Shambhu Girls Hostel:सपनों का हॉस्टल बना साजिश का अड्डा, खाकी ने हकीकत से फेरा मुंह, वर्दी का नेरेटीव हुआ तार तार
Shambhu Girls Hostel: पटना के मुन्नाचक इलाके में स्थित शंभू हॉस्टल, जहां सपनों की पढ़ाई होनी थी, वहीं अब सन्नाटा और साज़िश की बू बस गई है।
Shambhu Girls Hostel: पटना के मुन्नाचक इलाके में स्थित शंभू हॉस्टल, जहां सपनों की पढ़ाई होनी थी, वहीं अब सन्नाटा और साज़िश की बू बस गई है। घर से दूर रहकर नीट की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध मौत पर पड़ा परदा अब धीरे-धीरे उठ रहा है। पुलिस की बनाई हुई कहानी पर विज्ञान ने ऐसी चोट मारी है कि पूरा महकमा कटघरे में खड़ा दिख रहा है। पोस्टमार्टम के बाद शनिवार को आई फॉरेंसिक रिपोर्ट ने उस नैरेटिव को तार-तार कर दिया, जिसे महीनों तक सच बताकर परोसा गया। सवाल अब सीधे हैं, तीखे हैं और जवाबदारियों की फेहरिस्त लंबी। सबसे बड़ा सवाल है कि बिहार पुलिस के सबसे बड़े साहब तकनीकी के विशेषज्ञ माने जाते हैं,फिर इतना छीछालेदर होने तक आंख क्यों बंद किए रहे।
6 जनवरी को छात्रा अपने कमरे में बेहोश पाई गई। हॉस्टल के कर्मचारी उसे तीन दिनों तक एक के बाद एक तीन अस्पतालों में घुमाते रहे। डॉक्टर्स की शुरुआती रिपोर्ट में नींद की दवा के ओवरडोज की बात लिखी गई कोमा, इलाज, और फिर 11 जनवरी को मौत। काग़ज़ों में सब कुछ “साफ़-सुथरा” दिखाया गया। मगर हक़ीक़त इतनी सीधी नहीं थी। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, सच की परतें खुलती गईं। रिपोर्ट में यह भी दर्ज हुआ कि छात्रा के शरीर और प्राइवेट पार्ट्स पर चोट के निशान थे। यहीं से कहानी ने करवट ली और पुलिस व डॉक्टरों की लापरवाही की हदें बेनकाब होने लगीं।
6 से 9 जनवरी तक पुलिस का मौके पर न पहुंचना अपने आप में बड़ा सवाल है। शिकायत 9 जनवरी को दर्ज हुई यह दावा किया गया लेकिन उसके बाद भी केस को गंभीरता से नहीं लिया गया। न हॉस्टल सील हुआ, न वह कमरा जहां छात्रा बेहोश मिली थी। न फॉरेंसिक टीम बुलाई गई। तीन दिन अस्पताल में रहने के दौरान भी सबूतों की हिफ़ाज़त नहीं की गई। यह ढिलाई नहीं, तफ्तीश का क़त्ल है।
न्यूज 4नेशन द्वारा लगातार उठाए गए सवालों और FSL रिपोर्ट से हुई फजीहत के बाद आखिरकार पटना पुलिस को हरकत में आना पड़ा। चित्रगुप्तनगर थाना कांड संख्या 14/26 की समीक्षा के बाद दो अधिकारियों अपर थानाध्यक्ष कदमकुआं अवर निरीक्षक हेमंत झा और चित्रगुप्तनगर थानाध्यक्ष अवर निरीक्षक रोशनी कुमारी को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया। मगर निलंबन से सवाल खत्म नहीं होते, बल्कि और गहरे हो जाते हैं।
इसी बीच SIT द्वारा सौंपे गए अधूरे दस्तावेजों ने जांच की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया। AIIMS पटना में गठित विशेष मेडिकल बोर्ड—जिसमें पांच विशेषज्ञ डॉक्टर शामिल हैं तकनीकी कारणों और वैज्ञानिक साक्ष्यों की कमी से किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहा। फॉरेंसिक विभागाध्यक्ष डॉ. विनय कुमार के मुताबिक टीम सक्रिय है, लेकिन बिना पूरे दस्तावेज़ों के सच तक पहुंचना मुश्किल है।
फिर शाम को आया वह झटका, जिसने पूरा शहर हिला दिया। फॉरेंसिक की बायोलॉजिकल रिपोर्ट में छात्रा के अंडरगारमेंट्स में मेल स्पर्म की पुष्टि हुई। यानी पोस्टमार्टम ने जिस यौन उत्पीड़न की आशंका जताई थी, उसे विज्ञान ने मोहर लगा दी। अब सवाल सबसे अहम है वह शख़्स कौन है? और उसे बचाने की कोशिश किस-किस ने की?
