Birthday Special : नरेंद्र मोदी का 25 वर्षों का राजनीतिक सफर, संगठन के अनुशासन से लेकर लगातार तीसरी बार पीएम बनने तक का दौर

Birthday Special : भारतीय राजनीति में संगठन, चुनावी रणनीति और प्रशासनिक क्षमता के संगम के रूप में नरेंद्र मोदी का सफर एक ऐतिहासिक पड़ाव पर है......पढ़िए आगे

मोदी का सियासी सफर - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : भारतीय राजनीति में कुछ नेता चुनाव जीतकर सत्ता तक पहुंचते हैं और कुछ नेता राजनीति की भाषा ही बदल देते हैं। नरेंद्र मोदी का राजनीतिक सफर इन दोनों प्रक्रियाओं का एक साथ उदाहरण है। यह यात्रा वडनगर की गलियों से शुरू होती है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संगठनात्मक अनुशासन से गुजरती है, भारतीय जनता पार्टी के विस्तार की रणनीति में आकार लेती है, गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में प्रशासनिक प्रयोगों से अपनी पहचान बनाती है और 2014 में दिल्ली पहुंचकर भारतीय राजनीति के एक नए दौर की नींव रखती है।  सितंबर 2026 में पीछे मुड़कर देखें तो नरेंद्र मोदी की राजनीति को केवल प्रधानमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल से समझना संभव नहीं है। उनके व्यक्तित्व और राजनीति की कई वर्षों में गढ़ी गई है। 17 सितंबर 1950 को गुजरात के वडनगर में जन्मे मोदी ने अपने शुरुआती जीवन के बारे में स्वयं जिस साधारण पारिवारिक पृष्ठभूमि का उल्लेख किया है, वह उनकी सार्वजनिक छवि का महत्वपूर्ण हिस्सा है। प्रधानमंत्री कार्यालय के आधिकारिक जीवन-वृत्त के अनुसार, उन्होंने युवावस्था में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ काम किया और बाद में भारतीय जनता पार्टी के संगठन में सक्रिय भूमिका निभाई। लेकिन नरेंद्र मोदी की कहानी को केवल ‘चाय बेचने वाले से प्रधानमंत्री’ की भावनात्मक कथा में सीमित करना उनके राजनीतिक विकास को छोटा करना होगा। उनके राजनीतिक व्यक्तित्व को समझने के लिए उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है—संगठन की समझ, चुनावी गणित की पकड़, संदेश निर्माण की क्षमता, प्रशासन को राजनीतिक ब्रांड में बदलने की कला और जनता के साथ सीधा संवाद स्थापित करने की शैली। इसीलिए मोदी का अध्ययन एक व्यक्ति की जीवनी से अधिक भारतीय राजनीति के पिछले लगभग पांच दशकों के बदलाव का अध्ययन भी है।

देर से शुरू हुआ राज्नित्श सफ़र 

नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत अपेक्षाकृत देर से शुरू हुई। राजनीति से पहले उनकी दीक्षा एक कुशल संगठनकर्त के तौर पर हुई। प्रधानमंत्री कार्यालय के जीवन-वृत्त के अनुसार, उन्होंने आरएसएस के साथ काम किया और 1970 के दशक में संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़े। बाद में भाजपा में आने के साथ उनका मुख्य क्षेत्र चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि संगठन खड़ा करना और उसे चुनावी मशीनरी में बदलना था। 1980 का दशक भारतीय जनता पार्टी के लिए विस्तार का दौर था। पार्टी तब कांग्रेस के सामने राष्ट्रीय स्तर पर सीमित प्रभाव वाली राजनीतिक शक्ति थी। गुजरात में मोदी का महत्व इस बात से बढ़ा कि वे संगठन को बूथ, कार्यकर्ता और चुनावी अभियान के स्तर पर व्यवस्थित करने वाले नेताओं में दिखाई देने लगे। 1987 में गुजरात भाजपा में उनकी सक्रिय राजनीतिक भूमिका का विस्तार हुआ। इसके बाद अहमदाबाद नगर निगम से लेकर विधानसभा चुनावों तक संगठन के विस्तार में उनकी भूमिका बढ़ी। भाजपा के आधिकारिक जीवन-वृत्त के अनुसार, 1990 और 1995 के गुजरात विधानसभा चुनावों में पार्टी के विस्तार में मोदी की संगठनात्मक भूमिका महत्वपूर्ण रही। यह वह समय था जब राम मंदिर आंदोलन, मंडल-कमंडल की राजनीति, कांग्रेस-विरोध और क्षेत्रीय दलों के उभार ने भारतीय राजनीति को बहुदलीय प्रतिस्पर्धा की दिशा में धकेल दिया था। मोदी ने इसी बदलते राजनीतिक परिदृश्य में संगठन को समझा। उनकी खासियत यह रही कि वे चुनाव को केवल भाषणों का माध्यम नहीं मानते थे। उम्मीदवार चयन, बूथ संगठन, कार्यकर्ता प्रबंधन, संदेश की एकरूपता और अभियान की समय-सारणी—इन सबको एक समग्र चुनावी परियोजना की तरह देखने की उनकी शैली धीरे-धीरे विकसित हुई। और, यही शैली आगे चलकर उनकी राष्ट्रीय राजनीति की पहचान बनी।

