नीतीश सरकार का 'कैथी' टैक्स: पुराने दस्तावेज़ों के अनुवाद के नाम पर जनता की जेब पर डाका, प्रति पेज देने होंगे इतने रुपए

बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने कैथी लिपि से देवनागरी में अनुवाद के लिए ₹220 प्रति पृष्ठ की भारी-भरकम दर निर्धारित की है। पारदर्शिता के नाम पर केवल ऑनलाइन भुगतान की अनिवार्यता ने ग्रामीण आबादी और गरीब किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

Patna -  बिहार सरकार के राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने कैथी लिपि से देवनागरी लिपि में अनुवाद के लिए ₹220 (दो सौ बीस रुपये) प्रति पृष्ठ की दर निर्धारित की है। विभाग का कहना है कि यह कदम भूमि संबंधी कार्यों में स्पष्टता लाने के लिए उठाया गया है, लेकिन आम नागरिकों के लिए प्रति पृष्ठ इतनी अधिक राशि देना एक नए आर्थिक बोझ के समान है। जहां सरकार सुशासन और पारदर्शिता का दावा कर रही है, वहीं अनुवाद की यह महंगी दर गरीब किसानों और आम जनता की पहुंच से बाहर नजर आ रही है।

केवल ऑनलाइन भुगतान की बाध्यता: ग्रामीण आबादी के लिए नई मुश्किल 

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि पूर्ण पारदर्शिता सुनिश्चित करने के नाम पर सेवा शुल्क का भुगतान केवल ऑनलाइन माध्यम से ही स्वीकार किया जाएगा। बिहार के दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में, जहां डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट की पहुंच आज भी एक चुनौती है, वहां के बुजुर्गों और कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए ऑनलाइन भुगतान की यह शर्त किसी सिरदर्द से कम नहीं है। नगद भुगतान की सुविधा न होने से ग्रामीण आबादी को बिचौलियों और साइबर कैफे संचालकों के चक्कर काटने पड़ेंगे।

पुरानी जटिलताओं का नया समाधान या नया संकट? 

विरासत में मिले पुराने भूमि दस्तावेजों को समझने के लिए जनता पहले से ही परेशान रहती है। अब "प्रशिक्षित परामर्शदाताओं" की सेवाओं के नाम पर भारी शुल्क वसूलना सरकार की मंशा पर सवाल उठाता है। क्या सरकार का कर्तव्य यह नहीं होना चाहिए था कि वह इन ऐतिहासिक और आवश्यक दस्तावेजों का अनुवाद मुफ्त या न्यूनतम टोकन शुल्क पर उपलब्ध कराती? ₹220 प्रति पृष्ठ की दर से यदि किसी के पास 10 पन्नों का दस्तावेज है, तो उसे सीधे तौर पर ₹2,200 का फटका लगेगा।

सुशासन के दावों के बीच बढ़ता आक्रोश 

राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग सोशल मीडिया पर कैथी लिपि परामर्शदाताओं की सूची साझा कर इसे बड़ी उपलब्धि बता रहा है, लेकिन धरातल पर लोग इसे सरकार द्वारा राजस्व वसूली का एक नया जरिया मान रहे हैं। भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने के लिए ऑनलाइन भुगतान का सहारा लिया गया है, लेकिन सेवा शुल्क की ऊंची दर खुद एक 'वैध' प्रताड़ना बनती जा रही है।