Bihar News : पटना हाईकोर्ट ने द्वेषपूर्ण मुकदमों पर दिखाई सख्ती , व्यक्तिगत रंजिश के लिए आपराधिक कार्यवाही और संज्ञान आदेश किया रद्द

Bihar News : पटना हाईकोर्ट की एकल पीठ की अध्यक्षता कर रही न्यायमूर्ति सोनी श्रीवास्तव ने व्यक्तिगत रंजिश और बदले की भावना से दर्ज कराए गए मुकदमों पर कड़ा रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

पटना हाईकोर्ट सख्त - फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : पटना हाईकोर्ट ने द्वेषपूर्ण अनावश्यक मुकदमेबाजी पर कड़ा रुख अपनाया। जस्टिस सोनी श्रीवास्तव ने द्वेषपूर्ण आपराधिक कार्रवाई को रद्द किया। व्यक्तिगत रंजिश के लिए आपराधिक न्यायशास्त्र के दुरुपयोग के खिलाफ एक कड़ा संदेश देते हुए, हाईकोर्ट  ने एक शिकायत मामलें से उत्पन्न संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।  कोर्ट ने यांत्रिक न्यायिक कार्रवाइयों और पूर्व-संज्ञान वैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन न करने की कड़ी निंदा की है। राकेश कुमार तिवारी बनाम बिहार राज्य व अन्य (आपराधिक विविध सं. 60085/2023) मामले में अपना विस्तृत CAV फैसला सुनाते हुए जस्टिस सोनी श्रीवास्तव ने न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, पटना द्वारा पारित 5 मई, 2025 के संज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने पाया कि यह अभियोजन स्पष्ट रूप से निरर्थक, परेशान करने वाला और दुर्भावनापूर्ण था।

इस विवाद की शुरुआत पुलिस जांच से लेकर विरोध याचिका तक कानूनी लड़ाई की शुरुआत विरोधी पक्ष संख्या 2 (शिकायतकर्ता) शीला तिवारी द्वारा 20 अक्टूबर, 2022 को दर्ज कराई गई एक शिकायत से हुई थी।इसे बाद में सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत जांच के लिए भेजा गया और कदमकुआं थाना कांड संख्या 281/2023 दर्ज किया गया। हालांकि,  एफिडेविट दर्ज होने के महज एक महीने के भीतर शिकायतकर्ता ने अपनी पुरानी शिकायतों का हूबहू दोहराव करते हुए एक विरोध याचिका दायर की। हाईकोर्ट के समक्ष मामला रद्द संबंधित याचिका के लंबित रहने के दौरान, पुलिस ने 30 अप्रैल, 2024 को अंतिम रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) सौंप दी, जिसमें मामले को झूठा पाया गया। निचली अदालत ने इस रिपोर्ट को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया। हालांकि, इसके साथ ही निचली अदालत ने लंबित विरोध याचिका को शिकायत मानकर बयान दर्ज किए और 5 मई, 2025 को आईपीसी की धारा 384 (रंगदारी/extortion) के तहत संज्ञान ले लिया।तकनीकी बाधाओं को खारिज कर न्याय को प्राथमिकता सुनवाई के दौरान, विपरीत पक्ष द्वारा बाद के संज्ञान आदेश को चुनौती देने के लिए दायर अंतरिम आवेदन की पोषणीयता पर एक प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई। तर्क दिया गया कि मूल एफआईआर की चुनौती अब निष्प्रभावी हो चुका है, इसलिए नई याचिका दायर की जानी चाहिए थी। सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक सिद्धांतों—जैसे सुगंधा बनाम पी. राजकुमार ((2020) 10 SCC 706) और कलेक्टर (LA) बनाम कातीजी ((1987) 2 SCC 107) का हवाला देते हुए जस्टिस श्रीवास्तव ने इस तकनीकी आपत्ति को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता को सीआरपीसी की धारा 482 / बीएनएसएस  की धारा 528 के तहत एक नया आवेदन दायर करने के लिए मजबूर करने से केवल मुकदमों की संख्या बढ़ेगी, कीमती न्यायिक समय नष्ट होगा और प्रक्रियात्मक देरी होगी, जबकि अदालत पहले से ही इस मामले पर गहराई से विचार कर रही थी।

