 को ज्ञापांक 9719 के जरिए पदस्थापन दिशानिर्देश जारी किए गए। इसमें तबादले के लिए बाकायदा वरीयता का पैमाना तय किया गया—सबसे पहले दिव्यांग कर्मी, उसके बाद महिला कर्मी, गंभीर रोग से पीड़ित कर्मचारी, पति-पत्नी के मामले और फिर गृह जिले से दूरी को प्राथमिकता दी गई।

तबादले के लिए तीन विकल्पों के साथ पोर्टल पर आवेदन मांगे गए और 2248 पंचायत सचिवों ने आवेदन किया। मामला विधानसभा और विधान परिषद तक भी पहुंचा। एमएलसी कार्तिक, नीरज कुमार और संजीव सिंह ने सवाल उठाए। तत्कालीन मंत्री केदार गुप्ता ने व्यवस्था को सही बताया, लेकिन एमएलसी नीरज कुमार ने सदन में सवाल खड़े करते हुए ऐसी सूची का हवाला दिया, जिसमें दिव्यांग महिला कर्मचारी तक का तबादला नहीं हुआ था।

इसके बाद फरवरी 2026 में ज्ञापांक 2117 के तहत 243 पंचायत सचिवों का तबादला किया गया। लेकिन इस सूची में भी सवालों ने पीछा नहीं छोड़ा। पति-पत्नी के तबादले के प्रावधान में ऐसे मामले भी शामिल किए गए, जहां पति निजी कंपनी में कार्यरत था। इससे नियमों की व्याख्या और उसके इस्तेमाल को लेकर सवाल उठे।

सबसे गंभीर मामला 6 अप्रैल 2026 को सामने आया, जब गंभीर रोग से पीड़ित कर्मियों का तबादला किया गया। तबादले के बाद विभाग ने जिलाधिकारियों को पत्र भेजकर संबंधित कर्मियों की बीमारी की जांच कराने को कहा। इसके बाद 4 जुलाई 2026 को ज्ञापांक 10409 जारी कर कहा गया कि यदि अगले दिन तक डीएम की रिपोर्ट नहीं आती है तो संबंधित कर्मियों को स्वतः विरमित मान लिया जाएगा। यानी पहले तबादला, फिर बीमारी की जांच—यह पूरी कवायद विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करती है।

मामला तब और गरमा गया जब 7 अगस्त 2026 को ज्ञापांक 11444 के जरिए 1402 पंचायत सचिवों की तबादला सूची जारी हुई। आरोप है कि इस सूची में मृत, निलंबित और नौकरी छोड़ चुके कर्मचारियों के नाम तक शामिल कर दिए गए। खुसरुपुर के एक मृत कर्मचारी का नाम भी सूची में होने की बात सामने आई, जबकि सूची जारी होने से करीब ढाई महीने पहले ही उसकी मृत्यु हो चुकी थी। दूसरी ओर गंभीर बीमारी से जूझ रहे कर्मचारियों और जरूरतमंद महिला कर्मियों को अपेक्षित प्राथमिकता नहीं मिलने का आरोप लगा।

संघ का आरोप है कि सरकार के साथ हुए समझौते में तय हुआ था कि पंचायत सचिवों को उनके गृह जिले या आसपास के दो जिलों में भेजा जाएगा। मगर कई कर्मियों को सैकड़ों किलोमीटर दूर कर दिया गया। महिला पंचायत सचिव सुरुचि कुमारी को शेखपुरा, मुकेश कुमार को कटिहार और रोशन को अररिया भेजे जाने का उदाहरण देते हुए संघ ने सूची की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं।

सबसे बड़ा पेंच यह है कि समझौते के तहत 2248 पंचायत सचिवों के तबादले की बात थी, लेकिन विभागीय सूची में 1645 नाम ही आए और 603 कर्मचारी कथित तौर पर बाहर रह गए। इनमें करीब 200 एससी/एसटी वर्ग के कर्मी शामिल होने का दावा किया गया है।

अब विभाग की किरकिरी के बाद पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश ने सूची में गड़बड़ियों को स्वीकार करते हुए अधिकारियों की लापरवाही की जांच और सूची में सुधार का भरोसा दिया है। लेकिन संघ अध्यक्ष का कहना है कि मांगों पर अब तक ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। यही वजह है कि राज्यभर के पंचायत सचिवों में गुस्सा, असंतोष और बेचैनी बढ़ रही है।

कुल मिलाकर सवाल सिर्फ तबादले का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था की विश्वसनीयता का है, जिसे पंचायतों के जरिए लोकतंत्र की सबसे निचली लेकिन सबसे महत्वपूर्ण इकाई को मजबूत करना था। अगर नियम बनाने के बाद भी नियमों की अनदेखी हो, अगर वरीयता सूची में पात्र पीछे और अपात्र आगे नजर आएं, तो फिर सवाल उठना लाजिमी है आखिर पंचायती राज की इस पूरी कवायद में ‘खूंटा’ आखिर कहां गड़ा है? पंचायत सचिव संघ अब तीसरी बार आंदोलन की तैयारी में है। ऐसे में सरकार के सामने चुनौती सिर्फ सूची सुधारने की नहीं, बल्कि पूरे तबादला तंत्र में भरोसा बहाल करने की है।