Crude Oil Price: कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से OMCs को घाटा, पेट्रोल बेंचमार्क 50 महीने के शिखर पर

Crude Oil Price: भारत के लिए पेट्रोल का इंटरनेशनल बेंचमार्क सितंबर में 133.05 डॉलर प्रति बैरल के 50 महीने के हाई पर पहुंच गया है। महंगे कच्चे तेल से OMCs को पेट्रोल-डीजल बिक्री पर घाटा हो रहा है।

Crude Oil Price:  अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में तेजी का असर भारत पर भी दिखाई देने लगा है। भारत के लिए पेट्रोल का इंटरनेशनल बेंचमार्क प्राइस सितंबर में बढ़कर 133.05 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया है। यह करीब 50 महीनों का सबसे ऊंचा स्तर है। इससे सरकारी तेल कंपनियों पर पेट्रोल और डीजल बेचने में घाटे का दबाव बढ़ गया है।


भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से खरीदता है। ऐसे में दुनिया के बाजार में तेल महंगा होने पर देश की तेल खरीद का खर्च बढ़ जाता है। अगस्त में भारत का कच्चे तेल का आयात 1.901 करोड़ टन रहा था, जो जुलाई के मुकाबले 11 प्रतिशत से ज्यादा कम था। इसके बावजूद ऊंची कीमतों की वजह से आयात बिल पर दबाव बना हुआ है।


अगस्त के मुकाबले पेट्रोल बेंचमार्क 20 फीसदी ज्यादा


आंकड़ों के अनुसार, 1 से 18 सितंबर के बीच भारत के लिए पेट्रोल का रोजाना औसत बेंचमार्क प्राइस अगस्त के औसत 110.87 डॉलर प्रति बैरल से करीब 20 फीसदी ज्यादा रहा। सितंबर में यह कीमत मई के 129.63 डॉलर प्रति बैरल के पिछले ऊंचे स्तर को भी पार कर गई है। मई में घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चार बार बढ़ोतरी की गई थी। डीजल का इंटरनेशनल बेंचमार्क भी तेजी से बढ़ा है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार इसकी औसत कीमत करीब 167.08 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। हालांकि यह अप्रैल 2026 में दर्ज 187.92 डॉलर के स्तर से अभी नीचे है।


कंपनियों को पेट्रोल-डीजल बेचने में नुकसान


अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी के बावजूद घरेलू पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में उसी अनुपात में बदलाव नहीं हुआ है। इससे सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ा है। हालिया आकलनों के मुताबिक कंपनियों को पेट्रोल पर करीब ₹5 प्रति लीटर और डीजल पर करीब ₹20 से ₹23 प्रति लीटर तक का नुकसान हो रहा है। नुकसान का वास्तविक स्तर अंतरराष्ट्रीय कीमत, रिफाइनिंग लागत और कंपनी के खरीद-बिक्री मार्जिन के आधार पर बदल सकता है।


कच्चा तेल महंगा होने की वजह क्या है?


अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में तेजी के पीछे पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई को लेकर बढ़ी चिंता प्रमुख कारण हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से तेल की आवाजाही में रुकावट का खतरा और सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन से जुड़ी दिक्कतों ने बाजार में चिंता बढ़ाई है। इन घटनाओं से दुनिया में तेल की सप्लाई कम होने की आशंका बढ़ी और कीमतों पर दबाव आया।

भारत के लिए इसका असर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की अर्थव्यवस्था आयातित कच्चे तेल पर काफी निर्भर है। तेल महंगा होने से विदेशी मुद्रा में भुगतान बढ़ता है और देश के आयात बिल पर दबाव पड़ता है। अगस्त में भारत का क्रूड ऑयल इंपोर्ट बिल सालाना आधार पर 25.8 फीसदी बढ़कर 16.69 अरब डॉलर हो गया था।


क्या पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ सकते हैं?


फिलहाल घरेलू पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर हैं, लेकिन अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो तेल कंपनियों पर खुदरा कीमतों में बदलाव का दबाव बढ़ सकता है। हालांकि, कीमत बढ़ेगी या नहीं और कब बढ़ेगी, यह सरकार और तेल कंपनियों के फैसलों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगा। इसका असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। कच्चा तेल महंगा होने पर ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ सकती है, जिससे सामान की ढुलाई महंगी होती है। इसका असर खाद्य पदार्थों और रोजमर्रा की दूसरी चीजों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।


महंगे तेल का महंगाई पर असर


भारतीय रिजर्व बैंक के विश्लेषण के अनुसार, अगर कच्चे तेल की कीमत बेसलाइन से 10 फीसदी ज्यादा रहती है और इसका पूरा असर घरेलू कीमतों तक पहुंचता है, तो महंगाई पर करीब 50 बेसिस पॉइंट तक का असर पड़ सकता है। यानी अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों में लगातार तेजी भारत की महंगाई और आर्थिक गतिविधियों दोनों के लिए चुनौती बन सकती है।

इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि पश्चिम एशिया में तनाव कितने समय तक रहता है और अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में सप्लाई की स्थिति कब सामान्य होती है। अगर कीमतों में तेजी लंबे समय तक जारी रहती है, तो भारत में तेल कंपनियों के घाटे और महंगाई दोनों पर दबाव बढ़ सकता है।