Patna High Court: आरक्षण पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, इस कारण नहीं छीन सकते रिजर्वेशन का अधिकार
Patna High Court: बिहार में आरक्षण और सरकारी नौकरी से जुड़े एक अहम मामले में पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। ...
Patna High Court: बिहार में आरक्षण और सरकारी नौकरी से जुड़े एक अहम मामले में पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी विवाहित महिला अभ्यर्थी का जाति प्रमाणपत्र सिर्फ इसलिए अमान्य नहीं किया जा सकता कि उसमें पिता की जगह पति का नाम दर्ज है। जाति का निर्धारण जन्म के आधार पर होता है और विवाह के बाद महिला की जाति नहीं बदल जाती। जाति प्रमाणपत्र इस सामाजिक पहचान की पुष्टि करने वाला दस्तावेज है। इस फैसले के साथ अदालत ने बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC) को महिला डॉक्टर को अनुसूचित जाति आरक्षण के आधार पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया है। कोर्ट के इस आदेश को विवाहित महिलाओं के आरक्षण अधिकारों और सरकारी भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेजी शर्तों को लेकर अहम नजीर माना जा रहा है।
दो जजों की खंडपीठ ने खारिज की BPSC की अपील
इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मोहित कुमार शाह और न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडेय की खंडपीठ ने की। अदालत ने बिहार लोक सेवा आयोग की अपील खारिज करते हुए एकलपीठ के पूर्व फैसले को बरकरार रखा।खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि जब भर्ती विज्ञापन में जाति प्रमाणपत्र पर पिता का नाम दर्ज होना अनिवार्य नहीं किया गया था, तब केवल पति का नाम दर्ज होने के आधार पर किसी महिला अभ्यर्थी को आरक्षण के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता।
डॉ. सुषमा शरण की नियुक्ति से जुड़ा है मामला
पूरा मामला डॉ. सुषमा शरण से संबंधित है। उन्होंने BPSC के विज्ञापन संख्या 20/2017 के तहत स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में सहायक प्राध्यापक के पद के लिए आवेदन किया था। उन्होंने अनुसूचित जाति महिला आरक्षित श्रेणी से अपनी उम्मीदवारी पेश की थी।इस भर्ती प्रक्रिया के तहत कुल 74 पदों पर नियुक्ति होनी थी। इनमें 13 पद अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों के लिए आरक्षित थे, जबकि पांच पद अनुसूचित जाति महिला श्रेणी के लिए निर्धारित थे।डॉ. सुषमा शरण का साक्षात्कार 28 फरवरी 2018 को हुआ था। इसके बाद आयोग ने 8 अगस्त 2019 को अंतिम परिणाम जारी किया, लेकिन उसमें उनका नाम शामिल नहीं किया गया।
पति का नाम होने पर BPSC ने रद्द की थी आरक्षण की पात्रता
BPSC की ओर से दलील दी गई थी कि डॉ. सुषमा शरण के जाति प्रमाणपत्र में पिता के स्थान पर पति का नाम दर्ज था। आयोग ने वर्ष 2018 में उन्हें नोटिस जारी कर सही प्रमाणपत्र जमा करने का अवसर भी दिया था।आयोग के मुताबिक, निर्धारित प्रमाणपत्र प्रस्तुत नहीं किए जाने के कारण उनकी उम्मीदवारी को अनुसूचित जाति महिला आरक्षित श्रेणी के बजाय अनारक्षित श्रेणी में माना गया।इसके खिलाफ महिला डॉक्टर ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उनकी ओर से दलील दी गई कि भर्ती विज्ञापन में ऐसी कोई अनिवार्य शर्त नहीं थी कि जाति प्रमाणपत्र में पिता का ही नाम दर्ज होना चाहिए। उन्होंने यह भी बताया कि उनके पिता और पति दोनों अनुसूचित जाति से संबंधित हैं।
कोर्ट ने कहा- तकनीकी आधार पर नहीं छीन सकते आरक्षण का अधिकार
मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने भर्ती विज्ञापन की शर्तों और जाति प्रमाणपत्र से जुड़े विवाद पर विचार किया। अदालत ने कहा कि जाति जन्म से निर्धारित होती है। विवाह के बाद महिला की जातिगत पहचान समाप्त नहीं होती और प्रमाणपत्र में पति का नाम दर्ज होना अपने आप में उसे अमान्य करने का आधार नहीं बन सकता।कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब विज्ञापन में पिता का नाम दर्ज करने की अनिवार्यता नहीं थी, तब आयोग इस आधार पर महिला अभ्यर्थी को आरक्षण के वैध लाभ से वंचित नहीं कर सकता।
BPSC को आरक्षण के आधार पर नियुक्ति का निर्देश
पटना हाईकोर्ट ने एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए BPSC की अपील खारिज कर दी। साथ ही आयोग को निर्देश दिया कि डॉ. सुषमा शरण की अनुसूचित जाति आरक्षण के आधार पर नियुक्ति सुनिश्चित की जाए।इस फैसले से सरकारी नौकरी की भर्ती प्रक्रिया में दस्तावेजों की तकनीकी शर्तों और आरक्षण के वास्तविक अधिकार के बीच अंतर को लेकर महत्वपूर्ण संदेश गया है। अदालत ने साफ कर दिया कि बिना विज्ञापन में निर्धारित शर्त के किसी अभ्यर्थी को केवल प्रमाणपत्र में पति का नाम दर्ज होने के कारण आरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता।