Bihar Politics:पावर स्टार ने सियासी कुश्ती में फिर कुशवाहा को किया चित , बदला खेल, पवन सिंह ने फिर बढ़ाई उपेंद्र की सियासी मुश्किलें, अब क्या करेंगे

Bihar Politics: बिहार की सियासत में एक बार फिर भोजपुरी के पावर स्टार पवन सिंह की धमाकेदार इंट्री ने राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी गई है। ...

पावर स्टार ने सियासी कुश्ती में फिर कुशवाहा को किया चित- फोटो : social Media

Bihar Politics: बिहार की सियासत में एक बार फिर भोजपुरी के पावर स्टार पवन सिंह की धमाकेदार इंट्री ने  राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज कर दी गई है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार भी असर सीधे उपेन्द्र कुशवाहा की राजनीतिक रणनीति पर पड़ता दिखाई दे रहा है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में काराकाट सीट पर उपेंद्र कुशवाहा की हार के पीछे जिन अहम कारणों का जिक्र हुआ था, उनमें पवन सिंह का नाम प्रमुखता से लिया गया था। अब विधान परिषद चुनाव को लेकर भी एक नया सियासी मोड़ सामने आया है।

सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) को उम्मीद थी कि बिहार सरकार में मंत्री और उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को विधान परिषद की खाली सीटों में से एक पर मौका मिल सकता है। लेकिन भाजपा ने कथित तौर पर दीपक प्रकाश की जगह पवन सिंह को प्राथमिकता देकर पूरे राजनीतिक समीकरण को बदल दिया। इस फैसले ने एनडीए के भीतर नई चर्चाओं और अटकलों को जन्म दे दिया है।

राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि भाजपा ने पहले उपेंद्र कुशवाहा को अपनी पार्टी का भाजपा में विलय करने का प्रस्ताव दिया था। शुरुआती स्तर पर सहमति बनने की खबरें भी आईं, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ सका। इसके बाद से कुशवाहा खेमे की राजनीतिक हैसियत और एनडीए में उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं।दीपक प्रकाश की स्थिति भी राजनीतिक रूप से चुनौतीपूर्ण मानी जा रही है। वे दो बार मंत्री पद की शपथ ले चुके हैं, लेकिन अभी तक न विधानसभा और न ही विधान परिषद के सदस्य हैं। संवैधानिक प्रावधानों के तहत उन्हें निर्धारित समय सीमा के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना होगा, अन्यथा मंत्री पद पर संकट खड़ा हो सकता है।

विश्लेषकों का मानना है कि उपेंद्र कुशवाहा इस समय सियासी दोराहे पर खड़े हैं। एनडीए में बने रहने और अलग राह चुनने दोनों विकल्पों में जोखिम दिखाई दे रहा है। वहीं भाजपा अब कुशवाहा समाज के प्रतिनिधित्व के लिए सम्राट चौधरी को अधिक प्रमुखता देती दिख रही है। ऐसे में आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में नए समीकरण और नई रणनीतियां देखने को मिल सकती हैं।