Bihar News : अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस को लेकर पटना में ‘हक’ फिल्म की हुई स्क्रीनिंग, दर्शकों को सिनेमाई अनुभव के साथ महिलाओं की स्थिति की मिली जानकारी

PATNA : अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर शनिवार को बिहार राज्य फिल्म विकास व वित्त निगम द्वारा स्थानीय रीजेंट सिनेमा में सुपर्ण वर्मा की फिल्म हक का स्क्रीनिंग किया गया है। जिसमें यह फिल्म दर्शकों को केवल एक सिनेमाई अनुभव से गुजरने के अलावा उस सवाल से भी रूबरू कराया  जो दशकों से भारतीय समाज के भीतर गूंजता रहा है—महिलाओं के अधिकार, गरिमा और न्याय का सवाल। फिल्म के स्क्रीनिंग के बाद दर्शकों से प्रतिक्रिया पुछने पर उन्होंने कहा कि कभी-कभी एक कहानी सिर्फ कहानी नहीं रहती—वह समाज के सामने आईना बन जाती है। निर्देशक सुपर्ण वर्मा की फिल्म ‘हक़ ऐसी ही कहानी लेकर आई है। महिला दिवस के मौके पर फिल्म विकास निगम के प्रबंध निदेशक प्रणव कुमार ने कहा कि अनुसार महिला दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं है। यह उस लंबी यात्रा की याद दिलाता है जिसमें महिलाओं को अपने अधिकार पाने के लिए लगातार संघर्ष करना पड़ा है। फिल्म उद्योग के विकास के माध्यम से फिल्म निगम बिहार के विकास के लिए  प्रतिबद्ध है I 

अधिकार स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं होते

वहीं इस मौके पर फिल्म निगम की महाप्रबंधक रूबी ने कहा कि महिला दिवस पर ‘हक़” की स्क्रीनिंग केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम न होकर एक याद दिलाने वाला क्षण है कि अधिकार कभी भी स्थायी रूप से सुरक्षित नहीं होते। उन्हें हर पीढ़ी को फिर से समझना, बचाना और मजबूत करना पड़ता है। फिल्म निगम के फिल्म सलाहकार अरविंद रंजन दास ने जानकारी दी कि इस फिल्म का चुनाव इसलिए भी खास है क्योंकि फिल्म की लेखिका रेशु नाथ बिहार से हैं और नॉटर डैम की छात्रा रही हैं I पहले जहाँ बिहार में फिल्म की गतिविधियाँ नहीं के बराबर थींI वहीं अब फिल्म निगम लगातार सामाजिक सरोकारों से जुड़ी फिल्मों का निःशुल्क प्रदर्शन तथा राज्य में भारी मात्रा में फिल्मों की शूटिंग को बढ़ावा देकर सिनेमा-संस्कृति एवं बिहार फिल्म उद्योग के विकास में अनवरत कार्य कर रहा है I 

हक फिल्म असली ताकत स्टार की चमक नहीं बल्कि इसकी सच्चाई

फिल्म में यामी गौतम और इमरान हाशमी मुख्य भूमिका में हैं, लेकिन इसकी असली ताकत किसी स्टार की चमक नहीं, बल्कि वह सच्चाई है जिसे यह कहानी सामने लाती है। फिल्म की कहानी 1980 के दशक के भारत की है। कहानी की नायिका शाजिया एक ऐसी महिला है जिसकी दुनिया अचानक तब बिखर जाती है जब उसका पति अब्बास खान, जो पेशे से एक सफल वकील है, दूसरी शादी कर लेता है और उसे तथा उनके तीन बच्चों को छोड़ देता है। जब अब्बास भरण-पोषण देना बंद कर देता है, तब शाजिया एक ऐसा कदम उठाती है जो उस समय की सामाजिक व्यवस्था में असाधारण साहस माना जाता था I वह अदालत का दरवाज़ा खटखटाती है। फिल्म यह सवाल उठाती है कि क्या परंपरा और आस्था के नाम पर महिलाओं के साथ अन्याय को स्वीकार कर लिया जाना चाहिए और क्या कानून का उद्देश्य समाज की कमजोर आवाज़ों को सुरक्षा देना नहीं होना चाहिए?

डेढ़ वर्षों में 40 से अधिक फिल्मों की शूटिंग पूरी

वहीं बिहार राज्य फिल्म विकास एवं वित्त निगम के सशक्त प्रयासों से पिछले डेढ़ वर्षों में बिहार में 40 से अधिक फिल्मों की शूटिंग हुई है और बहुत बड़ी मात्रा में बिहार के कलाकारों और तकनीशियनों को रोजगार मिला है। इसके साथ ही समाज में जागृति लाने वाली फिल्मों के प्रदर्शन, फिल्म निर्माण की शिक्षा और बिहार में फिल्म उद्योग के विकास सम्बन्धी गोष्ठियाँ आयोजित कर बिहार के विकास में सशक्त योगदान दिया जा रहा है।