परीक्षा में नकल को आखिर पटना हाईकोर्ट ने क्यो कहा प्लेग जैसी महामारी, पढ़िए

Patna High Court: पटना हाइकोर्ट ने परीक्षा में नकल और अनुचित साधनों के इस्तेमाल को लेकर पटना हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की है।..

Patna High Court: पटना हाइकोर्ट ने परीक्षा में नकल और अनुचित साधनों के इस्तेमाल को लेकर पटना हाईकोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की है। जस्टिस हरीश कुमार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि परीक्षा में कॉपी और चीटिंग ‘प्लेग’ की तरह है। यह एक ऐसी महामारी है, जो समाज और किसी भी देश की शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद कर सकती है। 

यदि इस इसी तरह छोड़ दिया गया या इसमें नरमी बरती गई ,तो इसके गंभीर दुष्परिणाम हो सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि देश की प्रगति के लिए शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता और परीक्षा की सुचिता अचूक होनी चाहिए।

 ये मामला आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी से जुड़े एमबीबीएस छात्र अरविंद कुमार मेहता का है।इस छात्र पर आरोप था कि उसने 3rd Professional MBBS Part-I की ENT परीक्षा में अपनी जगह अब्दुल/अभिषेक कुमार को बैठाया। परीक्षा केंद्र पर मामला पकड़े जाने के बाद यूनिवर्सिटी ने जांच की और अनफेयरमीन्स कमेटी की अनुशंसा पर छात्र का दाखिला रद्द कर उसे यूनिवर्सिटी से निष्कासित कर दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से वरीय अधिवक्ता वाई.वी. गिरी ने मुख्य रूप से दलील दी कि इसी तरह के मामले में पहले हाईकोर्ट ने स्थायी निष्कासन की सजा को अत्यधिक कठोर और अनुपातहीन मानते हुए तीन वर्ष के निष्कासन में बदल दिया था।उनके अनुसार जब सह-आरोपी छात्र अभिषेक कुमार समेत समान स्थिति वाले छात्रों को राहत मिली है, तो याचिकाकर्ता को भी समान व्यवहार मिलना चाहिए। समान परिस्थिति में समान व्यवहार न्याय का मूल सिद्धांत है।

गिरी ने यह भी तर्क दिया कि आर्यभट्ट नॉलेज यूनिवर्सिटी एक्ट और Statute 2011 के तहत कुलपति के पास अनुशासनात्मक कार्रवाई में दंड के चयन का विवेकाधिकार है। यूनिवर्सिटी के अधीनस्थ नियम इस वैधानिक विवेकाधिकार को खत्म नहीं कर सकते। उनका कहना था कि कुलपति को प्रत्येक मामले के तथ्यों और छात्र के भविष्य को ध्यान में रखकर दंड तय करना चाहिए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों तथा यूपी राज्य बनाम अरविंद कुमार श्रीवास्तव के आधार पर कहा कि समान स्थिति वाले लोगों को समान राहत नहीं देना संविधान के अनुच्छेद 14 के विरुद्ध होगा।

यूनिवर्सिटी की ओर से वरीय अधिवक्ता पी.के. वर्मा ने इन दलीलों का जोरदार विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह तथ्य विवादित नहीं है कि छात्र ने अपनी जगह दूसरे व्यक्ति को परीक्षा में बैठने दिया और यह तथ्य उसके शो-कॉज जवाब से भी स्पष्ट होता है। 

इसलिए इम्पर्सोनेशन का आरोप साबित है और छात्र पर यूनिवर्सिटी के कदाचार से सम्बन्धित  कानून लागू होंगे। नियम के Clause 5.1(c) में ऐसे छात्र का दाखिला रद्द कर उसे यूनिवर्सिटी से निष्कासित करने का स्पष्ट प्रावधान है।

