पटना हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट में निचली अदालत के फैसले पर लगाई रोक, कहा - केस में सही आकलन नहीं किया
पटना हाईकोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) एक्ट के तहत सजा काट रहे एक व्यक्ति को पीड़िता की उम्र के सही आकलन न होने के कारण बड़ी राहत दी है। जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सोनी श्रीवास्तव की खंडपीठ ने मुहम्मद कुर्बान की आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए उसे
Patna - पटना हाईकोर्ट ने उम्र के निर्धारण (Determination of Age) को आधार बनाते हुए पॉक्सो एक्ट के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने माना कि निचली अदालत द्वारा पीड़िता की उम्र का सही आकलन नहीं किया गया था, जिसके कारण आरोपी को दी गई सजा न्यायोचित नहीं है। 'मार्जिन ऑफ एरर' के सिद्धांत को अपनाते हुए जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सोनी श्रीवास्तव की खंडपीठ ने मोहम्मद कुर्बान को तुरंत रिहा करने का आदेश दिया है।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला भागलपुर जिले के सबौर थाना (कांड संख्या 361/2018) से जुड़ा है। सूचक के अनुसार, उनकी 14 वर्षीय बेटी ट्यूशन के लिए घर से निकली थी लेकिन वापस नहीं लौटी। काफी खोजबीन के बाद भी जब वह नहीं मिली, तो थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई गई। पुलिस ने अनुसंधान के दौरान मामले में पॉक्सो एक्ट की धाराएं भी जोड़ दी थीं।
निचली अदालत ने सुनाई थी उम्रकैद और आर्थिक दंड
भागलपुर के एडिशनल एवं सेशन जज ने मामले की सुनवाई के बाद मोहम्मद कुर्बान को दोषी करार दिया था। कोर्ट ने उसे पॉक्सो एक्ट के तहत कारावास की लंबी सजा और आर्थिक दंड के साथ अन्य धाराओं में भी सजा सुनाई थी। इस फैसले को मोहम्मद कुर्बान ने पटना हाईकोर्ट में चुनौती दी थी, जिसमें मुख्य आधार पीड़िता की उम्र को बनाया गया था।
हाईकोर्ट में 'मार्जिन ऑफ एरर' बना जीत का आधार
अपील पर सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मेडिकल साक्ष्यों का गहराई से अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि:
मेडिकल रिपोर्ट: डॉक्टरों ने मेडिकल जांच के आधार पर पीड़िता की उम्र 16 से 18 वर्ष के बीच बताई थी।
मार्जिन ऑफ एरर: कानून और चिकित्सा विज्ञान के स्थापित सिद्धांतों के अनुसार, उम्र के आकलन में दो वर्ष का अंतर (Margin of Error) माना जा सकता है।
अंतिम निष्कर्ष: इस सिद्धांत के तहत कोर्ट ने पीड़िता की उम्र 18 से 20 वर्ष के बीच मानी, जिससे वह पॉक्सो एक्ट (जो 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए है) के दायरे से बाहर हो गई।
रिहाई का आदेश
अदालत ने कहा कि चूंकि पीड़िता की उम्र कानूनी रूप से 18 वर्ष से अधिक मानी जा सकती है, इसलिए पॉक्सो एक्ट के तहत दी गई सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने अपीलार्थी मोहम्मद कुर्बान को तत्काल सजा से मुक्त करने का आदेश दिया, बशर्ते उसके विरुद्ध कोई अन्य आपराधिक मामला लंबित न हो।