राष्ट्रीय संगठन का हिस्सा 

1990 के दशक में नरेंद्र मोदी गुजरात की सीमाओं से बाहर निकलकर भाजपा के राष्ट्रीय संगठन का हिस्सा बने। पार्टी ने उन्हें विभिन्न राज्यों की जिम्मेदारियां दीं। वे पार्टी के महासचिव (संगठन) के पद तक पहुंचे और अक्टूबर 2001 में गुजरात का मुख्यमंत्री बनने तक राष्ट्रीय संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे। यह दौर मोदी की राजनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां उन्होंने भारत को गुजरात से बाहर से देखा। जम्मू-कश्मीर, उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत के विभिन्न राज्यों में पार्टी संगठन के साथ काम करने से उन्हें भारत की सामाजिक और राजनीतिक विविधता का अनुभव हुआ। भाजपा के विस्तार की चुनौतियों ने उन्हें यह समझने का अवसर दिया कि हिंदुत्व की वैचारिक राजनीति को चुनावी राजनीति, क्षेत्रीय समीकरण और सामाजिक गठबंधनों के साथ कैसे जोड़ा जा सकता है। मोदी के शासन की एक विशेषता रही—केंद्रीकृत राजनीतिक संदेश और विकेंद्रीकृत कार्यान्वयन का मिश्रण। प्रधानमंत्री के स्तर पर संदेश स्पष्ट और उसे नीचे तक पहुंचाने के लिए पार्टी संगठन, सरकारी तंत्र, डिजिटल नेटवर्क और समर्थक संगठनों की व्यापक संरचना काम करती है। यह शैली पारंपरिक भारतीय राजनीति से अलग थी। हर नायक के जीवन में एक घटना ऐसी होती है जो उसके जीवन की दिशा और दशा को बदल देती है। नरेंद्र दामोदर दास मोदी के लिए वो घटना 7 अक्टूबर 2001 को घटी। इसी दिन नरेंद्र मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। यह नियुक्ति ऐसे समय हुई जब गुजरात जनवरी 2001 के विनाशकारी भूकंप, आर्थिक चुनौतियों और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा था। मुख्यमंत्री के रूप में मोदी के सामने दो समानांतर चुनौतियां थीं—प्रशासन को स्थिर करना और अपनी राजनीतिक पहचान बनाना। उन्होंने शासन को विकास, निवेश और प्रशासनिक दक्षता की भाषा में प्रस्तुत करना शुरू किया। और यहीं से ‘गुजरात मॉडल’ शब्द भारतीय राजनीति में प्रवेश करता है। वाइब्रेंट गुजरात निवेश सम्मेलन, औद्योगिक निवेश, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं पर जोर, कृषि क्षेत्र में सिंचाई और बिजली की उपलब्धता बढ़ाने के प्रयास तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं में तकनीक के इस्तेमाल ने मोदी को एक ऐसे मुख्यमंत्री की छवि दी जो विकास को राजनीतिक संदेश में बदल सकता था। लेकिन गुजरात का यह दौर केवल विकास की कहानी नहीं था। मोदी ने अभी गुजरात को गढ़ना शुरू ही किया था कि.. फरवरी 2002 में गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में आग लगने के बाद गुजरात में व्यापक सांप्रदायिक हिंसा हुई। हिंसा में बड़ी संख्या में लोगों की जान गई और मुस्लिम समुदाय विशेष रूप से प्रभावित हुआ। इस घटना ने नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन पर ऐसा प्रश्नचिह्न लगाया जिसका प्रभाव उनकी राष्ट्रीय राजनीति तक बना रहा। मोदी के आलोचकों ने तत्कालीन गुजरात सरकार पर हिंसा रोकने में पर्याप्त तत्परता नहीं दिखाने के आरोप लगाए। मोदी और उनकी सरकार ने इन आरोपों को स्वीकार नहीं किया। बाद के वर्षों में इस विषय पर कई जांच और न्यायिक प्रक्रियाएं हुईं। 2022 में सर्वोच्च न्यायालय ने जकिया जाफरी की याचिका से संबंधित मामले में विशेष जांच दल की रिपोर्ट के संदर्भ में आगे की कार्यवाही का रास्ता बंद किया और निचली अदालत द्वारा एसआईटी की क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के खिलाफ चुनौती को खारिज किया। यह न्यायिक स्थिति इस प्रकरण के कानूनी इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

