यूजीसी के बाद केंद्र का एक और झटका, हर साल ऑटोमेटिक बढ़ेगी बिजली की दरें, नई राष्ट्रीय विद्युत नीति हुई पेश

नई विद्युत नीति 2026 का ड्राफ्ट जारी! समय पर टैरिफ तय न होने पर अपने-आप महंगी होगी बिजली। वित्त वर्ष 2026-27 से लागू हो सकती है 'ऑटोमैटिक बढ़ोतरी' की व्यवस्था

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N4N Desk - केंद्र सरकार ने 20 जनवरी 2026 को नई राष्ट्रीय विद्युत नीति (NEP) का ड्राफ्ट पेश किया है. इस नीति का मुख्य उद्देश्य बिजली क्षेत्र को आर्थिक रूप से अधिक टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी बनाना है. इस ड्राफ्ट में एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा गया है कि यदि राज्य बिजली नियामक समय पर टैरिफ आदेश जारी करने में विफल रहते हैं, तो बिजली की दरें हर साल अपने-आप बढ़ जाएंगी. 

क्या है ऑटोमैटिक टैरिफ बढ़ोतरी की व्यवस्था?

नई नीति के अनुसार, यदि राज्य नियामक आयोग समय पर नई बिजली दरें निर्धारित नहीं करता है, तो टैरिफ को सीधे महंगाई सूचकांक (Inflation Index) से जोड़ दिया जाएगा. इसके बाद दरें स्वतः ही बढ़ जाएंगी. सरकार का प्रस्ताव है कि इस नई व्यवस्था को वित्त वर्ष 2026-27 से प्रभावी रूप से लागू किया जाए. 

बदलाव की आवश्यकता और कंपनियों को राहत

विद्युत विभाग से जुड़े अधिकारियों का तर्क है कि नियामक आयोगों द्वारा टैरिफ तय करने में होने वाली देरी बिजली कंपनियों के लिए भारी घाटे का कारण बनती है. यह नया प्रावधान बिजली वितरण कंपनियों को ऐसी देरी से होने वाले नुकसान से अस्थायी राहत प्रदान करने के लिए लाया गया है. इससे कंपनियों की आर्थिक स्थिति में सुधार की उम्मीद जताई जा रही है. 

ऑटोमैटिक बढ़ोतरी के लिए कड़े नियम और शर्तें

बिजली दरों में यह स्वतः बढ़ोतरी बिना किसी शर्त के नहीं होगी. सबसे पहले बिजली कंपनी को नियामक आयोग के पास नई दरें तय करने हेतु आवेदन करना अनिवार्य होगा. यदि कंपनी आवेदन नहीं करती है, तो कीमतें अपने-आप नहीं बढ़ेंगी. इसके अतिरिक्त, यदि कंपनी के आवेदन के 120 दिनों के भीतर आयोग अपना फैसला सुना देता है, तब भी ऑटोमैटिक बढ़ोतरी लागू नहीं होगी. यह व्यवस्था केवल तभी प्रभावी होगी जब आवेदन के बावजूद आयोग 120 दिनों की समय सीमा में कोई आदेश नहीं दे पाता है. 

उपभोक्ता संगठनों द्वारा प्रावधान का कड़ा विरोध

नई नीति के इस ऑटोमैटिक टैरिफ बढ़ोतरी वाले हिस्से का उपभोक्ता संगठनों ने कड़ा विरोध शुरू कर दिया है. संगठनों का आरोप है कि यह नियम नियामक आयोगों की कानूनी शक्तियों को कमजोर करने वाला है. उनका कहना है कि आयोग की औपचारिक मंजूरी के बिना टैरिफ बढ़ाने का रास्ता खोलना सीधे तौर पर उपभोक्ता हितों को नुकसान पहुंचाएगा और उनकी जेब पर अतिरिक्त बोझ डालेगा