बेगुनाही साबित होते ही दुनिया छोड़ गया 'भ्रष्टाचार' का दाग झेलने वाला सिपाही, ₹20 की झूूठे रिश्वत केस में 28 साल बाद हुए थे बरी

0 रुपये की रिश्वत के आरोप में फंसे कांस्टेबल को 28 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद गुजरात हाईकोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया। लेकिन नियति की विडंबना देखिए—जिस सम्मान को पाने के लिए उन्होंने अपना पूरा करियर और तीन दशक दांव पर लगा दिए, उसे हासिल करने के

बेगुनाही साबित होते ही दुनिया छोड़ गया 'भ्रष्टाचार' का दाग झ

N4N Desk  - अहमदाबाद के एक पुलिस कांस्टेबल के लिए न्याय की जीत ही जीवन का अंतिम पड़ाव साबित हुई। मात्र 20 रुपये की रिश्वत के आरोप में 28 साल तक कोर्ट के चक्कर काटने के बाद, जिस दिन गुजरात हाईकोर्ट ने उन्हें बाइज्जत बरी किया, उसी शाम उनकी सांसें थम गईं। बेगुनाही का प्रमाणपत्र मिलने के चंद घंटों बाद हुई यह मौत न्याय व्यवस्था की सुस्त रफ्तार और एक व्यक्ति के आत्मसम्मान की लंबी जंग की दुखद दास्तां बयां करती है।

28 साल का लंबा इंतज़ार और न्याय की जीत 

मामला साल 1997 का है, जब अहमदाबाद के वेजलपुर इलाके में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने एक जाल बिछाया था। इस दौरान एक पुलिस कांस्टेबल पर मात्र 20 रुपये की रिश्वत लेने का आरोप लगा। ACB ने मामला दर्ज किया और यहीं से शुरू हुआ एक ऐसा कानूनी सफर, जिसने कांस्टेबल के करियर, सामाजिक प्रतिष्ठा और मानसिक शांति को पूरी तरह झकझोर कर रख दिया।

निचली अदालत की सजा और करियर का अंत 

करीब सात साल तक चले मुकदमे के बाद, 2004 में अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोर्ट ने कांस्टेबल को दोषी करार दिया और तीन साल की सजा सुनाई। इस फैसले ने न केवल उनकी वर्दी छीन ली, बल्कि समाज में उनकी छवि पर 'भ्रष्टाचारी' होने का गहरा दाग लगा दिया। अपनी बेगुनाही पर अडिग कांस्टेबल ने हार नहीं मानी और निचली अदालत के इस फैसले को गुजरात हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट में दो दशकों का संघर्ष 

गुजरात हाईकोर्ट में यह कानूनी लड़ाई उम्मीद से कहीं अधिक लंबी चली। अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए कांस्टेबल को 22 साल तक कोर्ट के चक्कर काटने पड़े। युवावस्था में शुरू हुआ यह मामला उनके बुढ़ापे तक खिंच गया। वे हर तारीख पर इस उम्मीद के साथ पहुँचते कि एक दिन उनकी ईमानदारी पर लगा यह कलंक जरूर धुलेगा।

बेगुनाही साबित हुई पर हाथ रही विडंबना 

अंततः, घटना के 28 साल बाद गुजरात हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा है। कोर्ट ने कांस्टेबल को 'बाइज्जत बरी' कर दिया। 28 साल बाद मिले इस फैसले ने यह तो साबित कर दिया कि वे निर्दोष थे, लेकिन इस न्याय ने उनके जीवन के सबसे कीमती तीन दशक और उनकी पूरी कार्यक्षमता पहले ही छीन ली थी।

अंतिम शब्द और आकस्मिक विदाई 

फैसला आने के बाद कांस्टेबल बेहद भावुक थे। वे अपने वकील नितिन गांधी के दफ्तर पहुँचे और भर्राई आँखों से कहा, "मेरे जीवन पर लगा कलंक अब मिट गया है, अब अगर भगवान बुला भी लें तो मुझे गम नहीं।" उनकी यह बात सच साबित हुई। उस शाम जब वे सुकून के साथ घर लौटे, तो कुछ ही घंटों बाद उनकी मृत्यु हो गई। ऐसा लगा मानो वे केवल अपनी बेगुनाही का प्रमाणपत्र सुनने के लिए ही जीवित थे।

न्याय व्यवस्था पर गंभीर सवाल 

यह मामला न्याय में देरी (Justice Delayed) के मुद्दे पर गंभीर बहस छेड़ता है। मात्र 20 रुपये के आरोप को सुलझाने में न्याय तंत्र ने 28 साल लगा दिए। भले ही वे बाइज्जत बरी हुए, लेकिन जिस न्याय ने उनका पूरा जीवन और खुशियाँ छीन लीं, क्या उसे वास्तव में 'न्याय' कहा जा सकता है? यह घटना हमें सोचने पर मजबूर करती है कि व्यवस्था की कछुआ चाल कितनी जिंदगियाँ निगल जाती है।