पत्रकारिता की दृष्टि

फिर भी पत्रकारिता की दृष्टि से दो बातें अलग-अलग रखना जरूरी है। पहली—कानूनी प्रक्रिया में किसी व्यक्ति के विरुद्ध आपराधिक जिम्मेदारी सिद्ध होना एक प्रश्न है। दूसरी—2002 की हिंसा का सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव उससे कहीं व्यापक है। मोदी के समर्थकों के लिए यह अध्याय उनके खिलाफ लंबे समय तक चले राजनीतिक अभियान का उदाहरण रहा। आलोचकों के लिए यह गुजरात शासन और अल्पसंख्यक सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवालों का प्रतीक बना रहा। राष्ट्रीय राजनीति में मोदी की आगे की यात्रा में दोनों दृष्टिकोण लगातार साथ-साथ चलते रहे। 2002 के इन दंगों के बाद नरेंद्र मोदी ने अपनी राजनीति का केंद्र धीरे-धीरे ‘हिंदुत्व’ से ‘विकास’ की ओर शिफ्ट किया। यह कहना गलत होगा कि हिंदुत्व उनकी राजनीति से गायब हो गया। ऐसा नहीं हुआ। लेकिन सार्वजनिक राजनीतिक संदेश में आर्थिक विकास, निवेश, रोजगार, बुनियादी ढांचा और सुशासन की भाषा का महत्व बढ़ गया। ‘वाइब्रेंट गुजरात’ इसका प्रतीक बना। देश-विदेश के उद्योगपतियों और निवेशकों की मौजूदगी वाले इन सम्मेलनों ने गुजरात को निवेश के गंतव्य के रूप में प्रचारित किया। मोदी ने स्वयं को एक ऐसे मुख्यमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया जो सरकारी निर्णयों में तेजी और निवेश के लिए अनुकूल वातावरण चाहता है। आलोचकों ने सवाल उठाया कि आर्थिक विकास के आंकड़ों के साथ मानव विकास, पोषण, शिक्षा, रोजगार और सामाजिक असमानता जैसे संकेतकों को भी समान महत्व दिया जाना चाहिए। यानी गुजरात मॉडल पर विवाद केवल राजनीतिक नहीं था। यह विकास की परिभाषा को लेकर भी था। क्या विकास का अर्थ तेज औद्योगिक वृद्धि है? क्या विकास का अर्थ बुनियादी ढांचे का विस्तार है? क्या विकास का अंतिम पैमाना प्रति व्यक्ति आय है? या फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा भी उसी अनुपात में जरूरी हैं? मोदी के राष्ट्रीय अभियान में आगे चलकर यही बहस ‘विकास बनाम कल्याण’ नहीं बल्कि ‘विकास और कल्याण’ के संयुक्त राजनीतिक मॉडल में बदल गई।

गुजरात चुनाव के बाद

2012 के गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय भूमिका निर्णायक रूप से बढ़ी। जून 2013 में उन्हें भाजपा की राष्ट्रीय चुनाव अभियान समिति की जिम्मेदारी मिली और सितंबर 2013 में भाजपा ने उन्हें 2014 लोकसभा चुनाव के लिए प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया। यह निर्णय भाजपा के भीतर भी महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत था। भाजपा की राजनीति लंबे समय तक सामूहिक नेतृत्व और वरिष्ठ नेताओं की बहुस्तरीय संरचना पर आधारित रही थी। मोदी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बनने के साथ चुनावी अभियान तेजी से व्यक्तित्व-केंद्रित होता गया। 2014 का चुनाव सिर्फ भाजपा बनाम कांग्रेस नहीं रहा। वह ‘मोदी बनाम व्यवस्था’ की तरह प्रस्तुत किया गया।यूपीए-2 सरकार के अंतिम वर्षों में भ्रष्टाचार के आरोप, आर्थिक मंदी की धारणा, महंगाई, नीति-गतिरोध और शासन को लेकर असंतोष विपक्ष के लिए राजनीतिक अवसर बना रहे थे। मोदी ने इसे ‘अच्छे दिन’, विकास और निर्णायक नेतृत्व की भाषा में बदला। उनका अभियान पारंपरिक रैलियों से आगे था। 3D होलोग्राम, सोशल मीडिया, ‘चाय पर चर्चा’, मोबाइल प्रचार, बड़े पैमाने पर रैलियां और स्वयं नरेंद्र मोदी की अत्यधिक दृश्य उपस्थिति ने चुनावी संचार को बदल दिया। 2014 का नरेंद्र मोदी अभियान भारतीय चुनावी राजनीति के लिए डिजिटल युग की शुरुआत के बड़े उदाहरणों में गिना जा सकता है। 