गजब, कागजों में 22 मेट्रो स्टेशन को मंजूरी, निर्माण के दौरान अधिकारियों ने एक स्टेशन कर दिया गायब, अब कैग मांग रहा हिसाब
लखनऊ मेट्रो के उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर में एक ऐसा 'जादुई' खेल हुआ है, जिसने सीएजी (CAG) के भी होश उड़ा दिए हैं। अधिकारियों ने बिना किसी उच्च स्तरीय अनुमति या प्रस्ताव के, फाइलों से पूरा का पूरा 'महानगर' मेट्रो स्टेशन ही गायब कर दिया
N4N Desk -: लखनऊ मेट्रो के उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर के निर्माण और संचालन में भारी अनियमितताएं सामने आई हैं। शुक्रवार को सदन के पटल पर रखी गई सीएजी (CAG) रिपोर्ट ने खुलासा किया है कि स्वीकृत 22 स्टेशनों में से एक महत्वपूर्ण स्टेशन को बिना अनुमति हटा दिया गया और विवादित जमीन पर डिपो का निर्माण कराया गया।
बिना मंजूरी हटा दिया गया 'महानगर' मेट्रो स्टेशन
सीएजी रिपोर्ट के अनुसार, लखनऊ मेट्रो के उत्तर-दक्षिण कॉरिडोर (22.88 किमी) के लिए कुल 22 स्टेशन स्वीकृत किए गए थे, लेकिन धरातल पर केवल 21 का ही निर्माण हुआ। रिपोर्ट में चौंकाने वाला तथ्य यह है कि 'महानगर मेट्रो स्टेशन' को परियोजना से बाहर करने के लिए केंद्र, राज्य सरकार या किसी संबंधित अथॉरिटी से अनुमति तक नहीं ली गई। डीपीआर (DPR) के दस्तावेजों में इस स्टेशन की स्वीकृति होने के बावजूद इसे बिना किसी आधिकारिक प्रस्ताव के हटा दिया गया।
यात्री क्षमता में दूसरे स्थान पर था यह स्टेशन
रिपोर्ट में इस बात पर विशेष जोर दिया गया है कि जिस महानगर स्टेशन को हटाया गया, वह यात्रियों की संख्या (Footfall) के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण था। 2015 की रिपोर्ट के अनुसार, यह दैनिक यात्री क्षमता में तीसरे और 2020 तक दूसरे स्थान पर होना प्रस्तावित था। बिना किसी तकनीकी या कानूनी कारण के इस स्टेशन को परियोजना से बाहर करने से हजारों दैनिक यात्रियों को मेट्रो सुविधा से वंचित रहना पड़ा है।
विवादित जमीन पर डिपो का अवैध निर्माण
लखनऊ मेट्रो डिपो के निर्माण को लेकर भी वित्तीय नियमों के उल्लंघन की बात सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, डिपो के लिए कुल 25.80 हेक्टेयर भूमि खरीदी गई थी, जिसमें से 1.98 हेक्टेयर जमीन विवादित थी और इसका मामला न्यायालय में विचाराधीन था। इसके बावजूद, नियमों को ताक पर रखकर विवादित भूमि पर डिपो का निर्माण कार्य पूरा कर लिया गया, जो कि गंभीर वित्तीय और कानूनी अनियमितता है।
यात्रियों की सुरक्षा के साथ बड़ा खिलवाड़
सीएजी ने मेट्रो संचालन की सुरक्षा पर भी गंभीर सवाल खड़े किए हैं। मेट्रो परिचालन के लिए 'अंतरिम गति प्रमाण पत्र' अनिवार्य होता है, जिसकी अवधि पांच वर्ष होती है। रिपोर्ट में पाया गया कि पांच साल बीतने के बाद भी इस प्रमाण पत्र का नवीनीकरण (Renewal) नहीं कराया गया। इस लापरवाही के कारण पहियों की घिसावट और आवश्यक तकनीकी एडजस्टमेंट की जांच नहीं हो सकी, जो सीधे तौर पर यात्रियों की जान जोखिम में डालने जैसा है।
शर्तों का उल्लंघन और वित्तीय लापरवाही
भारत सरकार की सैद्धांतिक स्वीकृति के दौरान लखनऊ मेट्रो पर कई शर्तें लागू की गई थीं। इनमें जिला शहरी परिवहन निधि की स्थापना, विज्ञापन व पार्किंग नीति तैयार करना और समय-समय पर किराए का संशोधन शामिल था। सीएजी की जांच में पाया गया कि इनमें से अधिकांश शर्तों का पालन नहीं किया गया। रिपोर्ट के इन खुलासों के बाद अब विपक्षी दल और आम जनता प्रशासन की जवाबदेही पर सवाल उठा रही है।
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