वर्मा ने कहा कि जांच में इन्विजिलेटर, सेंटर सुपरिटेंडेंट और ऑब्जर्वर की रिपोर्ट से आरोप की पुष्टि हुई। छात्र को शो-कॉज और व्यक्तिगत सुनवाई का पूरा अवसर मिला। इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का कोई उल्लंघन नहीं हुआ। न्यायिक समीक्षा में अदालत को विभागीय जांच की अपील की तरह साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं करना चाहिए।

वर्मा ने यह भी दलील दी कि यह महज परीक्षा में अनुचित साधन का मामला नहीं, बल्कि समाज से जुड़ा गंभीर अपराध है। उनके अनुसार ऐसे मामलों में सहानुभूति की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए, क्योंकि इस तरह के अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं और समाज के लिए गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं।

राज्य सरकार की ओर से जीपी-2 प्रशांत प्रताप ने दलील दी कि जिस फैसले के आधार पर याचिकाकर्ता समान राहत की मांग कर रहा है, वह निर्णय हाईकोर्ट के पहले के प्रशांत भारती बनाम आर्यभट्ट नालेज यूनिवर्सिटी मामले के निर्णय को ध्यान में रखे बिना दिया गया था। उन्होंने कहा कि यदि वह फैसला ही पूर्ववर्ती बाध्यकारी निर्णय को नजरअंदाज कर दिया गया है, तो उसके आधार पर याचिकाकर्ता समानता का दावा नहीं कर सकता।प्रशांत प्रताप ने यह भी बताया कि यूनिवर्सिटी ने उक्त फैसले की वैधता को पहले ही एलपीए 613/ 2026 तथा अन्य संबद्ध अपीलों के माध्यम से चुनौती दी है। इसलिए उस फैसले को अंतिम और निर्णायक मानकर वर्तमान याचिकाकर्ता को राहत देना उचित नहीं होगा।

  अधिवक्ता प्रशांत प्रताप की दलील पर वरीय अधिवकता गिरी ने कहा कि प्रशांत भारती का मामला अलग था। उस मामले में Statute 2011 के Section 27(d), जिसके तहत कुलपति को विभिन्न दंडों में से उचित दंड चुनने का अधिकार मिलता है, पर विचार ही नहीं हुआ था।   इस  पर हाईकोर्ट ने कहा दो फैसलों में मतभेद, अब डिवीजन बेंच फैसला करेगा।

जस्टिस हरीश कुमार ने दोनों पक्षों की दलीलों और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों पर विचार करने के बाद कहा कि भावेश कुमार भास्कर  मामले में दिए गए निष्कर्ष पर आगे विचार की जरूरत है। कोर्ट ने पाया कि पहले के प्रशांत भारती फैसले में Statute 2011 के Section 27(d) के प्रभाव पर विचार नहीं हुआ था। साथ ही दोनों फैसलों में महत्वपूर्ण अंतर सामने आया है।कोर्ट ने यह भी कहा कि परीक्षा में चीटिंग करने वालों के प्रति महज सहानुभूति दिखाने से उन छात्रों के साथ अन्याय होगा, जिन्होंने मेहनत कर अपनी योग्यता साबित की है। ऐसे छात्रों को अनुचित साधनों से आगे निकलने देना पूरी शैक्षणिक व्यवस्था की विश्वसनीयता को कमजोर करेगा।अंततः जस्टिस हरीश कुमार ने न्यायिक अनुशासन और दोनों फैसलों के बीच मतभेद को देखते हुए मामले को डिवीजन बेंच को संदर्भित कर दिया।

 कोर्ट ने कहा कि इससे दोनों दृष्टिकोणों पर अंतिम स्पष्टता मिल सकेगी। यूनिवर्सिटी द्वारा दायर एलपीए No. 613 / 2026 के साथ इस मामले को भी रखने का निर्देश दिया गया है। फिलहाल याचिका का परिणाम डिवीजन बेंच के अंतिम फैसले पर निर्भर रहेगा।