2014 में भाजपा ने लोकसभा की 543 सीटों में 282 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया। निर्वाचन आयोग के आंकड़े इस परिणाम की पुष्टि करते हैं। यह परिणाम इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि लंबे समय बाद किसी एक दल ने अपने दम पर लोकसभा में स्पष्ट बहुमत हासिल किया था। मोदी ने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। उनके सामने अब वह चुनौती थी जो किसी भी मुख्यमंत्री के सामने नहीं होती—भारत जैसे विशाल, विविध और संघीय देश को चलाना। गुजरात में निर्णय लेने की केंद्रीकृत शैली राष्ट्रीय स्तर पर सीधे लागू नहीं की जा सकती थी। केंद्र को राज्यों, संसद, न्यायपालिका, नौकरशाही, उद्योग, कृषि, विपक्ष और अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के साथ लगातार संतुलन बनाना था। मोदी सरकार ने शुरुआत से ही एक स्पष्ट राजनीतिक दर्शन प्रस्तुत किया—सरकार को ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ के साथ अधिक परिणाम देने वाला बनाना। पहला कार्यकाल : योजनाओं से राजनीतिक भाषा का निर्माण। 2014 से 2019 के बीच मोदी सरकार ने अनेक बड़े कार्यक्रम शुरू किए। जन धन योजना ने बैंकिंग व्यवस्था से बाहर आबादी को औपचारिक वित्तीय प्रणाली से जोड़ने का लक्ष्य रखा। स्वच्छ भारत अभियान ने शौचालय निर्माण और स्वच्छता को राष्ट्रीय राजनीतिक मुद्दा बनाया। उज्ज्वला योजना के जरिए गरीब परिवारों की महिलाओं को एलपीजी कनेक्शन देने पर जोर दिया गया। प्रधानमंत्री आवास योजना, सौभाग्य, ग्रामीण विद्युतीकरण, मुद्रा योजना, डिजिटल भुगतान और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी पहलों ने कल्याणकारी राज्य की पारंपरिक शैली को तकनीक के साथ जोड़ने की कोशिश की।मोदी की राजनीतिक शैली में एक महत्वपूर्ण बदलाव यहां दिखाई देता है। कल्याणकारी योजनाएं केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं रहीं; वे राजनीतिक संचार का हिस्सा बन गईं। एक लाभार्थी जब गैस कनेक्शन, शौचालय, बैंक खाता या आवास को अपने जीवन में देखता है तो योजना का राजनीतिक अर्थ बदल जाता है। अपने पहले ही कार्यकाल में पीएम मोदी ने नोटबंदी जैसा साहसिक निर्णय लिया..8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को कानूनी मुद्रा के रूप में वापस लेने की घोषणा की।सरकार ने इसके पीछे काले धन, नकली मुद्रा और आतंकवाद के वित्तपोषण के खिलाफ कार्रवाई सहित कई उद्देश्य बताए। लेकिन नोटबंदी भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे विवादास्पद आर्थिक फैसलों में शामिल हो गई। नकदी-आधारित अर्थव्यवस्था में अचानक मुद्रा परिवर्तन से छोटे कारोबार, असंगठित क्षेत्र और आम नागरिकों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2023 में नोटबंदी से जुड़ी याचिकाओं पर फैसला देते हुए बहुमत के आधार पर केंद्र सरकार के फैसले को कायम रखा, हालांकि निर्णय में प्रक्रिया और वैधानिक प्रावधानों को लेकर न्यायिक मतभेद भी दर्ज हुआ। नोटबंदी का मूल्यांकन आज भी दो अलग-अलग दृष्टिकोणों से होता है। एक दृष्टिकोण इसे डिजिटल भुगतान और औपचारिक अर्थव्यवस्था की दिशा में धक्का मानता है। दूसरा दृष्टिकोण इसकी आर्थिक लागत, विशेषकर नकदी-निर्भर असंगठित क्षेत्र पर पड़े प्रभाव को प्रमुख मानता है। राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण यह था कि मोदी ने इस फैसले को ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ आम आदमी की लड़ाई’ के रूप में प्रस्तुत किया। और कठिनाई को भी राष्ट्रहित में अस्थायी बलिदान की भाषा में बदल दिया। यह मोदी की राजनीतिक संचार शैली का महत्वपूर्ण उदाहरण था। 1 जुलाई 2017 को वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी लागू हुआ। यह स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े कर सुधारों में से एक था। जीएसटी का विचार मोदी सरकार से पहले भी मौजूद था और विभिन्न सरकारों ने इसकी दिशा में काम किया था। मोदी सरकार ने इसे लागू करने में राजनीतिक सहमति और संवैधानिक प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। जीएसटी ने अनेक केंद्रीय और राज्य अप्रत्यक्ष करों को एक साझा ढांचे में लाने की कोशिश की।

