Bihar News : गांव में न स्कूल, न आंगनबाड़ी, मां ने समूह से लोन लिया और बहन ने भाई के लिए छोड़ दी थी मेडिकल की तैयारी, कैमूर के भगवती का IIT में हुआ चयन
Bihar News : जिस गांव में आज तक न कोई स्कूल है और न ही आंगनबाड़ी केंद्र, उस गांव के एक अत्यंत गरीब परिवार के बेटे ने देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रौद्योगिकी संस्थान प्रवेश परीक्षा IIT में सफलता हासिल कर इतिहास रच दिया है
KAIMUR : "कौन कहता है आसमां में सुराख हो नहीं सकता, एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो।" महान कवि दुष्यंत कुमार की इन प्रसिद्ध पंक्तियों को कैमूर जिले के भगवानपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत सुदूर पहाड़ी इलाके में बसे जलई बाग गांव के एक होनहार युवक भगवती कुमार उर्फ़ गोलू ने सच कर दिखाया है। बुनियादी सुविधाओं से कोसों दूर, जिस गांव में आज तक न कोई स्कूल है और न ही आंगनबाड़ी केंद्र, उस गांव के एक अत्यंत गरीब परिवार के बेटे ने देश की सबसे प्रतिष्ठित प्रौद्योगिकी संस्थान प्रवेश परीक्षा IIT में सफलता हासिल कर इतिहास रच दिया है। भगवती जलई बाग गांव के इतिहास में पहले इंजीनियर बनने जा रहे हैं, जिससे पूरे क्षेत्र में जश्न का माहौल है। गांव पहुंचने पर महिलाओं ने आरती उतारकर, तिलक लगाकर और पारंपरिक मंगल गीत गाकर इस 'रत्न' का भव्य स्वागत किया।
भगवती की इस ऐतिहासिक सफलता के पीछे उनके पूरे परिवार—माता, पिता और बड़ी बहन—का अटूट संघर्ष और अभूतपूर्व त्याग छिपा है। भगवती के पिता बुटन राम बेंगलुरु की एक निजी कंपनी में बेहद मामूली वेतन पर काम करते हैं। बेटे को देश के शीर्ष संस्थान में पढ़ाने के अपने सपने को जिंदा रखने के लिए वे दो साल तक घर नहीं लौटे और दिन-रात मेहनत कर पैसे घर भेजते रहे। जब कोटा में कोचिंग की भारी-भरकम फीस के सामने पिता की कमाई कम पड़ने लगी, तो मां मीना देवी ने हिम्मत दिखाई। उन्होंने महिला स्वयं सहायता समूह से 1.5 लाख रुपये का कर्ज लेकर बेटे की फीस भरी, जिसका ब्याज वे आज भी चुका रही हैं।
इस पूरी संघर्ष यात्रा में सबसे बड़ा और भावुक करने वाला त्याग भगवती की बड़ी बहन श्रीदेवी ने किया। श्रीदेवी खुद एक होनहार छात्रा हैं और कोटा में रहकर मेडिकल की तैयारी कर रही थीं। लेकिन जब उन्हें अहसास हुआ कि परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी सुदृढ़ नहीं है कि एक साथ दो बच्चों की महंगी कोचिंग का खर्च उठा सके, तो उन्होंने अपने भाई के सपने को टूटने से बचाने के लिए खुद की मेडिकल की पढ़ाई और करियर को बीच में ही कुर्बान कर दिया। वे कोटा से घर लौट आईं और भाई का मनोबल बढ़ाकर उसे पढ़ाई में पूरी तरह से सहयोग किया, जिसका सुखद परिणाम आज सबके सामने है।
भगवती की इस अद्भुत कामयाबी पर उनके दादा शिव मूरत और दादी लाली देवी की आंखों से खुशी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। भावुक होकर उन्होंने बताया कि उनके पोते 'गोलू' को बचपन से ही घर में रखे खराब बिजली के पंखों और इलेक्ट्रॉनिक सामानों को सुधारने व बनाने का बड़ा शौक था। इसी खेल-खेल के शौक से उसके मन में एक दिन बड़ा इंजीनियर बनने का सपना जागा, जो आज आईआईटी में चयन के साथ पूरा हो गया है। बुजुर्ग दादा-दादी ने रूंधे गले से कहा कि उनके बेटे और बहू ने पोते को पढ़ाने के लिए दिन-रात एक कर दिया, और अब उन्हें पूरा भरोसा है कि उनका इंजीनियर पोता उनके घर की पीढ़ियों पुरानी गरीबी को हमेशा के लिए मिटा देगा।
भगवती की प्रारंभिक शिक्षा दूसरे गांवों के स्कूलों में पैदल जाकर हुई। इसके बाद उन्होंने जिला मुख्यालय भभुआ से इंटरमीडिएट (I.Sc) की पढ़ाई पूरी की। उच्च शिक्षा और इंजीनियरिंग की तैयारी के लिए वे पहले पटना गए, लेकिन वहां अनुकूल सफलता न मिलने पर वे देश की कोचिंग कैपिटल कहे जाने वाले राजस्थान के कोटा पहुंचे। कोटा के कड़े कॉम्पिटिशन और सीमित संसाधनों के बीच भगवती ने अपनी एकाग्रता नहीं खोई और कठिन परिश्रम के बल पर आईआईटी में अपनी सीट पक्की कर ली। उनकी यह अद्वितीय सफलता कैमूर के सुदूर ग्रामीण अंचलों में रहने वाले उन हजारों युवाओं के लिए एक मार्गदर्शक प्रेरणा बन गई है जो विपरीत परिस्थितियों में भी बड़े सपने देखने का हौसला रखते हैं।
देवब्रत की रिपोर्ट