छात्राओं की सुरक्षा के लिए 'पुलिस दीदी' की तैनाती: पटना विश्वविद्यालय के प्राचार्य और छात्राओं ने बताई जमीन की हकीकत
बिहार सरकार द्वारा स्कूल और कॉलेजों के बाहर विशेष रूप से महिला पुलिसकर्मियों (पुलिस दीदी) की तैनाती की जा रही है, इसे लेकर छात्र-छात्राओं और स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों की मिली-जुली प्रतिक्रिया सामने आ रही है....
Patna : बिहार सरकार ने राज्य में छात्राओं की सुरक्षा और उनका आत्मविश्वास बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। अब स्कूल और कॉलेजों के बाहर विशेष रूप से महिला पुलिसकर्मियों (पुलिस दीदी) की तैनाती की जा रही है। हालांकि, डायल 112 और सामान्य पुलिस गश्ती की मौजूदगी के बावजूद इस नई व्यवस्था की जरूरत पर सवाल उठ रहे हैं। पटना विश्वविद्यालय के वाणिज्य महाविद्यालय की प्रिंसपल डॉ सुहेली मेहता और छात्राओं से बातचीत के दौरान इस पहल की उपयोगिता और व्यावहारिक चुनौतियों से जुड़ी अहम बातें सामने आईं।
112 और सामान्य पेट्रोलिंग के बाद भी क्यों पड़ी जरूरत?
जानकारों और छात्राओं का मानना है कि आपातकालीन डायल 112 सेवा आमतौर पर किसी घटना के घटने के बाद प्रतिक्रिया देती है, जबकि स्कूल-कॉलेजों के बाहर महिला पुलिस की स्थायी या गश्ती मौजूदगी अपराध की नीयत रखने वाले मनचलों में खौफ पैदा करती है। इसके अलावा, पुरुष पुलिसकर्मियों के सामने छात्राएं अक्सर अपनी हिचकिचाहट के कारण छेड़खानी या राह चलते कसौटी पर कसी जाने वाली टिप्पणियों की शिकायत नहीं कर पाती हैं।
झिझक मिटेगी और बढ़ेगा छात्राओं का आत्मविश्वास
पटना विश्वविद्यालय की छात्राओं ने सरकार की इस पहल का स्वागत करते हुए कहा कि महिला पुलिसकर्मियों की मौजूदगी से सुरक्षा की भावना मजबूत होती है। छात्राओं के अनुसार, महिला पुलिसकर्मी केवल सुरक्षा बल नहीं बल्कि एक 'सपोर्ट सिस्टम' की तरह दिखती हैं, जिनसे अपनी परेशानियां साझा करना आसान होता है। इससे दूर-दराज के इलाकों से आने वाली लड़कियों का मनोबल बढ़ेगा और वे बिना किसी डर के अपनी पढ़ाई जारी रख सकेंगी।
प्रशासनिक स्तर पर योजना और जमीनी जवाबदेही
वहीं वाणिज्य महाविद्यालय की प्रिंसपल डॉ सुहेली मेहता ने स्पष्ट किया कि मुख्यमंत्री की यह पहल नीतिगत रूप से बेहद सराहनीय है, लेकिन इसकी सफलता निरंतरता पर निर्भर करेगी। उन्होंने कहा कि पूर्व में भी ऐसी कई व्यवस्थाएं शुरू हुईं जो शुरुआती दिनों के बाद सुस्त पड़ गईं। यदि महिला पुलिसकर्मी नियमित रूप से छुट्टियों और छुट्टी के समय मुस्तैद रहती हैं, तो यह कदम राज्य की शिक्षा व्यवस्था और महिला सशक्तिकरण के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
सफलता की असली कसौटी: सिर्फ तैनाती नहीं, सतर्कता
छात्राओं और शिक्षकों का एक स्वर में मानना है कि मुख्यमंत्री का यह फैसला कागजों पर और नियत के मामले में 100 प्रतिशत सही है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह मुस्तैदी कितनी पारदर्शी और दीर्घकालिक रहती है। अगर पुलिसकर्मी केवल खानापूर्ति के बजाय मुस्तैद रहकर असामाजिक तत्वों पर नकेल कसती हैं, तो यह पहल पूरी तरह से सफल साबित होगी।
वंदना की रिपोर्ट