डॉक्टरों की भूमिका भी शक के घेरे में है। प्रभात मेमोरियल की महिला डॉक्टर ने ओवरडोज की बात कही, रेप से इनकार किया, लेकिन चोट के निशान भी बताए। अस्पताल के हेड डॉक्टर डॉ. सतीश कुमार ने भी उसी लाइन पर बयान दिया। अगर शुरुआती जांच क्लियर नहीं थी, तो रिपोर्ट रिज़र्व क्यों नहीं रखी गई? चोटों का जवाब किसके पास है?
पुलिसिया अफ़सरों की कड़ी में थाना प्रभारी रोशनी कुमारी, एएसपी अभिनव कुमार और एसपी पूर्वी पटना परिचय कुमार तीनों की भूमिकाएं सवालों में हैं। किसी ने बिना फॉरेंसिक के क्लीन चिट दी, किसी ने बिना पोस्टमार्टम के सुसाइड बता दिया। अब यह महज़ लापरवाही नहीं, बल्कि मिलीभगत की बू देता है।
महिला होते हुए भी महिला के साथ हो रहे अत्याचार की जांच तो दूर थानाप्रभारी रौशनी कुमारी पर परिजनों को धमकाने तक का आरोप है।
पुलिस की यही रिपोर्ट इस केस का आधार बन गई अब सवाल यह है कि पुलिस ने जानकारी मिलने के बाद भी हॉस्टल सील क्यों नहीं किया? हॉस्टल के कमरे से कोई सबूत क्यों नहीं जुटाए गए? फॉरेंसिक टीम को जांच के लिए क्यों नहीं बुलाया गया? हालांकि, पुलिस यह कहकर पल्ला झाड़ रही है कि उन्हें 9 जनवरी को घटना की जानकारी मिली है। यहीं नहीं रोशनी कुमारी पर परिजनों ने धमकी देने का भी आरोप लगाया है।
एएसपी ने थाना प्रभारी की रिपोर्ट को ही आधार मान लिया।पूर्व डीजीपी अभनानंद के अनुसार अधिकारी का काम सुपरविजन करना है। अगर एएसपी चाहते तो जांच कर सकते थे कि थाना प्रभारी की रिपोर्ट में कोई छूट तो नहीं रहा। कमरे की फॉरेंसिक जांच करा सकते थे। छात्रा के शरीर पर चोट को लेकर सवाल उठा सकते थे। नए सिरे से जांच करा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया।उन्होंने साफ कह दिया कि बच्ची के साथ सेक्सुअल असॉल्ट नहीं हुआ है उसकी यूरी रिपोर्ट में नींद की दवा का ओवरडोज पाया गया है। एसपी पूर्वी पटना परिचय कुमार ने तो बिना सुपरविजन के बिना पोस्टमार्टम रिपोर्ट के इसे सुसाइड बता दिया। रिपोर्ट को बिना वेरिफाई किए उसपर भरोसा कर लिया। उन्होंने तो नींद की गोली की थ्योरी भी बताई थी।
इस केस में गुनहगार एक नहीं कई हैं। जिन्होंने बेटी को मारा नहीं, लेकिन इंसाफ़ को मारने की पूरी कोशिश की। अब निगाहें पुलिस पर हैं क्या वह सिर्फ़ निलंबन पर रुक जाएगी, या असली मुजरिम तक पहुंचकर इस ज़ख़्मी भरोसे को मरहम देगी? शंभू गर्ल्स हॉस्टल की संचालिका नीलम अग्रवाल कहां है, जिसे चित्रगुप्त नगर की थानाप्रभारी रौशनी कुमारी ने प्रभात हॉस्पीटल से गाड़ी में बैठा कर थाने लाकर छोड़ दिया था। सबसे बड़ा सवाल है कि छात्र के कपड़े पर मिला स्पर्म किसका है। पुलिस के बड़े साहब अब तो लोगों के जख्मों पर मरहम लगाइए, बहुत फजीहत हो चुकी है। आम लोग किस पर भरोसा करें, उम्मीद डगमगा रही है हुजूर....