कोर्ट ने.बेतुके आरोप और निर्दोषता का साक्ष्य 

मामलें के तथ्यों पर जस्टिस श्रीवास्तव ने याचिकाकर्ता राकेश कुमार तिवारी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की पूरी तरह से असंभावना को उजागर किया। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि याचिकाकर्ता ने दिल्ली पुलिस को पार्लियामेंट स्ट्रीट थाना कांड संख्या 27/2022 की जांच के दौरान उसके पति के कार्यालय में तोड़फोड़ करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह आरोप पूरी तरह से सुदूर और काल्पनिक है, क्योंकि दिल्ली पुलिस दिल्ली में शुरू हुए एक अलग आपराधिक मामले में अपने स्वतंत्र वैधानिक कर्तव्यों का पालन कर रही थी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने रेखांकित किया कि घटना के समय याचिकाकर्ता न तो घटनास्थल पर उपस्थित थे और न ही पटना में थे। वह बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष के रूप में भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) की नामांकन प्रक्रिया में भाग लेने के लिए मुंबई में मौजूद थे कोर्ट ने नोट किया कि आईपीसी की धारा 384 (संपत्ति देने के लिए किसी व्यक्ति को नुकसान के भय में डालना) के मूल तत्व पूरी तरह से गायब थे, और यह धारा मूल प्राथमिकी का हिस्सा भी नहीं थी। 

निचली अदालत द्वारा जांचे गए गवाह पूरी तरह से मामले से जुड़े/हितबद्ध पक्ष थे 

जस्टिस श्रीवास्तव के निर्णय का एक मुख्य पहलू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 223(1) के प्रावधानों के पूर्ण वैधानिक जनादेश पर केंद्रित था।उमर व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026 INSC 1058) और कुशल कुमार अग्रवाल बनाम प्रवर्तन निदेशालय (2025 SCC OnLine SC 1221) में सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णयों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने जोर दिया कि बीएनएसएस ने शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को नोटिस जारी करने और सुनवाई का अवसर देने का एक महत्वपूर्ण वैधानिक प्रावधान पेश किया है। निचली अदालत से मँगवाई गई स्थिति रिपोर्ट से स्पष्ट रूप से यह सत्यापित हुआ कि 5 मई, 2025 के संज्ञान आदेश से पहले याचिकाकर्ता को कोई नोटिस या समन जारी नहीं किया गया था। जस्टिस श्रीवास्तव ने फैसला सुनाया कि इस अनिवार्य प्रावधान को दरकिनार करना एक "गंभीर त्रुटि" है ,जो प्राकृतिक न्याय और विधायी मंशा पर चोट करती है, जिससे यह आदेश प्रक्रियात्मक अनियमितता के बजाय कानूनी रूप से अमान्य हो जाता है।

फ़ालतू मुकदमों को शुरुआत में ही कुचल दिया जाना चाहिए।

पेप्सी फूड्स लिमिटेड बनाम न्यायिक मजिस्ट्रेट ((1998) 5 SCC 749) और कृष्ण लाल चावला बनाम यूपी राज्य ((2021) 5 SCC 435) के ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए, कोर्ट ने इस बात की कड़ी आलोचना की कि किस तरह विरोधियों को परेशान करने और व्यक्तिगत बदले लेने के लिए आपराधिक कानून मशीनरी का दुरुपयोग किया जाता है। सुब्रत रॉय सहारा बनाम भारत संघ का विस्तृत उल्लेख करते हुए जस्टिस श्रीवास्तव ने दोहराया कि जब कोई निर्दोष नागरिक अर्थहीन आपराधिक मुकदमों के जाल में फंसता है, तो उसे गहरा मानसिक, सामाजिक और वित्तीय कष्ट सहना पड़ता है। हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल (1992 Supp (1) SCC 335) के लैंडमार्क मापदंडों—विशेष रूप से श्रेणियों (1), (5), और (7)—का उपयोग करते हुए, पटना  हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन को आगे बढ़ाने की अनुमति देना अदालत की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग होगा। यह निष्कर्ष निकालते हुए कि इस कार्यवाही को जारी रखने से न्यायिक समय की बर्बादी के अलावा कोई अन्य उद्देश्य पूरा नहीं होगा।जस्टिस श्रीवास्तव ने "...याचिकाकर्ता के खिलाफ पूरी आपराधिक कार्यवाही, जिसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट, प्रथम श्रेणी, पटना द्वारा शिकायत मामला संख्या 15721(C)/2024 के संबंध में पारित आदेश दिनांक 05.05.2025 शामिल है, को एतद्द्वारा रद्द (quash) किया जाता है। तदनुसार, I.A. No. 01 of 2025 के साथ यह वर्तमान आवेदन स्वीकार किया जाता है।"