Gayaji Pinddan: गयाजी धाम में प्रेत योनि का आध्यात्मिक रहस्य, जीवित रहते हुए होता है आत्म-पिंडदान, भगवान जनार्दन साक्षात् रूप में दाहिने हाथ से पिंड करते हैं स्वीकार,क्या है विधान, पढ़ लीजिए

Gayaji Pinddan: गयाजी की पावन भूमि पर सनातन परंपरा के मध्य एक अत्यंत विस्मयकारी और गूढ़ रहस्य भी छिपा है, जो जीवित मनुष्य द्वारा स्वयं का पिंडदान करने से संबंधित है। ...

गयाजी धाम में प्रेत योनि का आध्यात्मिक रहस्य- फोटो : X

Gayaji Pinddan:  सनातन धर्म की परंपराओं में गयाजी की पावन भूमि का विशेष महात्म्य है। यहाँ पितरों और पूर्वजों के मोक्ष की कामना हेतु पिंडदान करने का विधान सतयुग काल से अनवरत चला आ रहा है। किंतु, इस सनातन परंपरा के मध्य एक अत्यंत विस्मयकारी और गूढ़ रहस्य भी छिपा है, जो जीवित मनुष्य द्वारा स्वयं का पिंडदान करने से संबंधित है। गयाजी के भस्मकूट पर्वत पर स्थित भगवान विष्णु के बाल रूप जनार्दन स्वामी का मंदिर इस दुर्लभ और अलौकिक अनुष्ठान का एकमात्र केंद्र है।

इस प्राचीन विधान के अनुसार, जो भी मनुष्य जीवित रहते हुए अपना आत्म-पिंडदान संपन्न करता है, वह आध्यात्मिक और धार्मिक दृष्टिकोण से संसार की नश्वर बंधनों से मुक्त हो जाता है। इस कृत्य को संपादित करने के पश्चात वह व्यक्ति तकनीकी रूप से जीवित रहते हुए भी प्रेत योनि की स्थिति को प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में उसका इस भौतिक संसार के जीवित जनों से सांसारिक संबंध विच्छेद हो जाता है और वह एक मुक्त आत्मा की भाँति जीवनयापन करता है। यह अनुष्ठान अत्यंत कठोर, गंभीर और जीवन का अंतिम आध्यात्मिक मार्ग माना गया है।

भगवान जनार्दन स्वामी का मंदिर और पौराणिक मान्यताएँ

काल चक्र के परिवर्तन के साथ गयाजी की प्राचीन वेदियां सीमित हो चुकी हैं, किंतु भगवान विश्वकर्मा द्वारा निर्मित यह ऐतिहासिक जनार्दन स्वामी मंदिर आज भी अपनी अलौकिक ऊर्जा के लिए विख्यात है। इस मंदिर की महत्ता इस बात में निहित है कि यहाँ भगवान विष्णु स्वयं बाल रूप में विराजमान हैं। आत्म-पिंडदान के इस अनुष्ठान के दौरान भगवान जनार्दन साक्षात् रूप में उस व्यक्ति के दाहिने हाथ से पिंड को स्वीकार करते हैं। इस प्रकिया में स्वयं भगवान उस साधक के पुत्र या संतान की भूमिका का निर्वहन करते हैं।

यह अनुष्ठान सामान्यत तीन दिवसों में विधिवत रूप से संपन्न किया जाता है।प्रथम दिवस  प्रायश्चित एवं संकल्प का होता है। इस प्रारंभिक चरण में साधक का शुद्धिकरण कर उसे वैष्णव परंपरा में दीक्षित किया जाता है।द्वितीय दिवस अभिषेक एवं पिंडदान का होता है। इस दिन भगवान जनार्दन का अभिषेक करने के उपरांत, दही और अक्षत मिश्रित पिंड को भगवान के दाहिने हाथ में समर्पित किया जाता है। और तीसरे दिवस  महापूजा की जा ती है। इस दिन भगवान गदाधर की महापूजा तथा पूर्णाहुति के साथ यह अनुष्ठान पूर्ण होता है।

आत्म-पिंडदान के कड़े नियम और पूजन सामग्री

इस आत्म-पिंडदान के अनुशासन और नियम अत्यंत कड़े हैं। तीन दिवसीय इस अनुष्ठान में परम पवित्रता का पालन करना अनिवार्य होता है। इस विशिष्ट पूजा में प्रयुक्त होने वाली सामग्री सामान्य श्राद्ध कर्म से भिन्न होती है। इसमें मुख्य रूप से अक्षत, दधि  और कदली फल  का ही प्रयोग किया जाता है। इस अनुष्ठान की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें तिल का प्रयोग सर्वथा वर्जित होता है।

इस प्रकार, गयाजी की इस पावन वेदी पर आत्म-पिंडदान का यह अनुष्ठान मनुष्य को भौतिक मोह-माया से परे ले जाकर एक परम आध्यात्मिक चेतना से जोड़ता है। यह विधान सनातन धर्म के उन गूढ़ सत्यों को उजागर करता है, जिनका अनुभव केवल असीम निष्ठा और श्रद्धा के माध्यम से ही संभव है।

हीरेश कुमार