आरके सिन्हा का निधन, भाजपा पूर्व राज्यसभा सांसद ने SIS security से हजारों बिहारियों को दिया रोजगार

रविन्द्र किशोर सिन्हा जिन्हें आर० के० सिन्हा भी कहा जाता है उनका जन्म 22 सितंबर 1951, बक्सर, बिहार में हुआ. वे एक पत्रकार, राजनेता, सामाजिक उद्यमी और सुरक्षा पेशेवर रहे ।

Former Rajya Sabha MP RK Sinha - फोटो : news4nation

RK Sinha :  बिहार की राजनीति और उद्योग जगत से बड़ी खबर सामने आई है। पूर्व राज्यसभा सांसद और SIS के संस्थापक आरके सिन्हा का निधन हो गया है। उन्होंने नोएडा स्थित अपने आवास पर अंतिम सांस ली। वह 75 वर्ष के थे और पिछले कुछ समय से बीमार चल रहे थे। रविन्द्र किशोर सिन्हा जिन्हें आर० के० सिन्हा भी कहा जाता है उनका जन्म 22 सितंबर 1951, बक्सर, बिहार में हुआ. वे एक पत्रकार, राजनेता, सामाजिक उद्यमी और सुरक्षा पेशेवर रहे । सिन्हा भारतीय संसद में राज्यसभा के सदस्य  के रूप में रहे और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता थे।  आरके सिन्हा के निधन की खबर से राजनीतिक और कारोबारी जगत में शोक की लहर है।


कौन थे आरके सिन्हा

बिहार के बक्सर की मिट्टी में जन्मे रविंद्र किशोर सिन्हा यानी आरके सिन्हा की कहानी संघर्ष, साहस और उद्यमशीलता की एक ऐसी मिसाल है, जिसने एक पत्रकार को देश के बड़े उद्योगपतियों में शुमार कर दिया। वह सिर्फ उद्योगपति नहीं थे, बल्कि पत्रकार, राजनेता, लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और किसान के रूप में भी उनकी अलग पहचान रही। भाजपा के संस्थापक सदस्यों में शामिल आरके सिन्हा ने अपनी मेहनत और दूरदर्शिता से एक छोटे से गैराज में शुरू किए गए कारोबार को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।


बक्सर में जन्म, पटना में बीता शुरुआती जीवन

आरके सिन्हा का जन्म 22 सितंबर 1951 को बिहार के बक्सर जिले में हुआ था। उनके पिता पटना में विधानसभा में नौकरी करते थे। बाद में उनका परिवार बक्सर से आरा के बहियारा गांव में आकर बस गया। आरके सिन्हा का शुरुआती जीवन पटना में बीता। यहीं उन्होंने पढ़ाई की और अपने करियर की शुरुआत भी की। उन्होंने राजनीति विज्ञान और कानून में स्नातक की डिग्री हासिल की।


पत्रकारिता से शुरू हुआ करियर, इंदिरा गांधी के खिलाफ लिखने पर गई नौकरी

उद्योग जगत में कदम रखने से पहले आरके सिन्हा की पहचान एक निर्भीक पत्रकार के रूप में थी। उन्होंने बिहार के प्रतिष्ठित अखबार 'सर्चलाइट-प्रदीप' में युद्ध संवाददाता के तौर पर काम किया। 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान भी उन्होंने रिपोर्टिंग की थी। उनकी लेखनी बेबाक और तीखी मानी जाती थी। युद्ध के बाद सेना से बाहर किए गए जवानों की स्थिति ने उन्हें काफी प्रभावित किया। वहीं, इंदिरा गांधी की नीतियों के खिलाफ लेख लिखने के कारण उन्हें अपनी नौकरी भी गंवानी पड़ी। उस समय उनकी मासिक तनख्वाह महज 230 रुपये थी। लेकिन नौकरी छूटने को उन्होंने अपनी जिंदगी का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत बनाया।


पटना के गैराज से खड़ी की SIS, 14 जवानों से शुरू हुआ सफर

आरके सिन्हा ने सेना से रिटायर हुए जवानों को रोजगार देने का सपना देखा। इसी सोच के साथ उन्होंने पटना के एक छोटे से गैराज में सिक्योरिटी एंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (इंडिया) लिमिटेड यानी SIS की नींव रखी। शुरुआत में सेना से सेवानिवृत्त 14 जवानों को 400 रुपये मासिक वेतन पर नौकरी दी गई। इन जवानों को उनके एक बिल्डर मित्र की इमारतों में निजी सुरक्षा गार्ड के रूप में तैनात किया गया। लोकनायक जयप्रकाश नारायण के विचारों से प्रेरित होकर 1974 में शुरू हुई यह पहल आगे चलकर देश के बड़े निजी सुरक्षा और सेवा समूहों में शामिल हो गई। वर्ष 1985 में कंपनी को प्राइवेट लिमिटेड का स्वरूप दिया गया।


3 लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार, विदेशों तक पहुंचा कारोबार

एक छोटे गैराज से शुरू हुआ SIS का सफर आज बड़े कारोबारी साम्राज्य में बदल चुका है। आरके सिन्हा के नेतृत्व में कंपनी ने देशभर में अपना विस्तार किया। उनके कारोबारी सफर से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक, इस समूह से तीन लाख से अधिक लोग रोजगार से जुड़े हैं। कंपनी का सालाना कारोबार 13 हजार करोड़ रुपये से अधिक बताया जाता है। भारत के अलावा न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया में भी कंपनी की मौजूदगी है। आरके सिन्हा का योगदान करीब 200 कंपनियों से जुड़ा बताया जाता है, जिनमें लगभग 40 कंपनियों के वह स्वयं मालिक हैं।


राजनीति में भी बनाई अलग पहचान

कारोबार के साथ-साथ आरके सिन्हा राजनीति में भी सक्रिय रहे। भाजपा के संस्थापक सदस्यों में उनकी गिनती होती थी। वह भाजपा की ओर से राज्यसभा सांसद भी रहे। पत्रकारिता से लेकर राजनीति और उद्योग जगत तक उनका सफर कई आयामों वाला रहा। उनके बेटे ऋतुराज सिन्हा भी भाजपा के नेता हैं और परिवार की कारोबारी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।


230 रुपये की नौकरी से लाखों लोगों के रोजगार तक का सफर

आरके सिन्हा की जिंदगी का सबसे बड़ा संदेश उनका संघर्ष है। कभी 230 रुपये की नौकरी करने वाले आरके सिन्हा ने एक ऐसे संस्थान की नींव रखी, जिससे लाखों लोगों की आजीविका जुड़ी। सेना से लौटे जवानों को रोजगार देने की छोटी-सी सोच ने एक बड़े उद्यम का रूप ले लिया। यही वजह है कि आरके सिन्हा की पहचान केवल एक उद्योगपति के तौर पर नहीं, बल्कि बिहार से निकलकर देश और दुनिया में अपनी पहचान बनाने वाले उद्यमी के रूप में भी रही।