बिहार का पैसा, राजस्थान का विकास: बांका में 'स्वच्छ भारत' के नाम पर करोड़ों की लूट का महाखुलासा!
बिहार के बांका जिले के बौसी नगर पंचायत में हुए एक बड़े भ्रष्टाचार और घोटाले का विश्लेषण करता है। इसमें बताया गया है कि कैसे स्वच्छ भारत मिशन के तहत सरकारी पैसे की बंदरबांट की जा रही है।
बिहार के बांका जिले की बौसी नगर पंचायत में भ्रष्टाचार का एक बड़ा मामला सामने आया है, जहाँ स्वच्छ भारत मिशन के नाम पर 6 करोड़ 84 लाख रुपये की सरकारी राशि का गबन करने का आरोप है। रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों ने ठेकेदार से मिलीभगत कर बिहार की स्थानीय कंपनियों को तकनीकी कारणों का हवाला देकर टेंडर से बाहर कर दिया। सारा काम राजस्थान की कंपनियों को सौंप दिया। यह घोटाला न केवल विकास कार्यों की गुणवत्ता पर सवाल उठाता है, बल्कि सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी उजागर करता है।
राजस्थान की कंपनियों पर विशेष मेहरबानी
इस पूरे प्रकरण में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि टेंडर पाने वाली तीनों मुख्य एजेंसियां—सिद्रा सिस्टम, जे इंडस्ट्रीज और पीएस उद्योग—राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले से ताल्लुक रखती हैं। स्थानीय ठेकेदारों का आरोप है कि टेंडर की शर्तें जानबूझकर ऐसी बनाई गईं जिससे बिहार के लोग इसमें टिक ही न सकें। यहाँ तक कि बिहार सरकार को मिलने वाला GST राजस्व भी इन बाहरी कंपनियों के कारण राजस्थान चला गया, जिससे राज्य की अर्थव्यवस्था को दोहरा नुकसान हुआ है।
कौड़ियों के भाव मिलने वाला सामान लाखों में खरीदा
भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा सबूत वस्तुओं की खरीद कीमतों में भारी अंतर है। जेम (GeM) पोर्टल पर जो साइनेज बोर्ड ₹3,000 से ₹4,000 में उपलब्ध है, उसे विभाग ने ₹36,950 प्रति पीस की दर से खरीदा है। इसी तरह, ₹2.5 से 03.00 लाख की कीमत वाले बस स्टॉप शेल्टर के लिए ₹12.50 लाख और ₹2.5 लाख वाले झंडा पोल के लिए ₹12.80 लाख प्रति पीस का भुगतान किया गया है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि सरकारी धन की किस तरह से बेरहमी औऱ बेशर्मी से लूट हुई है।
'अनब्रांडेड' सामान के नाम पर गुणवत्ता से समझौता
हैरानी की बात यह है कि टेंडर के दस्तावेजों में जानबूझकर 'नॉन-ब्रांडेड' या 'अनब्रांडेड' सामान की मांग की गई थी। आमतौर पर सरकार गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए ब्रांडेड सामान को प्राथमिकता देती है, लेकिन यहाँ अनब्रांडेड सामान को ब्रांडेड से भी ५ से १० गुना अधिक कीमतों पर खरीदा गया। कटीले तार जैसी साधारण वस्तु, जो बाजार में बहुत सस्ती है, उसके लिए ₹103,500 प्रति मीटर की दर से भुगतान करना भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
यह खुलासा बिहार सरकार के 'सुशासन' और 'स्थानीय रोजगार' के दावों की पोल खोलता है। एक तरफ राज्य सरकार युवाओं को स्वरोजगार के लिए प्रोत्साहित कर रही है, वहीं दूसरी तरफ अधिकारियों द्वारा सरकारी ठेके दूसरे राज्यों के संवेदकों को बांटकर बिहार के ठेकेदारों और मजदूरों को केवल मजदूरी तक सीमित कर दिया गया है। न्यूज रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि ये कंपनियां 'शेल कंपनियां' हो सकती हैं और इसके पीछे किसी बड़े राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण की संभावना है। आज हमने बांका जिले के बौंसी प्रखंड की चर्चा की है जल्द ही हम किसी अन्य जगह पर चल रहे भ्रष्टाचार पर खुलासा करेंगे।