2019 का लोकसभा चुनाव 

2019 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी के राजनीतिक जीवन का दूसरा निर्णायक मोड़ था। भाजपा ने 303 सीटें जीतीं। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों में 2019 में भाजपा की 303 सीटें दर्ज हैं। 2014 में सत्ता-विरोधी लहर और कांग्रेस सरकार के प्रति असंतोष मोदी की जीत का बड़ा संदर्भ था। 2019 में भाजपा ने पांच साल की सत्ता के बाद भी अपनी सीटें बढ़ाईं। पुलवामा आतंकी हमले और बालाकोट एयरस्ट्राइक ने चुनावी विमर्श में राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रमुख स्थान दिया। इसके साथ मोदी सरकार की कल्याणकारी योजनाओं और मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता चुनावी अभियान का केंद्रीय हिस्सा रही। ‘मैं भी चौकीदार’ अभियान ने नेता और समर्थक के बीच डिजिटल पहचान का नया प्रयोग किया। 2019 का परिणाम इस बात का संकेत था कि मोदी अब सिर्फ भाजपा के नेता नहीं, बल्कि भाजपा की चुनावी पहचान का केंद्रीय चेहरा बन चुके थे। 2019 के बाद मोदी सरकार ने ऐसे फैसले किए जिनका प्रभाव भारत के संवैधानिक और राजनीतिक ढांचे पर लंबे समय तक रहने वाला है। इनमें जम्मू-कश्मीर से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 370 के विशेष प्रावधानों का प्रभाव समाप्त करना और राज्य का पुनर्गठन प्रमुख था। इस फैसले को मोदी सरकार ने राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया। दिसंबर 2023 में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने अनुच्छेद 370 से संबंधित याचिकाओं पर फैसला दिया। अदालत ने राष्ट्रपति के संवैधानिक आदेशों और अनुच्छेद 370 के प्रभाव को समाप्त करने की कार्रवाई को कायम रखा तथा जम्मू-कश्मीर के राज्य का दर्जा जल्द बहाल करने की बात कही। इस फैसले ने मोदी सरकार के एक सबसे बड़े संवैधानिक कदम को न्यायिक परीक्षण की कसौटी पर भी रखा। अयोध्या का राम मंदिर भाजपा की राजनीति में दशकों से केंद्रीय मुद्दा रहा है। 2019 में सर्वोच्च न्यायालय ने अयोध्या विवाद में राम जन्मभूमि स्थल पर मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट बनाने का निर्देश दिया और मस्जिद के लिए वैकल्पिक भूमि देने का आदेश दिया। 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा हुई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस समारोह के प्रमुख सार्वजनिक चेहरे रहे। यह घटना भाजपा की वैचारिक राजनीति के इतिहास में महत्वपूर्ण पड़ाव थी। राम मंदिर आंदोलन ने भाजपा के विस्तार में जिस भूमिका को निभाया था, उसका प्रतीकात्मक चरम 2024 में दिखाई दिया। मोदी की राजनीति ने धार्मिक प्रतीक और विकासात्मक राष्ट्रवाद को एक ही राजनीतिक कथा में जोड़ने का प्रयास किया।इसी कारण उनके राजनीतिक विमर्श में ‘विरासत’ और ‘विकास’ दोनों समानांतर चलते हैं। नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 भी मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के विवादास्पद निर्णयों में शामिल रहा। कानून ने पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदायों के कुछ प्रवासियों के लिए भारतीय नागरिकता की प्रक्रिया को विशेष प्रावधान दिया। सरकार ने इसे धार्मिक उत्पीड़न के शिकार अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने का मानवीय उपाय बताया। विरोधियों ने मुस्लिम समुदाय को इसमें शामिल न किए जाने को भारत के धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक ढांचे के संदर्भ में प्रश्नांकित किया। 2024 में इसके नियम अधिसूचित किए गए। यह विवाद मोदी राजनीति की व्यापक वैचारिक बहस को समझने के लिए महत्वपूर्ण है—जहां एक तरफ सरकार ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ की बात करती है, वहीं संविधान की समानता और धर्मनिरपेक्षता को लेकर विपक्ष और नागरिक समाज सवाल उठाते हैं। कोविड-19 : नेतृत्व की सबसे कठिन परीक्षा 2020 में कोविड-19 महामारी ने मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी प्रशासनिक चुनौतियों में से एक खड़ी की। मार्च 2020 में देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा हुई। लॉकडाउन ने संक्रमण की गति रोकने की कोशिश की, लेकिन इससे करोड़ों प्रवासी मजदूरों, छोटे व्यापारियों और असंगठित क्षेत्र पर गहरा असर पड़ा। 2021 की दूसरी लहर ने भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था की सीमाओं को उजागर कर दिया। ऑक्सीजन की कमी, अस्पतालों में दबाव और मृत्यु की बड़ी संख्या ने सरकार की तैयारी पर गंभीर प्रश्न उठाए। दूसरी तरफ, भारत का विशाल कोविड टीकाकरण अभियान भी सरकार की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना गया। मोदी ने महामारी के दौरान ‘जनभागीदारी’ को शासन का महत्वपूर्ण तत्व बनाया। थाली बजाने से लेकर दीप जलाने तक कई अभियानों ने महामारी को राष्ट्रीय सामूहिक अनुभव में बदलने की कोशिश की।इन प्रयोगों की प्रभावशीलता पर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि मोदी सरकार ने संकट के दौरान भी राजनीतिक संचार को शासन का हिस्सा बनाए रखा।

किसान आंदोलन : मोदी की राजनीति की सीमा का एक उदाहरण। 

2020 में तीन कृषि कानूनों को संसद ने पारित किया। सरकार का तर्क था कि इनसे कृषि बाजार में प्रतिस्पर्धा और निजी निवेश बढ़ेगा तथा किसानों को अपनी उपज बेचने के अधिक विकल्प मिलेंगे। लेकिन बड़ी संख्या में किसानों, विशेषकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश से जुड़े आंदोलनों ने इन कानूनों का विरोध किया। दिल्ली की सीमाओं पर लंबे समय तक चले किसान आंदोलन ने मोदी सरकार के सामने एक ऐसी चुनौती खड़ी की जिसमें केवल राजनीतिक संदेश पर्याप्त नहीं था। नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री ने तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा की। यह घटना मोदी के राजनीतिक जीवन में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताती है कि मजबूत बहुमत वाली सरकार भी जब किसी नीति के खिलाफ लंबे समय तक व्यापक सामाजिक आंदोलन खड़ा हो जाए तो उसे राजनीतिक निर्णय बदलना पड़ सकता है।यह मोदी की अजेय छवि का नहीं, लोकतांत्रिक राजनीति की जटिलता का उदाहरण था।

