सखियां सावन बहुत सुहावन... जब मेघ मल्हार बन बरसते हैं और हर बूंद में बहती हो शिवभक्ति की अविरल धार , श्रृंगार-विरह-मिलन के संगीत के राग का मौसम सावन किसके लिए है खास, पढ़िए
Bihar Sawan Festival: आकाश में उमड़ते-घुमड़ते मेघ, धरती पर गिरती रिमझिम फुहारें, वृक्षों पर लौटती हरितिमा और मंदिरों में गूंजता ॐ नमः शिवाय सावन इन सभी अनुभूतियों का समवेत राग है।
Bihar Sawan Festival:सखियां सावन बहुत सुहावन-भोजपुरी के शेक्सपीयर कहे जाने वाले भिखारी ठाकुर की यह पंक्ति केवल सावन के सौंदर्य का वर्णन नहीं करती, बल्कि भारतीय लोकमानस में वर्षा की उस चिरंतन अनुभूति को स्वर देती है, जिसमें प्रकृति, प्रेम, अध्यात्म, विरह, उल्लास और लोकजीवन एकाकार हो जाते हैं। सावन केवल वर्षा का मास नहीं है; यह प्रकृति के पुनः श्रृंगारित होने, धरती के तृप्त होने और मनुष्य के अंतर्मन के नवोन्मेष का काल है। आकाश में उमड़ते-घुमड़ते मेघ, धरती पर गिरती रिमझिम फुहारें, वृक्षों पर लौटती हरितिमा और मंदिरों में गूंजता ॐ नमः शिवाय सावन इन सभी अनुभूतियों का समवेत राग है।
सावन की प्रत्येक बूंद में एक कथा है। कोई बूंद विरहिणी की आंख से छलकी है, कोई मिलन की प्रसन्नता में बरसी है और कोई तपती धरती के अधरों पर अमृत बनकर उतरी है। इसीलिए सावन को आंसुओं की तासीर परखने वाली ऋतु भी कहा जा सकता है। दुःख में बहने वाले आंसू हों अथवा आनंद में छलक उठी आंखें दोनों की स्मृति सावन के मेघों से जुड़ जाती है।
सावन मिलन का भी प्रतीक है और विरह का भी। यह श्रृंगार का भी उत्सव है और साधना का भी। मनुष्य अपने-अपने भाव के अनुसार इसकी अनुभूति करता है। सावन मानो मन की वह भागवत है, जिसे अंतर्मन अपने भीतर पढ़ता है और वह गीतगोविंद है, जिसकी प्रत्येक अष्टपदी पर देह का रोम-रोम पुलकित हो उठता है। वर्षा की झड़ी में गिरती बूंदें केवल धरती को भिगोती नहीं, वे मानो आकाश से उतरती हुई नर्तकियां हैं, जिनकी प्रत्येक थिरकन में प्रकृति का उल्लास छिपा है। भारतीय साहित्य में वर्षा का वर्णन जितना प्राचीन है, उतना ही विराट भी। वैदिक ऋषियों ने वर्षा के देवता पर्जन्य की स्तुति की। उनके लिए वर्षा केवल प्राकृतिक घटना नहीं थी, बल्कि जीवनदायिनी शक्ति थी। वाल्मीकि ने मेघमाला को ऐसी सीढ़ी की कल्पना दी, जिस पर आरोहण करके कुटज और अर्जुन के पुष्पों से सूर्य का अभिनंदन किया जा सकता है। संस्कृत साहित्य में वर्षा का रूप कहीं उन्मत्त है, कहीं करुण, कहीं रतिक्रिया का उद्दीपन और कहीं विरही हृदय का आश्रय। शूद्रक के मृच्छकटिकम्में गरजते मेघ, आंधी और कौंधती विद्युत आकाश की भयावह जम्हाई जैसे प्रतीत होते हैं। भर्तृहरि से जयदेव तक अनेक कवियों ने वर्षा को अपनी-अपनी काव्यदृष्टि से देखा और उसे शब्दों में अमर कर दिया।
कालिदास के मेघदूत में मेघ स्वयं विरही यक्ष की आशा का संवाहक बन जाता है। यक्ष ताजे खिले कुटज पुष्पों का अर्घ्य देकर मेघ का अभिनंदन करता है और उसे अपने संदेश का वाहक बनाता है। यहां मेघ केवल जल का समूह नहीं, बल्कि प्रेम और प्रतीक्षा का दूत है।ऋतुसंहार में कालिदास ने वर्षा के आगमन को ऐसे चित्रित किया है मानो पावस जल-बिंदुओं से परिपूर्ण मेघ रूपी मतवाले हाथी पर आरूढ़ होकर आया हो। विद्युत उसकी पताका है और मेघगर्जन उसका मृदंग। प्रकृति स्वयं जैसे किसी राजकीय विजय-यात्रा के स्वागत में सज उठती है।
