बिहार की इस ट्रेन के पूरे हुए 100 साल, आज भी बरकरार है विशेष पहचान, पटना रूट की है सबसे पसंदीदा गाड़ी
बिहार की सबसे पुरानी ट्रेन कौन सी है तो इसका एक जवाब मोकामा-पटना शटल है, जिसके परिचालन की शुरुआत 1926 में हुई थी. इस ट्रेन ने अपने परिचालन के 100 साल पूरे कर लिए हैं.
Train News: बिहार के रेलवे इतिहास का एक स्वर्णिम अध्याय 100 वर्ष पूरा कर गया। लाखों यात्रियों की यादों, रोजमर्रा की जिंदगी और सफर से जुड़ी प्रतिष्ठित "मोकामा शटल" ने अपनी सेवा के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। एक जून 1926 को शुरू हुई यह ट्रेन आज भी पटना और मोकामा के बीच हजारों छात्रों, कर्मचारियों, व्यापारियों और आम यात्रियों की जीवनरेखा बनी हुई है। आज भले ही इसे बरौनी-मोकामा-दानापुर शटल के नाम से जाना जाता हो, लेकिन इसकी पहचान अब भी "मोकामा शटल" के रूप में ही कायम है। यह सिर्फ एक ट्रेन नहीं, बल्कि बिहार के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक इतिहास का जीवंत हिस्सा है।
मोकामा से ही क्यों शुरू हुई थी शटल?
इस सवाल का जवाब बिहार के भूगोल और इतिहास में छिपा है। गंगा के दक्षिणी तट पर बसा मोकामा कभी उत्तर और दक्षिण बिहार को जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव हुआ करता था। "मोकामा" शब्द अरबी-फारसी मूल के शब्द "मक़ाम" से निकला माना जाता है, जिसका अर्थ होता है पड़ाव, ठिकाना या विश्राम स्थल। पटना जिला भी मोकामा से शुरू होता है और 89 किमी दूर पटना जंक्शन रेलवे स्टेशन है।
ब्रिटिश काल में जब मोकामा में गंगा नदी पर राजेंद्र सेतु का निर्माण नहीं हुआ था, तब गंगा पार करने के लिए स्टीमर और नाव ही प्रमुख साधन थे। बेगूसराय, समस्तीपुर और उत्तर बिहार के अन्य इलाकों से लोग पहले स्टीमर के जरिए मोकामा घाट पहुंचते थे और फिर यहां से ट्रेन पकड़कर पटना जाते थे। इसी वजह से मोकामा पूर्वी भारत का एक महत्वपूर्ण रेलवे और व्यापारिक केंद्र बन गया।
1926 में हुई थी शुरुआत
तत्कालीन ईस्ट इंडियन रेलवे (EIR) ने 1 जून 1926 को मोकामा से पटना के बीच शटल सेवा शुरू की थी। इसके संचालन की आधिकारिक सूचना 5 जून 1926 को 'बिहार हेराल्ड' अखबार में प्रकाशित हुई थी। उस दौर में ट्रेन मोकामा से सुबह रवाना होकर बाढ़, बख्तियारपुर, फतुहा और पटना सिटी होते हुए पटना जंक्शन पहुंचती थी। उस समय यह सीमित स्टेशनों पर रुकती थी और यात्रियों के लिए सबसे भरोसेमंद साधन मानी जाती थी।
आज भी बरकरार है विशेष पहचान
रेल यात्रियों के बीच मोकामा शटल की एक खास पहचान आज भी कायम है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि शटल किसी स्टेशन से रवाना हो जाए तो उसके पीछे आने वाली कई महत्वपूर्ण एक्सप्रेस और प्रीमियम ट्रेनों को भी उसके पीछे चलना पड़ता है। यही कारण है कि यह ट्रेन रेलवे परिचालन के लिहाज से भी विशेष महत्व रखती है। समय के साथ इसका विस्तार मोकामा से आगे बरौनी तक कर दिया गया। हालांकि यात्रियों का कहना है कि रूट बढ़ने के बाद इसकी समयबद्धता पर कुछ असर पड़ा है, लेकिन इसकी लोकप्रियता आज भी कम नहीं हुई है।
एक ट्रेन नहीं, एक सदी की विरासत
पिछले 100 वर्षों में बिहार ने अनेक बदलाव देखे, लेकिन मोकामा शटल ने हर दौर में लोगों को जोड़ने का काम किया। शिक्षा, रोजगार, व्यापार और सामाजिक संपर्क का माध्यम बनी यह ट्रेन आज भी हजारों लोगों की दैनिक जिंदगी का अभिन्न हिस्सा है। अपनी शताब्दी पूरी करने के साथ मोकामा शटल सिर्फ एक रेल सेवा नहीं, बल्कि बिहार की विरासत, विकास और जनजीवन की कहानी बन चुकी है।