Bihar Politics : दो निर्दलीयों की BJP में एंट्री से NDA में सियासी भूचाल! जेडीयू को हराने वाले बने बीजेपी के साथी, गठबंधन धर्म की उड़ी धज्जियां!

Bihar Politics : बिहार विधान परिषद चुनाव के परिणामों के ठीक बाद राज्य की राजनीति में एक ऐसा बड़ा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने एनडीए के भीतर राजनीतिक भरोसे और गठबंधन धर्म पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

गठबंधन धर्म की उड़ी धज्जियां!- फोटो : SOCIAL MEDIA

PATNA : बिहार विधान परिषद चुनाव के नतीजों के बाद अब राज्य की राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने एनडीए के भीतर गठबंधन धर्म और सहयोगी दलों के बीच राजनीतिक भरोसे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। चुनाव में जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के उम्मीदवारों को शिकस्त देकर निर्दलीय विधान पार्षद बने राहुल राज और बंशीधर ब्रजवासी शनिवार को भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हो गए। दोनों नेताओं की बीजेपी में एंट्री को महज पार्टी विस्तार की सामान्य घटना मानना मुश्किल है। इसकी वजह यह है कि दोनों ने हाल ही में हुए विधान परिषद चुनाव में एनडीए के सहयोगी दल जेडीयू के उम्मीदवारों को हराकर जीत दर्ज की थी। अब चुनाव के कुछ ही दिनों बाद दोनों का बीजेपी में शामिल होना बिहार के सियासी गलियारों में नई चर्चा को जन्म दे रहा है। 

जेडीयू को हराने वालों को बीजेपी ने दिया सियासी सम्मान?

तिरहुत स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से बंशीधर ब्रजवासी ने जेडीयू के अभिषेक झा को पराजित किया था। वहीं सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से राहुल राज ने जेडीयू उम्मीदवार आनंद पुष्कर को शिकस्त दी थी। इन दोनों सीटों पर एनडीए के सहयोगी दल जेडीयू के उम्मीदवार मैदान में थे। लेकिन निर्दलीय प्रत्याशियों ने गठबंधन के उम्मीदवारों को मात देकर अपनी राजनीतिक ताकत का प्रदर्शन किया।अब दोनों नेताओं का बीजेपी में शामिल होना कई सवाल खड़े कर रहा है। क्या बीजेपी ने जेडीयू के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले नेताओं को अपने संगठन में शामिल कर सहयोगी दल को राजनीतिक संदेश दिया है? क्या यह केवल बीजेपी की संगठन विस्तार की रणनीति है या इसके पीछे बिहार एनडीए के भीतर बदलते राजनीतिक समीकरण भी काम कर रहे हैं?

गठबंधन धर्म की कसौटी पर बीजेपी का फैसला

राजनीतिक गठबंधन केवल चुनावी सीटों के बंटवारे और सत्ता में भागीदारी का नाम नहीं होता। गठबंधन की असली ताकत सहयोगी दलों के बीच आपसी सम्मान, विश्वास और राजनीतिक मर्यादा में होती है। जब एक गठबंधन का सहयोगी दल किसी सीट पर अपना उम्मीदवार उतारता है और दूसरा सहयोगी दल उस उम्मीदवार को समर्थन देता है, तो गठबंधन की जिम्मेदारी केवल चुनाव तक सीमित नहीं रह जाती। ऐसे में जेडीयू उम्मीदवारों को हराने वाले नेताओं को बीजेपी में शामिल करना गठबंधन की राजनीतिक मर्यादा के लिहाज से सवालों के घेरे में आ सकता है। हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि दोनों नेता निर्दलीय चुनाव लड़े थे और उनकी बीजेपी में शामिल होने की अपनी राजनीतिक परिस्थितियां हैं। इसलिए इस घटनाक्रम को सीधे गठबंधन टूटने का प्रमाण नहीं कहा जा सकता।

क्या जेडीयू के राजनीतिक प्रभाव को कमजोर करने की कोशिश?

बिहार में बीजेपी और जेडीयू लंबे समय से सत्ता के साझेदार रहे हैं। दोनों दलों के बीच राजनीतिक संबंधों में उतार-चढ़ाव भी आते रहे हैं। ऐसे में विधान परिषद चुनाव के बाद बीजेपी का यह कदम राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। खासकर तब, जब चुनाव में जेडीयू को अपेक्षित सफलता नहीं मिली और अब उसके उम्मीदवारों को हराने वाले दोनों निर्दलीय बीजेपी के साथ आ गए हैं। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बीजेपी बिहार में अपने राजनीतिक प्रभाव को बढ़ाने के साथ-साथ सहयोगी दलों के मुकाबले अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहती है?

एनडीए टूटने का खतरा या बीजेपी की रणनीतिक बढ़त?

दो निर्दलीय विधान पार्षदों का बीजेपी में शामिल होना एनडीए के भीतर राजनीतिक असहजता पैदा कर सकता है। लेकिन इससे तत्काल गठबंधन टूटने का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। राजनीतिक रूप से यह घटनाक्रम बीजेपी के लिए विधान परिषद में संख्या बढ़ाने का अवसर है, जबकि जेडीयू के लिए यह अपने राजनीतिक प्रभाव और गठबंधन में अपनी भूमिका पर विचार करने का संकेत हो सकता है। अब सबकी नजर जेडीयू के शीर्ष नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर रहेगी। क्या जेडीयू इस घटनाक्रम को सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया मानकर आगे बढ़ेगी या गठबंधन के भीतर अपनी नाराजगी दर्ज कराएगी?

सबसे बड़ा सवाल: गठबंधन में सहयोगी की हार किसकी जीत?

बिहार की राजनीति में यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ गया है—अगर एनडीए के सहयोगी दल का उम्मीदवार चुनाव में हारता है और उसे हराने वाला निर्दलीय बाद में दूसरे सहयोगी दल में शामिल हो जाता है, तो क्या इसे गठबंधन की सामूहिक जीत माना जाएगा या सहयोगी दल की राजनीतिक हार? बीजेपी के लिए यह संगठनात्मक विस्तार हो सकता है, लेकिन जेडीयू के लिए यह राजनीतिक असहजता का विषय बन सकता है। फिलहाल बिहार एनडीए के टूटने की स्थिति नहीं है, लेकिन गठबंधन के भीतर भरोसे, राजनीतिक मर्यादा और सहयोगी दलों के सम्मान को लेकर सवाल जरूर गहराने लगे हैं। बिहार की राजनीति में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि जेडीयू इस घटनाक्रम पर क्या रुख अपनाती है और बीजेपी-जेडीयू के रिश्तों पर इसका कितना असर पड़ता है।

प्रधान संपादक कौशलेन्द्र प्रियदर्शी की कलम से