निराला के बादल, नागार्जुन का आकाश और अज्ञेय की सावन-रात- सावन ने कवियों की कल्पना को निरंतर उद्वेलित किया। सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने बादलों को आह्वान करते हुए तप्त धरती को शीतलता देने की पुकार लगाई। उनकी दृष्टि में बादल केवल जलद नहीं, परिवर्तन और नवजीवन के अग्रदूत हैं। नागार्जुन की आंखों में घिरते बादल हिमालय की धवल चोटियों और मानसरोवर के स्वर्णिम कमलों पर गिरती शीतल तुहिन-बूंदों का दृश्य रचते हैं। वहीं अज्ञेय की सावन-रात्रि में कोयल और पपीहे की पुकार प्रेम की अंतर्ध्वनि बन जाती है। “रात सावन की, मनभावन की, पिय आवन की”—यह पंक्ति सावन को प्रतीक्षा, प्रेम और मिलन की अनंत आकांक्षा में रूपांतरित कर देती है।
शास्त्रीय साहित्य से निकलकर सावन जब लोकजीवन में उतरता है तो उसका रूप और अधिक आत्मीय हो जाता है। नववधू के हाथों की मेहंदी, हरी चूड़ियों की खनक, पीहर जाने की आकांक्षा, झूले की पेंग और प्रियतम की प्रतीक्षा सब सावन के लोकगीतों में जीवंत हो उठते हैं। सावन में महिलाओं द्वारा हरे वस्त्र धारण करने और हरी चूड़ियां पहनने की परंपरा प्रकृति की हरितिमा से जुड़ी है। मेहंदी भी इस ऋतु का महत्वपूर्ण श्रृंगार है। वर्षा के साथ धरती जिस प्रकार हरित वस्त्र धारण करती है, उसी प्रकार स्त्री भी हरे रंग के माध्यम से प्रकृति के इस नवश्रृंगार में सहभागी बनती है।
लोकगीतों में नववधू अपने प्रिय से मेहंदी लाने का आग्रह करती है। कहीं वह अपने हाथों को मेहंदी से सजाने की आकांक्षा व्यक्त करती है, तो कहीं झूले पर बैठकर सखियों के साथ सावन का उत्सव मनाती है।कजरी, मल्हार, सावन, बारहमासा और अन्य लोकधुनों में वर्षा का जो रस मिलता है, वह भारतीय लोकसंस्कृति की अमूल्य निधि है।
सावन का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पक्ष भगवान शिव से जुड़ा है। इस मास में शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। कहीं कांवरिए गंगाजल लेकर बाबा का अभिषेक करते हैं, कहीं मंदिरों में रुद्राभिषेक होता है और कहीं हर-हर महादेव का घोष वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है।शिव और सावन का संबंध मानो प्रकृति और पुरुष के सनातन संवाद का प्रतीक है। वर्षा धरती को तृप्त करती है और शिवभक्ति मन को। एक ओर मेघ बरसते हैं, दूसरी ओर श्रद्धा। एक ओर खेतों में हरियाली आती है, दूसरी ओर मन में आस्था का अंकुर फूटता है।गीतगोविंद के मंगल श्लोकों पर आधारित चित्रों में वर्षा और प्रेम का अद्भुत सामंजस्य दिखाई देता है। रागमाला चित्रों में राग हिंडोला और वर्षा से संबंधित चित्रांकन में नायिकाओं की विभिन्न भाव-भंगिमाएं रंग और रेखा के माध्यम से अमर हुईं।
सावन इसलिए इतना सुहावन है क्योंकि इसमें धरती का सौंदर्य, आकाश की उदारता, प्रेम की व्याकुलता, विरह की पीड़ा, मिलन की पुलक, लोकगीतों की मधुरता और शिवभक्ति की आध्यात्मिकता सब एक साथ उपस्थित हैं।
जब मेघ घिरते हैं, मयूर नृत्य करते हैं, आम्रवृक्षों पर झूले पड़ते हैं, चूड़ियां खनकती हैं और मंदिरों में ‘हर हर महादेव’ का घोष होता है, तब लगता है कि सावन केवल आकाश से नहीं उतरता वह मन के भीतर भी बरसता है।क्योंकि सावन में केवल वर्षा नहीं होती; स्मृतियां बरसती हैं, संवेदनाएं बरसती हैं, प्रेम बरसता है, भक्ति बरसती है और कभी-कभी आंखों से वह सब भी बरस पड़ता है, जिसे शब्द जीवन भर नहीं कह पाते।इसीलिए भिखारी ठाकुर की लोकवाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है-सखियां सावन बहुत सुहावन....
हीरेश कुमार