Gyanesh Kumar: ECI के दो आयुक्तों की 14 आपत्तियों से बढ़ी हलचल, जानें चुनाव आयोग की ‘स्थापना कुंडली’ क्या कहती है

Gyanesh Kumar: SIR विवाद के बीच चुनाव आयोग के दो आयुक्तों की 14 लिखित आपत्तियों ने बहस बढ़ा दी है। जानें ECI विवाद और उसकी स्थापना कुंडली को लेकर ज्योतिषीय विश्लेषण क्या कहता है।

Gyanesh Kumar:  भारत में चुनाव आयोग और Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज हो रही है। इसी बीच एक खोजी रिपोर्ट में चुनाव आयोग के अंदर दो चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई आपत्तियों का मामला सामने आया है। इसके बाद चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से जुड़े फैसलों पर नए सवाल उठे हैं।


‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की 23 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार आयोग के कुछ फैसलों और आदेशों पर लिखित आपत्ति दर्ज की। रिपोर्ट के मुताबिक, इन आपत्तियों में नए मतदाताओं के पंजीकरण, मतदाता सूची से नाम हटाने, नाम बहाल करने और चुनावी डेटा के प्रबंधन से जुड़े मुद्दे शामिल थे।


हालांकि, चुनाव आयोग ने इस रिपोर्ट के बाद कहा कि आयोग के अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए और अलग-अलग टिप्पणियां निर्णय लेने की सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं।


Form 6 को लेकर भी उठे सवाल


विवाद का एक बड़ा हिस्सा नए मतदाताओं के लिए इस्तेमाल होने वाले Form 6 से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई 2026 में ऑनलाइन Form 6 में SIR से जुड़ी एक अतिरिक्त घोषणा दिखाई दी। इसमें नए मतदाता से पूछा गया कि उसका नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पिछली SIR की मतदाता सूची में था या नहीं।


इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई में इस पर आपत्ति दर्ज की थी। उनका कहना था कि Form 6 एक वैधानिक फॉर्म है और इसमें बदलाव के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में बदलाव की जरूरत होगी। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू ने भी बाद में इस आपत्ति का समर्थन किया था।


इस मामले में यह अंतर महत्वपूर्ण है कि यह रिपोर्ट दो चुनाव आयुक्तों की आपत्ति को दर्ज करती है। इससे यह अपने आप कानूनी रूप से साबित नहीं होता कि बदलाव अदालत या किसी सक्षम संस्था द्वारा अवैध घोषित किया जा चुका है।


SIR को लेकर विपक्ष के सवाल


बिहार से जून 2025 में शुरू हुई SIR प्रक्रिया को बाद में कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों तक बढ़ाया गया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, 30 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक नाम हटाए गए थे। यह आंकड़ा ड्राफ्ट रोल में हटाए गए नामों से जुड़ा है और इसे स्थायी रूप से मताधिकार खत्म होने के बराबर नहीं माना जा सकता, क्योंकि कई मामलों में दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया भी चलती है।


SIR को लेकर विपक्षी दलों ने चुनाव आयोग पर सवाल उठाए हैं और आरोप लगाया है कि प्रक्रिया के कारण योग्य मतदाताओं को परेशानी हो सकती है। दूसरी ओर, चुनाव आयोग का पक्ष है कि मतदाता सूची में वास्तविक मतदाताओं की पहचान और सूची को अपडेट करना उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी का हिस्सा है।


सुप्रीम कोर्ट भी बिहार SIR की कानूनी वैधता से जुड़े मामले की सुनवाई कर चुका है। अदालत के आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार, मामले में यह सवाल शामिल था कि चुनाव आयोग को SIR कराने की शक्ति है या नहीं और क्या अपनाई गई प्रक्रिया Representation of the People Act, 1950 और Registration of Electors Rules, 1960 के अनुरूप थी।


चुनाव आयोग की स्थापना कुंडली में क्या कहते हैं ज्योतिषीय संकेत?


ज्योतिषीय दृष्टिकोण से चुनाव आयोग की स्थापना तिथि 25 जनवरी 1950 और स्थान दिल्ली को आधार मानकर तुला लग्न की कुंडली की व्याख्या की जाती है। इस गणना के अनुसार चंद्रमा मीन राशि में स्थित माना गया है।


दिए गए ज्योतिषीय विश्लेषण के मुताबिक, वर्तमान समय में शनि का गोचर चंद्रमा की राशि से हो रहा है। साथ ही कुंडली में गुरु की महादशा और शनि की अंतरदशा को संस्था के लिए दबाव और विवाद का समय माना जा रहा है।


टीएन शेषन के समय को क्यों याद किया जाता है?


ज्योतिषीय विश्लेषण में चुनाव आयोग की स्थापना कुंडली के पिछले दौर की तुलना भी की गई है। इसमें पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के कार्यकाल का विशेष उल्लेख है। शेषन ने 1990 के दशक में चुनाव प्रक्रिया में कई बदलाव लागू किए। उनके कार्यकाल को भारतीय चुनाव व्यवस्था में चुनाव आयोग की भूमिका को मजबूत करने वाले दौर के रूप में व्यापक रूप से याद किया जाता है। इसके बाद एमएस गिल, जेएम लिंगदोह और एसवाई कुरैशी जैसे मुख्य चुनाव आयुक्तों ने भी अलग-अलग समय में चुनाव सुधारों से जुड़े काम किए। ज्योतिषीय विश्लेषण इन घटनाओं को कुंडली में ग्रहों की दशा और स्थिति से जोड़ता है। हालांकि, यह एक ज्योतिषीय व्याख्या है और इसे घटनाओं का प्रमाणित कारण नहीं माना जा सकता।


2023 के कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?


2023 में संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से जुड़ा कानून पारित किया। इसके तहत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं। कानून में चुनाव आयोग के कामकाज और निर्णय प्रक्रिया से जुड़े प्रावधान भी हैं। हालिया विवाद में इसी व्यवस्था और आयोग के भीतर अलग-अलग राय को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज हुई है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपने लिखित नोट में आयोग के सामूहिक निर्णय और संचार प्रक्रिया से जुड़े प्रावधानों का भी हवाला दिया था।


क्या आने वाले समय में बड़ा बदलाव होगा?


दिए गए ज्योतिषीय विश्लेषण में सितंबर 2025 से मार्च 2028 तक गुरु की महादशा में शनि की अंतरदशा को महत्वपूर्ण माना गया है। इसके आधार पर आने वाले समय में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, SIR और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति व्यवस्था से जुड़े बदलावों की संभावना जताई गई है।


ज्योतिषीय गणना में नवंबर के अंत में केतु के गोचर और दशम भाव से जुड़े प्रभावों को भी महत्वपूर्ण बताया गया है। इसी आधार पर मुख्य चुनाव आयुक्त के पद को लेकर बदलाव या इस्तीफे की संभावना का अनुमान लगाया गया है। हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफा देने या किसी निश्चित समय पर पद छोड़ने की बात को तथ्य के रूप में नहीं कहा जा सकता। यह केवल दिए गए ज्योतिषीय विश्लेषण की भविष्यवाणी है। इसी तरह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के नियम या SIR में भविष्य में बदलाव होंगे या नहीं, यह राजनीतिक और कानूनी प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।