Tej Pratap Yadav News: नये साल में राबड़ी आवास में तेजप्रताप की एंट्री, 7 माह बाद दिखी पारिवारिक नरमी, क्या पिघल रही है लालू परिवार की जमी बर्फ?
सात महीने पहले जिस तेज प्रताप यादव को पार्टी की तंजीम और परिवार की हदबंदी से बाहर कर दिया गया था, वही तेज प्रताप 1 जनवरी को अचानक 10 सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी आवास पहुंचे और सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी।
Tej Pratap Yadav News: नया साल 2026 का पहला दिन लालू परिवार के लिए सिर्फ कैलेंडर का पन्ना पलटने भर का मौका नहीं था, बल्कि यह दिन जज़्बात, सियासत और रिश्तों की जंग में एक नई करवट लेकर आया। सात महीने पहले जिस तेज प्रताप यादव को पार्टी की तंजीम और परिवार की हदबंदी से बाहर कर दिया गया था, वही तेज प्रताप 1 जनवरी को अचानक 10 सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी आवास पहुंचे और सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी।
मई 2025 में अनुष्का यादव के साथ वायरल तस्वीरों ने राजद की राजनीति में भूचाल ला दिया था। लालू प्रसाद यादव ने बिना लाग-लपेट के फरमान सुनाया-“निजी जिंदगी अपनी जगह, पार्टी की इज्जत अपनी जगह।” नतीजा यह हुआ कि तेज प्रताप को छह साल के लिए आरजेडी से निष्कासित कर दिया गया और राबड़ी आवास छोड़ने का हुक्म भी दे दिया गया। तेजस्वी यादव ने भी इस फैसले पर मुहर लगाई। इसके बाद तेज प्रताप के सोशल मीडिया पोस्टों में दर्द, तन्हाई और बगावत की झलक साफ दिखी।
लेकिन 1 जनवरी 2026 को तस्वीर बदली-बदली नजर आई। राबड़ी देवी के जन्मदिन पर तेज प्रताप बिना किसी शोर-शराबे के आवास पहुंचे। न लालू यादव मौजूद थे, न तेजस्वी यादव, न ही पार्टी का कोई बड़ा चेहरा। मां और बेटे ने साथ बैठकर केक काटा। यह पल सियासी नहीं, पूरी तरह जज़्बाती था-कम से कम तस्वीरों में तो यही संदेश गया।
तेज प्रताप ने बाद में मीडिया से कहा कि वे सिर्फ मां से मिलने आए थे। मां के जिक्र पर उनकी आवाज़ भर आई। फेसबुक पोस्ट में उन्होंने मां को “परिवार की आत्मा” बताया और लिखा कि जब ईश्वर हर जगह नहीं हो सकता, तब वह मां को भेज देता है। यह बयान सिर्फ बेटे का नहीं, बल्कि एक ऐसे सियासतदान का था जो सत्ता और संगठन से दूर होकर रिश्तों की गर्माहट तलाश रहा है।
इस पूरे घटनाक्रम में राजनीति की खामोशियां भी बहुत कुछ कहती हैं। पिता दिल्ली में हैं, भाई विदेश में। सवाल यह नहीं कि तेज प्रताप घर आए, सवाल यह है कि क्या यह मुलाकात आने वाले दिनों में लालू परिवार की सियासत में सुलह की इबारत लिखेगी, या फिर यह सिर्फ मां-बेटे के रिश्ते तक सीमित एक भावुक वाकया बनकर रह जाएगी? बिहार की राजनीति फिलहाल इसी सवाल का जवाब ढूंढ रही है।