अर्थव्यवस्था : बड़े लक्ष्य और जटिल चुनौतियां

मोदी सरकार के वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार तेजी से बढ़ा और भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में ऊपर आया। सरकार ने मेक इन इंडिया, आत्मनिर्भर भारत, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं, बुनियादी ढांचे में निवेश और डिजिटल अर्थव्यवस्था को आर्थिक रणनीति के प्रमुख स्तंभों के रूप में आगे बढ़ाया। डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना—आधार, जन धन और मोबाइल के संयोजन—ने प्रत्यक्ष लाभ अंतरण और डिजिटल भुगतान को बड़े पैमाने पर बढ़ाया। लेकिन दूसरी तरफ रोजगार, विशेषकर युवाओं के लिए पर्याप्त गुणवत्तापूर्ण रोजगार, एक स्थायी राजनीतिक प्रश्न बना रहा। ग्रामीण आय, कृषि संकट, असंगठित क्षेत्र और आय असमानता पर भी बहस जारी रही। 2024 के चुनाव से पहले रॉयटर्स के विश्लेषण में आर्थिक विकास के साथ बेरोजगारी, ग्रामीण असमानता, किसानों की समस्याओं और कल्याणकारी योजनाओं को प्रमुख चुनावी मुद्दों के रूप में रेखांकित किया गया था। यानी मोदी सरकार की आर्थिक कहानी एकतरफा सफलता या एकतरफा विफलता के रूप में नहीं पढ़ी जा सकती।यह तेज आर्थिक विस्तार, बड़े बुनियादी ढांचे के निवेश और डिजिटल परिवर्तन के साथ रोजगार, असमानता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसी चुनौतियों का भी मिश्रण है।

विदेश नीति : प्रधानमंत्री से वैश्विक नेता तक

मोदी ने विदेश नीति को भी घरेलू राजनीति की तरह सार्वजनिक और दृश्य बनाया। उनकी विदेश यात्राएं, प्रवासी भारतीयों के बड़े कार्यक्रम, अमेरिका, यूरोप, पश्चिम एशिया, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ संबंध तथा क्वाड जैसे मंचों में भारत की सक्रियता ने प्रधानमंत्री पद की वैश्विक दृश्यता बढ़ाई। भारत की विदेश नीति में ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ और बहु-संरेखण की नीति भी दिखाई दी। अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध गहरे हुए, लेकिन रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंध जारी रहे। यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने पश्चिमी देशों की अपेक्षाओं के अनुरूप रूस की खुली निंदा से दूरी बनाए रखी और संवाद तथा कूटनीति पर जोर दिया। G20 की 2023 की भारतीय अध्यक्षता और नई दिल्ली शिखर सम्मेलन ने मोदी सरकार को वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में भारत की भूमिका प्रस्तुत करने का अवसर दिया।

अफ्रीकी संघ को G20 में स्थायी सदस्य बनाने का निर्णय भारत की अध्यक्षता के दौरान हुआ।

यह विदेश नीति का वह हिस्सा था जहां मोदी ने ‘भारत को विश्व मंच पर सम्मान दिलाने’ की राजनीतिक भाषा को लगातार मजबूत किया। ‘मोदी मॉडल’: सत्ता का केंद्रीकरण और व्यक्तिगत नेतृत्व मोदी की राजनीतिक शैली का शायद सबसे महत्वपूर्ण पहलू उनका व्यक्तित्व-केंद्रित नेतृत्व है। 2014 के बाद भाजपा का चुनावी अभियान तेजी से मोदी-केंद्रित हुआ। 2019 में यह और स्पष्ट हुआ। सरकारी योजनाओं की ब्रांडिंग में प्रधानमंत्री की तस्वीर और नाम की उपस्थिति ने सरकार और नेता के बीच राजनीतिक संबंध को मजबूत किया। इसका लाभ चुनावी राजनीति में मिला, लेकिन इसके साथ एक बड़ा प्रश्न भी पैदा हुआ—क्या पार्टी और सरकार का संस्थागत चरित्र कमजोर हो रहा है? आलोचक कहते हैं कि निर्णय प्रक्रिया प्रधानमंत्री कार्यालय के आसपास अत्यधिक केंद्रीकृत हुई है। समर्थक इसे निर्णायक और तेज शासन के रूप में देखते हैं। यहां दोनों बातों को एक साथ समझना आवश्यक है। केंद्रीकरण से निर्णय लेने की गति बढ़ सकती है, लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं में शक्ति का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। मोदी युग की भारतीय राजनीति में यही बहस बार-बार लौटती है।

मीडिया, विपक्ष और लोकतांत्रिक संस्थाएं

मोदी सरकार के आलोचकों ने मीडिया की स्वतंत्रता, जांच एजेंसियों के इस्तेमाल, विपक्षी नेताओं पर कार्रवाई और संसद में बहस के स्वरूप को लेकर प्रश्न उठाए हैं। 2024 के चुनाव से पहले रॉयटर्स ने भी विपक्षी नेताओं के खिलाफ जांच एजेंसियों की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक आरोपों और सरकार के खिलाफ आलोचनाओं को चुनावी मुद्दों का हिस्सा बताया था। इन आरोपों को तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा, क्योंकि राजनीतिक दलों की व्याख्याएं अलग-अलग हैं। लेकिन इतना निर्विवाद है कि मोदी युग में केंद्रीय जांच एजेंसियों, मीडिया की स्वतंत्रता, चुनावी वित्त और विपक्ष की राजनीतिक भूमिका को लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बहस तेज हुई है। साथ ही यह भी तथ्य है कि भारत में नियमित चुनाव होते रहे हैं, सत्ता का परिवर्तन राज्यों में लगातार हुआ है और मतदाताओं ने विभिन्न चुनावों में अलग-अलग दलों को जनादेश दिए हैं। इसलिए मोदी काल को न तो केवल ‘लोकतंत्र की मजबूती’ की कहानी माना जा सकता है और न ही केवल ‘लोकतंत्र के क्षरण’ की। यह दोनों दावों के बीच तथ्यात्मक परीक्षण की मांग करने वाला दौर है।

