Bihar News : 'गोट मैन' संजीव कुमार की आत्मकथा 'फॉरगोट' जल्द होगी लॉन्च, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और 'मिसफिट' से बदलाव तक की अनकही कहानी
Bihar News : बिहार में 'गोट मैन' के नाम से मशहूर संजीव कुमार की आत्मकथा 'फॉरगोट' जल्द लॉन्च होगी. जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था और 'मिसफिट' से बदलाव तक की अनकही कहानी कही गयी है.....पढ़िए आगे
PATNA : ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था में बदलाव की एक नई इबारत लिखने वाले और 'गोट मैन' के नाम से मशहूर संजीव कुमार अब अपनी ज़िंदगी के पन्नों को दुनिया के सामने खोलने जा रहे हैं। उनकी बहुप्रतीक्षित आत्मकथा “फॉरगोट: ऑटोबायोग्राफी ऑफ़ ए मिसफ़िट” (एक मिसफिट की आत्मकथा) इस साल के अंत तक बाज़ार में आने वाली है। यह किताब सिर्फ एक व्यक्ति के जीवन का सफरनामा नहीं है, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए एक मार्गदर्शिका है जो खुद को समाज की स्थापित मान्यताओं में फिट नहीं पाते। संजीव कुमार ने अपनी इस किताब में बड़ी बेबाकी से स्वीकार किया है कि समाज जिसे 'मिसफिट' कहता था, उन्होंने उसी अलग सोच को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया और सामाजिक उद्यम के क्षेत्र में एक नई पहचान स्थापित की।
इस आत्मकथा का सबसे जीवंत और प्रेरणादायक हिस्सा बकरी पालन (Goat Farming) के इर्द-गिर्द बुना गया है। संजीव कुमार बताते हैं कि कैसे एक छोटा सा जानवर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन सकता है। उन्होंने किताब में विस्तार से साझा किया है कि किस तरह कम निवेश में बकरी पालन को एक मुनाफे वाले व्यवसाय और सामाजिक उद्यम के रूप में बदला जा सकता है। यह पुस्तक उन रूढ़ियों को तोड़ती है जो पशुपालन को पिछड़ा काम मानती हैं। लेखक ने अपने प्रयोगों, शुरुआती असफलताओं और फिर एक टिकाऊ बिजनेस मॉडल तैयार करने के संघर्ष को बहुत ही व्यावहारिक ढंग से पेश किया है। वे बताते हैं कि कैसे बकरी पालन न केवल आजीविका का साधन है, बल्कि यह गांवों में पलायन रोकने और युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने का एक सशक्त हथियार भी है।
साहित्यिक और सामाजिक हलकों में इस पुस्तक को लेकर जबरदस्त चर्चा है, क्योंकि यह केवल सफलता की चमक-धमक वाली कहानी नहीं है। संजीव कुमार ने अपनी निजी जिंदगी के उन अनछुए पहलुओं और कठिन दौरों को भी ईमानदारी से उजागर किया है, जिनसे अक्सर लोग कतराते हैं। अपने रिश्तों, मुश्किल फैसलों और भावनात्मक उतार-चढ़ाव को उन्होंने एक खुली किताब की तरह रख दिया है। यह ईमानदारी पाठकों को उनके व्यक्तित्व की गहराई से जोड़ती है और यह समझाती है कि एक 'मिसफिट' व्यक्ति जब अपनी जिद पर अड़ जाए, तो वह समाज में कितना बड़ा बदलाव ला सकता है।
कुल मिलाकर, यह पुस्तक उन किसानों, युवाओं और उभरते हुए सामाजिक उद्यमियों के लिए एक 'हैंडबुक' की तरह है, जो जमीन से जुड़कर कुछ बड़ा करना चाहते हैं। ग्रामीण विकास और आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करने की दिशा में यह किताब एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। "एक मिसफिट की आत्मकथा" यह संदेश देती है कि अगर आप दुनिया के बनाए सांचों में फिट नहीं बैठते, तो घबराइए मत; शायद आप एक नई दुनिया रचने के लिए बने हैं। इस साल के अंत में प्रकाशित होने वाली यह कृति निश्चित रूप से पाठकों के सोचने के नजरिए को बदलने का माद्दा रखती है।