Shardiya Navratri: 215 साल पुराने दस्तावेजों में दर्ज पटना की नगर रक्षिका छोटी पटन देवी मंदिर का क्या है रहस्य, जहां नवरात्र में उमड़ता है आस्था का सैलाब?

Shardiya Navratri: पटना सिटी के सिद्धपीठ में मां भगवती के दर्शन को पहुंचते हैं हजारों श्रद्धालु, फ्रांसिस बुकानन ने 1811-12 के सर्वेक्षण में किया था मंदिर का उल्लेख, राजा मानसिंह से जुड़ी है पुनरुद्धार की मान्यता, माता सती की कथा से भी जुड़ा है धार्

पटना की नगर रक्षिका छोटी पटन देवी - फोटो : X

Shardiya Navratri: शारदीय नवरात्र के पावन अवसर पर राजधानी पटना के मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। इसी धार्मिक उत्साह के बीच पटना सिटी के चौक इलाके में स्थित छोटी पटन देवी मंदिर में भी मां भगवती के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। इस मंदिर की विशेषता केवल इसकी धार्मिक महत्ता नहीं, बल्कि पटना के इतिहास से जुड़ी इसकी प्राचीन पहचान भी है। छोटी पटन देवी को पटना की नगर रक्षिका माना जाता है। मान्यता है कि माता के नाम से ही पटना शहर का नाम पड़ा। हालांकि, शहर के नामकरण को लेकर ऐतिहासिक और भाषाई व्याख्याएं भी मौजूद हैं।

माता सती की कथा से जुड़ा है शक्तिपीठ का महत्व

छोटी पटन देवी मंदिर की धार्मिक महत्ता माता सती से जुड़ी पौराणिक कथा के कारण भी है। मान्यता के अनुसार, राजा दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन नहीं कर पाने पर माता सती ने यज्ञ कुंड में अपने प्राण त्याग दिए थे। इसके बाद भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे।पौराणिक कथा के मुताबिक, सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खंडित किया। मान्यता है कि उनके शरीर के विभिन्न अंग जहां-जहां गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए।

नवरात्र में विशेष पूजा, मां के दर्शन को उमड़ते हैं श्रद्धालु

छोटी पटन देवी मंदिर में नवरात्र के दौरान विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। भक्त मां भगवती के दर्शन कर सुख, समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। स्थानीय धार्मिक परंपराओं में इस मंदिर को सिद्धपीठ का दर्जा प्राप्त है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से मां की आराधना करने पर उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।पटना की सांस्कृतिक पहचान में इस मंदिर का महत्वपूर्ण स्थान है। यहां की पूजा परंपराएं पीढ़ियों से चली आ रही हैं और नवरात्र के दौरान मंदिर परिसर में विशेष धार्मिक उत्साह देखने को मिलता है।

फ्रांसिस बुकानन के दस्तावेजों में मिला मंदिर का उल्लेख

छोटी पटन देवी मंदिर की ऐतिहासिक पहचान का एक महत्वपूर्ण आधार ब्रिटिश काल के सर्वेक्षक फ्रांसिस बुकानन का विवरण है। उन्होंने 1811-12 में पटना क्षेत्र के सर्वेक्षण के दौरान पटन देवी के मंदिरों का उल्लेख किया था। इस ऐतिहासिक संदर्भ से स्पष्ट होता है कि मंदिर की उपस्थिति का लिखित प्रमाण दो शताब्दियों से भी अधिक पुराना है।

बिहार सरकार के पुरातत्व निदेशालय के विवरण के अनुसार, 18वीं और 19वीं सदी के दौरान छोटी पटन देवी को पटना की प्रमुख अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त थी। मंदिर की ऐतिहासिक प्राचीनता को समझने में ऐसे दस्तावेज महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

1958 में सार्वजनिक धार्मिक न्यास के रूप में पंजीकरण

मंदिर के इतिहास से जुड़ा एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य इसके धार्मिक न्यास के रूप में पंजीकरण का है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1958 में छोटी पटन देवी मंदिर को बिहार हिंदू धार्मिक न्यास अधिनियम, 1950 के तहत सार्वजनिक धार्मिक न्यास के रूप में पंजीकृत किया गया था।बिहार राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड से संबंधित 12 मार्च 2024 की अधिसूचना में भी मंदिर के ऐतिहासिक संदर्भ का उल्लेख बताया गया है। इस प्रकार मंदिर की धार्मिक परंपरा के साथ-साथ इसके संस्थागत इतिहास के दस्तावेज भी उपलब्ध हैं।

राजा मानसिंह से जुड़ी है मंदिर के पुनरुद्धार की मान्यता

छोटी पटन देवी मंदिर के इतिहास से जुड़ी एक मान्यता मुगल सम्राट अकबर के सेनापति राजा मानसिंह से संबंधित है। कहा जाता है कि उनके प्रयासों से मंदिर का पुनरुद्धार कराया गया था। हालांकि, इस संबंध में उपलब्ध ऐतिहासिक साक्ष्यों और धार्मिक परंपराओं के बीच अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।मंदिर की प्राचीनता, समय-समय पर हुए इसके पुनरुद्धार और पूजा की निरंतर परंपरा ने इसे पटना की धार्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया है।

माता की पीठ गिरने की मान्यता, भक्तों के लिए सिद्धस्थल

धार्मिक मान्यता के अनुसार, छोटी पटन देवी मंदिर के स्थान पर माता सती की पीठ का हिस्सा गिरा था। इसी विश्वास के कारण श्रद्धालु इस मंदिर को विशेष सिद्धस्थल मानकर मां की आराधना करते हैं। यह मान्यता धार्मिक आस्था का हिस्सा है, जबकि मंदिर की ऐतिहासिक उपस्थिति के लिए फ्रांसिस बुकानन के सर्वेक्षण जैसे दस्तावेज महत्वपूर्ण संदर्भ प्रदान करते हैं।

नवरात्र के दौरान छोटी पटन देवी मंदिर में उमड़ने वाली भीड़ इस बात का प्रमाण है कि पटना की ऐतिहासिक विरासत और धार्मिक परंपराएं आज भी लोगों के जीवन से गहराई से जुड़ी हुई हैं। दो शताब्दियों से अधिक पुराने लिखित उल्लेखों से लेकर आज की पूजा-अर्चना तक, यह मंदिर राजधानी की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है।