2024: तीसरी जीत और बदलती हुई राजनीतिक तस्वीर

2024 का लोकसभा चुनाव नरेंद्र मोदी की राजनीति के लिए एक नया अध्याय था। भाजपा ने 240 सीटें जीतीं—2014 की 282 और 2019 की 303 सीटों की तुलना में कम। लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए के पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या रही। 9 जून 2024 को नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। यहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बदलाव हुआ। 2014 और 2019 में मोदी सरकार का केंद्रीय आधार भाजपा का लोकसभा में अपना बहुमत था। 2024 में सरकार का आधार गठबंधन बना। इसका अर्थ यह नहीं कि मोदी की राजनीतिक शक्ति समाप्त हो गई। लेकिन सत्ता के संचालन की परिस्थितियां बदल गईं। अब सहयोगी दलों की भूमिका बढ़ी। आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों की राजनीति का महत्व राष्ट्रीय सत्ता के समीकरण में अधिक दिखाई देने लगा। यही 2024 का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश था—मोदी युग जारी रहा, लेकिन उसका संसदीय ढांचा बदल गया। 2024 के चुनाव परिणाम को केवल ‘मोदी की जीत’ कहना अधूरा होगा। यह भाजपा के लिए 2014 और 2019 की तुलना में सीटों में कमी का चुनाव था। उत्तर प्रदेश,  महाराष्ट्र जैसे महत्वपूर्ण राज्य में भाजपा को अपेक्षा से कम सीटें मिलीं। रॉयटर्स के चुनाव-पश्चात विश्लेषण ने भी ग्रामीण क्षेत्रों में भाजपा के कमजोर प्रदर्शन और किसानों से जुड़े आर्थिक मुद्दों को महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में रेखांकित किया।लेकिन दूसरी ओर मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने और भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर सबसे बड़ा दल बनी रही। इसलिए 2024 को मोदी की राजनीति की समाप्ति नहीं बल्कि उसके अगले चरण की शुरुआत कहना अधिक तथ्यात्मक होगा।

तीसरा कार्यकाल : बहुमत से गठबंधन की ओर

तीसरे कार्यकाल में नरेंद्र मोदी के सामने पहली बार वह राजनीतिक चुनौती है जिसमें भाजपा को सहयोगी दलों के साथ सत्ता साझा करनी है। इसका असर नीतिगत निर्णयों पर भी पड़ सकता है। गठबंधन राजनीति में निर्णय लेने के लिए अधिक परामर्श और राजनीतिक संतुलन की आवश्यकता होती है। फिर भी प्रधानमंत्री के रूप में मोदी के सामने 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य है। सरकार ने बुनियादी ढांचा, विनिर्माण, सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, डिजिटल अर्थव्यवस्था, हरित ऊर्जा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में भारत की भूमिका को बढ़ाने को प्राथमिकता दी है। तीसरे कार्यकाल की राजनीति का बड़ा प्रश्न यही है कि क्या मोदी अपने पहले दो कार्यकाल की केंद्रीकृत निर्णय शैली को गठबंधन युग की राजनीति के साथ संतुलित कर पाएंगे।

मोदी और ‘लाभार्थी वर्ग’ की राजनीति

मोदी युग में भारतीय चुनावी राजनीति में एक नया सामाजिक समूह प्रमुखता से उभरा—लाभार्थी। गरीब महिलाओं को गैस कनेक्शन, शौचालय, आवास, बैंक खाते, मुफ्त अनाज, बिजली, नल का पानी और स्वास्थ्य बीमा जैसी योजनाओं का सीधा लाभ मिला। इस मॉडल ने जाति और समुदाय की पारंपरिक राजनीतिक गणित को पूरी तरह खत्म नहीं किया, लेकिन उसके ऊपर एक नई परत जरूर जोड़ दी। एक गरीब मतदाता एक साथ यादव, दलित, महिला, किसान या अल्पसंख्यक हो सकता है—लेकिन वह प्रधानमंत्री आवास का लाभार्थी भी हो सकता है। भाजपा ने इस दूसरी पहचान को राजनीतिक रूप से संगठित करने का प्रयास किया।

हिंदुत्व और विकास : मोदी की राजनीति के दो स्तंभ

नरेंद्र मोदी की राजनीति को केवल हिंदुत्व के आधार पर समझना अधूरा है। उसे केवल विकास की राजनीति कहना भी अधूरा है। उनकी राजनीति की दो समानांतर धाराएं हैं। एक तरफ सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदुत्व, राम मंदिर, अनुच्छेद 370 और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दे हैं। दूसरी तरफ सड़क, रेल, डिजिटल भुगतान, आवास, गैस, स्वास्थ्य, कल्याण योजनाएं, निवेश और आर्थिक विकास हैं। मोदी की राजनीतिक सफलता का एक बड़ा कारण यही माना जा सकता है कि उन्होंने इन दोनों धाराओं को एक-दूसरे का विकल्प बनाने के बजाय एक संयुक्त राजनीतिक कथा में रखा।

