India Gold Reserves: भारत ने विदेश से वापस मंगाया सोना, RBI के भंडार में घरेलू हिस्सेदारी बढ़ी; जानिए क्या है वजह
India Gold Reserves:सोना केवल गहने बनाने या निवेश करने का जरिया नहीं है, बल्कि किसी देश के केंद्रीय बैंक के लिए एक अहम आरक्षित संपत्ति भी है।
India Gold Reserves: दुनिया की अर्थव्यवस्था में सोने की अहमियत एक बार फिर बढ़ती दिखाई दे रही है। भू-राजनीतिक तनाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता और विदेशी मुद्रा भंडार की सुरक्षा को लेकर कई देशों के केंद्रीय बैंक अपनी स्वर्ण भंडार नीति पर नए सिरे से ध्यान दे रहे हैं। भारत भी इसी व्यापक बदलाव के बीच अपने सोने के घरेलू भंडारण को बढ़ाने के लिए चर्चा में रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक के स्वर्ण भंडार के आंकड़े बताते हैं कि देश के भीतर रखे जाने वाले सोने की मात्रा में उल्लेखनीय बदलाव आया है। सोना केवल गहने बनाने या निवेश करने का जरिया नहीं है, बल्कि किसी देश के केंद्रीय बैंक के लिए एक अहम आरक्षित संपत्ति भी है। आर्थिक संकट, अंतरराष्ट्रीय भुगतान की जरूरत और वित्तीय बाजारों में अस्थिरता के दौर में यह भंडार देश की वित्तीय सुरक्षा को मजबूत करने में मदद कर सकता है। यही वजह है कि दुनिया के कई केंद्रीय बैंक सोने की खरीद, सुरक्षित भंडारण और जरूरत पड़ने पर उसकी उपलब्धता को लेकर अपनी रणनीतियों पर ध्यान दे रहे हैं।
RBI के पास कितना सोना, भारत में कितना और विदेश में कितना?
भारतीय रिजर्व बैंक की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2024 को उसके पास कुल 822.10 टन सोना था। इसमें से 100.28 टन बैंकिंग विभाग की संपत्ति के रूप में भारत में रखा गया था, जबकि 413.79 टन सोना विदेशों में सुरक्षित था। इसके अतिरिक्त 308.03 टन सोना नोट जारी करने के समर्थन में भारत में रखा गया था।इन आंकड़ों को समझने के लिए यह ध्यान रखना जरूरी है कि RBI के स्वर्ण भंडार को अलग-अलग श्रेणियों में दर्ज किया जाता है। इसलिए केवल विदेशों में रखे सोने की मात्रा देखने से भारत के कुल स्वर्ण भंडार की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती।31 मार्च 2026 तक उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, RBI का कुल स्वर्ण भंडार बढ़कर 880.52 टन हो गया था। इसमें 312.32 टन सोना नोट जारी करने के समर्थन में भारत में रखा गया था। वहीं, बैंकिंग विभाग की संपत्ति के रूप में दर्ज 568.20 टन सोने में से 367.73 टन भारत में और 200.47 टन विदेशों में रखा गया था।इस तरह बैंकिंग विभाग की संपत्ति के रूप में दर्ज सोने का घरेलू भंडारण विदेशों में रखे सोने से अधिक हो गया। हालांकि, इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि भारत ने विदेशी वित्तीय संस्थानों पर अपना भरोसा खत्म कर दिया है। स्वर्ण भंडार के आंकड़ों में बदलाव नई खरीद, सोने के भौतिक स्थानांतरण और अन्य लेखांकन संबंधी कारणों से हो सकता है।
भारत ने विदेश में रखा सोना वापस क्यों मंगाया?
विदेशों में सोना रखने के पीछे अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन और सुरक्षित भंडारण जैसे कारण होते हैं। लेकिन जब वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ता है, तब केंद्रीय बैंक यह भी देखते हैं कि संकट के समय उनकी आरक्षित संपत्ति कितनी आसानी से उपलब्ध हो सकती है। भारत में सोने का घरेलू भंडारण बढ़ने से RBI को अपने भौतिक स्वर्ण भंडार पर देश के भीतर अधिक प्रत्यक्ष नियंत्रण मिलता है। मार्च 2026 के आंकड़ों के अनुसार, RBI के कुल 880.52 टन सोने में से 680.05 टन भारत में रखा गया था। यानी कुल भंडार का लगभग 77.2 प्रतिशत घरेलू स्तर पर मौजूद था। हालांकि, सोना देश में वापस लाना और नया सोना खरीदना अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। इसलिए घरेलू भंडारण बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि भारत ने उतनी ही मात्रा में नया सोना खरीदा है।
नीदरलैंड ने भी बदली सोने के भंडारण की रणनीति
विदेशों में रखे सोने के स्थानांतरण का मुद्दा केवल भारत तक सीमित नहीं है। नीदरलैंड के केंद्रीय बैंक ने सितंबर 2026 में बताया कि उसने अपने स्वर्ण भंडार के एक हिस्से को अमेरिका और कनाडा से लंदन स्थानांतरित किया है। इसका उद्देश्य संकट के समय सोने को अधिक आसानी से इस्तेमाल और कारोबार के लिए उपलब्ध कराना तथा भंडारण से जुड़े जोखिमों को अलग-अलग क्षेत्रों में बांटना है। यह उदाहरण बताता है कि केंद्रीय बैंकों की रणनीति हमेशा पूरा सोना अपने देश में रखने तक सीमित नहीं होती। कुछ बैंक घरेलू भंडारण बढ़ाते हैं, जबकि कुछ अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक आसान पहुंच के लिए अपने सोने का स्थान बदलते हैं।
केंद्रीय बैंक सोने को क्यों मानते हैं अहम?
सोने की खासियत यह है कि यह किसी दूसरे देश की सरकार की देनदारी नहीं है। डॉलर या अन्य विदेशी मुद्रा में रखी संपत्ति के विपरीत, इसका अस्तित्व किसी एक सरकार के भुगतान के वादे पर निर्भर नहीं करता। यही वजह है कि केंद्रीय बैंक अपने आरक्षित भंडार में सोने को शामिल करके जोखिम को अलग-अलग संपत्तियों में बांटने की कोशिश करते हैं।हालांकि, सोने की कीमत में भी उतार-चढ़ाव होता है। इसलिए केवल सोना जमा करना किसी देश की अर्थव्यवस्था को सभी तरह के संकटों से सुरक्षित नहीं कर सकता।कुल मिलाकर, भारत में सोने के घरेलू भंडारण का बढ़ता हिस्सा आरक्षित संपत्तियों के प्रबंधन में आए बदलाव को दर्शाता है। लेकिन इसे वैश्विक वित्तीय व्यवस्था से दूरी बनाने के संकेत के रूप में देखना उचित नहीं होगा। असल उद्देश्य सोने की सुरक्षा, उपलब्धता और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय जरूरतों के बीच संतुलन बनाए रखना है।