Bihar News : सारण की माटी के लाल: 11 अगस्त 1942 की वह ऐतिहासिक दास्तान, जब 18 वर्ष के राजेंद्र सिंह ने देश के लिए कुर्बान किए अपने प्राण:
Bihar News : नयागांव स्टेशन परिसर स्थित शहीद राजेंद्र सिंह स्मारक स्थल पर उनकी 84वीं पुण्यतिथि श्रद्धापूर्वक मनाई गई।
CHAPRA : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 11 अगस्त का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। सन 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के दौरान ब्रिटिश हुकूमत की गोलियों की परवाह न करते हुए पटना स्थित सचिवालय पर यूनियन जैक उतारकर तिरंगा फहराने वाले सात अमर शहीदों में सारण की माटी के लाल वीर सपूत शहीद राजेंद्र प्रसाद सिंह भी शामिल थे। मंगलवार को नयागांव स्टेशन परिसर स्थित शहीद राजेंद्र सिंह स्मारक स्थल पर उनकी 84वीं पुण्यतिथि श्रद्धापूर्वक मनाई गई। कार्यक्रम का आयोजन सोनपुर भाजपा पश्चिमी मंडल के पूर्व अध्यक्ष विमल कुमार चौरसिया के नेतृत्व में किया गया, जिसमें विभिन्न राजनीतिक दलों के नेताओं, स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ग्रामीणों की गरिमामय मौजूदगी रही।
पुष्पांजलि अर्पित कर अमर शहीद को किया नमन:
स्मारक स्थल पर उपस्थित सभी नेताओं, कार्यकर्ताओं व ग्रामीणों ने बारी- बारी से शहीद राजेंद्र सिंह की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। इस दौरान भारत माता की जय और शहीद राजेंद्र सिंह अमर रहें के नारों से पूरा परिसर गुंजायमान हो उठा। सभा में उपस्थित वक्ताओं ने शहीद राजेंद्र सिंह के जीवन, उनके त्याग और अदम्य साहस पर विस्तार से चर्चा की।
अशोक राजपथ से सचिवालय तक का ऐतिहासिक जुलूस:
शहादत के उस ऐतिहासिक दिन को याद करते हुए भाजपा नेता रवि रंजन सिंह सोनू ने बताया कि शहीद राजेंद्र सिंह का जन्म 5 दिसंबर 1924 को सारण जिले के सोनपुर प्रखंड अंतर्गत बनवारी चक गांव के निवासी शिवनारायण सिंह और माता जीरा देवी के घर हुआ था। अत्यंत कम उम्र में ही वे देश की आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। 11 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी के 'भारत छोड़ो आंदोलन' के आह्वान पर हजारों छात्रों का हुजूम पटना की सड़कों पर उतर आया था। उस सुबह अशोक राजपथ और बांकीपुर इलाका आजादी के दीवानों के गगनभेदी नारों से गूंज रहा था। छात्रों का यह जुलूस पटना सचिवालय की ओर बढ़ रहा था, जहां अंग्रेजी प्रशासन ने मुख्य गेट बंद कर दिए थे। छात्रों को रोकने के लिए घुड़सवार सैनिकों ने उन्हें कुचलने की कोशिश की, लेकिन राष्ट्रभक्ति के जुनून से लबरेज युवा रुकने को तैयार नहीं थे।
छाती पर खाई ब्रिटिश हुकूमत की गोली, पर झुकने न दिया तिरंगा:
स्थिति को अनियंत्रित होते देख तत्कालीन अंग्रेज जिलाधिकारी मिस्टर आर्चर ने निहत्थे छात्रों पर गोली चलाने का क्रूर आदेश दे दिया। सबसे पहले 14 वर्षीय छात्र देवीपद चौधरी को गोली लगी, लेकिन गिरते-गिरते भी उन्होंने तिरंगे को झुकने नहीं दिया और अपने साथियों को सौंप दिया। इसी क्रम में मात्र 18 वर्ष के युवा राजेंद्र सिंह ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए आगे बढ़ कर सीने पर ब्रिटिश शासन की गोली खाई और भारत माता की गोद में सदा के लिए सो गए। पटना सचिवालय के सामने स्थापित 'सात शहीद' की प्रतिमाओं में वे आज भी अमर हैं और देश के हर नागरिक के लिए प्रेरणापुंज बने हुए हैं।
शादी के महज दो महीने बाद ही दे दी प्राणों की आहुति:
शहीद राजेंद्र सिंह के पारिवारिक जीवन का त्याग भी कम अप्रतिम नहीं है। उनका विवाह शहादत से महज दो महीने पहले, 3 मई 1942 को सुरेश देवी के साथ हुआ था। पति की शहादत के बाद उनकी पत्नी सुरेश देवी ने अपनी पूरी जिंदगी अपने अमर पति की यादों के सहारे ही बिता दी। वर्ष 2021 में उनका निधन हुआ।
श्रद्धांजलि सभा में उमड़े स्थानीय जनप्रतिनिधि व ग्रामीण:
इस अवसर पर सारण जिला भाजपा के वरिष्ठ नेता शैलेंद्र सिंह, कृष्णा राम, राजीव कुमार सिंह, मृत्युंजय कुमार सिंह, पूर्व मुखिया प्रतिनिधि मुन्ना मियां, मुकेश कुमार सिंह, मंडल महामंत्री अनिल सिंह, अरुण कुमार सिंह, संतोष पटेल, राजकुमार मांझी, जदयू के वरिष्ठ नेता बिगन सहनी, रसूलपुर सरपंच प्रदीप ठाकुर, पंचायत समिति प्रतिनिधि प्रेम श्रीवास्तव, हरिनारायण सिंह, सुरेश कुमार सिंह, राजद नेता मोहन साह, भाजपा नेता अभय कुमार ओझा, मनोरंजन कुमार पटेल, ठाकुर संजीव सहित भारी संख्या में स्थानीय लोग मौजूद रहे। सभी ने एक स्वर में शहीद राजेंद्र सिंह के पदचिन्हों पर चलने और उनके सपनों का भारत बनाने का संकल्प लिया।
धर्मेंद्र रस्तोगी की रिपोर्ट