मोदी की संचार कला

नरेंद्र मोदी की राजनीति का एक पहलू जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, वह है उनका संचार। ‘मन की बात’ रेडियो कार्यक्रम से लेकर सोशल मीडिया, वीडियो संदेश, बड़े सार्वजनिक भाषण, डिजिटल अभियानों और अंतरराष्ट्रीय मंचों तक मोदी लगातार संवाद करते हैं। उनकी भाषा में छोटे वाक्य, दोहराए जाने वाले नारे और सीधे संबोधन की शैली है। ‘सबका साथ, सबका विकास’, ‘आत्मनिर्भर भारत’, ‘विकसित भारत’, ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत’, ‘नारी शक्ति’, ‘अमृत काल’—ये केवल सरकारी नारे नहीं रहे; इन्होंने शासन की राजनीतिक शब्दावली बनाई। मोदी जानते हैं कि आधुनिक लोकतंत्र में नीतियां केवल बनती नहीं हैं, उन्हें समझाया भी जाता है। इस मामले में उनकी शैली पारंपरिक राजनीतिक नेताओं से काफी अलग रही है।

विरोध और आलोचना : लोकतांत्रिक राजनीति का दूसरा पक्ष

किसी भी लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेता की तरह नरेंद्र मोदी की राजनीति के साथ मजबूत विरोध भी जुड़ा है।उनके आलोचक कई मुद्दे उठाते हैं—बेरोजगारी और रोजगार की गुणवत्ता; किसानों की आय और कृषि संकट; आय और संपत्ति में असमानता; अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और प्रतिनिधित्व; नागरिक स्वतंत्रताओं से जुड़े प्रश्न; मीडिया की स्वतंत्रता;जांच एजेंसियों के राजनीतिक उपयोग के आरोप; संसद में विपक्ष की भूमिका; संस्थाओं के केंद्रीकरण की धारणा। दूसरी ओर समर्थक इन आलोचनाओं के सामने डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, बुनियादी ढांचे के निर्माण, कल्याणकारी योजनाओं, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, आर्थिक औपचारिकीकरण, वैश्विक कूटनीति और राष्ट्रीय सुरक्षा को सरकार के पक्ष में प्रमुख उपलब्धियों के रूप में रखते हैं। 

मोदी की राजनीतिक यात्रा का सबसे बड़ा परिवर्तन : भाजपा से मोदी, और मोदी से भाजपा

2014 से पहले भाजपा नरेंद्र मोदी से बड़ी राजनीतिक संस्था थी। 2014 के बाद धीरे-धीरे यह समीकरण बदला। भाजपा का चुनावी अभियान मोदी के नेतृत्व के इर्द-गिर्द केंद्रित हुआ। लेकिन तीसरे कार्यकाल में एक नया प्रश्न सामने है—क्या मोदी के बाद भाजपा की राजनीति उसी केंद्रीयता के साथ आगे बढ़ सकेगी? यह भविष्य का प्रश्न है और इसका उत्तर आज देना राजनीतिक भविष्यवाणी होगा। लेकिन एक तथ्य स्पष्ट है। मोदी ने भाजपा की राजनीति को केवल चुनाव जितने की मशीन से बदलकर एक व्यापक राजनीतिक-सामाजिक परियोजना का रूप दिया है। पार्टी का विस्तार दक्षिण और पूर्व के राज्यों तक हुआ। भाजपा ने उन सामाजिक समूहों तक पहुंच बनाई जो कभी उसके पारंपरिक मतदाता नहीं माने जाते थे। हालांकि, इस विस्तार में मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता, संगठन और आरएसएस की जमीनी संरचना—तीनों की भूमिका रही।

इतिहास नरेंद्र मोदी को किस रूप में याद करेगा?

यह प्रश्न अभी खुला है। इतिहास तत्काल फैसला नहीं देता। नरेंद्र मोदी का राजनीतिक जीवन अभी जारी है। सितंबर 2026 में वे प्रधानमंत्री के रूप में अपने तीसरे कार्यकाल में हैं और 2001 से केंद्र तथा राज्य सरकार के शीर्ष नेतृत्व में उनका सार्वजनिक जीवन 25 वर्ष से अधिक का हो चुका है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने 2025 में उनके 25वें वर्ष के अवसर पर इस लंबी राजनीतिक यात्रा का उल्लेख किया था। इतिहासकारों के लिए उनके मूल्यांकन के कई पैमाने होंगे। यह एक ऐसे नेता की कहानी है जिसने हिंदुत्व, राष्ट्रवाद, कल्याण और विकास को एक साझा राजनीतिक आख्यान में पिरोया। और अंततः यह भारतीय लोकतंत्र की कहानी है—जहां एक साधारण पृष्ठभूमि से निकला व्यक्ति देश के सर्वोच्च निर्वाचित पद तक पहुंच सकता है, लगातार चुनाव जीत सकता है, अपनी पार्टी को राष्ट्रीय राजनीति का केंद्र बना सकता है और फिर उसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता के बदलते जनादेश के अनुसार सत्ता की संरचना को गठबंधन की दिशा में जाते हुए देख सकता है। नरेंद्र मोदी का राजनीतिक अध्याय अभी समाप्त नहीं हुआ है। इसलिए उनके बारे में अंतिम फैसला देना इतिहास का काम होगा, पत्रकारिता का नहीं।

धीरेंद्र की कलम से