27 हजार में बिकती है 3 हजार की दवा ... दवा की कीमतों में 10 गुना के खेल पर भड़का सुप्रीम कोर्ट

पीठ के सामने उदाहरण रखा गया कि 22,437 रुपये MRP वाली एक इंजेक्शन की कीमत रिटेलर के लिए करीब 3,520 रुपये है। इसी तरह करीब 27,000 रुपये MRP वाली कैंसर की दवा का प्राइस-टू-रिटेलर लगभग 3,000 रुपये बताया गया।

Supreme Court - फोटो : news4nation

Supreme Court :  अस्पताल का बिल मरीज के इलाज से ज्यादा उसकी जेब पर भारी पड़ रहा है और दवाओं की कीमतों में भारी अंतर ने सुप्रीम कोर्ट को भी हैरान कर दिया है। मंगलवार को दवाओं की कीमतों पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कीमतों में पारदर्शिता की कमी और MRP तथा वास्तविक खरीद मूल्य के बीच बड़े अंतर पर कड़ी नाराजगी जताई। कोर्ट ने इसे “carnage, plain and simple” यानी बेहद गंभीर स्थिति बताया। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ दवाओं की कीमतों पर सख्त नियंत्रण की मांग वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब दवा की खरीद कीमत और MRP में इतना बड़ा अंतर है तो आखिर यह अतिरिक्त पैसा कहां जा रहा है।


पीठ के सामने उदाहरण रखा गया कि 22,437 रुपये MRP वाली एक इंजेक्शन की कीमत रिटेलर के लिए करीब 3,520 रुपये है। इसी तरह करीब 27,000 रुपये MRP वाली कैंसर की दवा का प्राइस-टू-रिटेलर लगभग 3,000 रुपये बताया गया। इस पर जस्टिस संदीप मेहता ने सवाल किया कि कीमतों के बीच इतना बड़ा अंतर आखिर किसकी जेब में जा रहा है।


अस्पताल की फार्मेसी पर भी सवाल

कोर्ट ने अस्पतालों की इन-हाउस फार्मेसी को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। पीठ ने कहा कि मरीजों को अक्सर अस्पताल की अपनी केमिस्ट से ही दवाएं खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। यदि कोई मरीज बाहर से वही दवा कम कीमत पर खरीदकर लाता है तो उसकी गुणवत्ता पर सवाल उठाए जाने या अस्पताल की ओर से इलाज को लेकर दबाव बनाए जाने की स्थिति पैदा हो सकती है। जस्टिस मेहता ने कहा कि ऐसी स्थिति में मरीज आखिर क्या करे। सुनवाई के दौरान उन्होंने अस्पतालों की कार्यप्रणाली पर भी तीखी टिप्पणी की।


हर दवा पर 16% मार्जिन का सुझाव

पीठ ने यह भी सवाल उठाया कि आवश्यक और गैर-आवश्यक दवाओं के बीच अंतर क्यों रखा जाए और कई दवाओं को Drugs (Prices Control) Order (DPCO) के दायरे से बाहर क्यों रखा गया है। कोर्ट ने सुझाव दिया कि सभी दवाओं पर MRP के स्तर पर 16 प्रतिशत मार्जिन तय करने की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती।


सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार संतुलित समाधान पर विचार करेगी और 16 प्रतिशत की समान सीमा का सुझाव उन्हें तार्किक प्रतीत होता है। अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने मौजूदा नियामक व्यवस्था अदालत के सामने रखी।


कोर्ट ने कहा कि सरकारी योजनाओं के जरिए भुगतान हो या मरीज खुद खर्च करे, अंततः बोझ आम जनता और करदाताओं पर पड़ता है। मामले की अगली सुनवाई अक्टूबर के दूसरे सप्ताह में होगी। इससे पहले भी इसी मामले में कोर्ट दवाओं की कीमतों को लेकर स्थिति को “broad daylight dacoity” और मरीजों के खिलाफ “absolute rampage” जैसी कड़ी टिप्पणियों से संबोधित कर चुका है।