Bihar News : मुंगेर में करोड़ों का 'सफेद हाथी' बना विद्युत शवदाह गृह, 10 महीनों में महज 15 दिन हुआ चालू
Bihar News : मुंगेर में करोड़ों की लागत से बना विद्युत् शव दाह गृह अब सफ़ेद हाथी में तब्दील हो गया है. 10 महीनों में यह मात्र 15 दिन ही काम कर सका है.......पढ़िए आगे
MUNGER : मुंगेर के लाल दरवाजा श्मशान घाट पर गंगा स्वच्छता और पर्यावरण संरक्षण के दावों की हवा निकल रही है। 7 अगस्त 2020 को करोड़ों रुपये की भारी-भरकम लागत से जिस विद्युत शवदाह गृह की शुरुआत की गई थी, वह आज अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहा है। विडंबना यह है कि पिछले 10 महीनों के लंबे अंतराल में यह प्लांट मात्र 15 दिनों के लिए ही फंक्शनल रह सका। 16 जनवरी से तकनीकी खराबी और मोटर फेल होने के कारण यह पूरी तरह ठप पड़ा है, जिससे मुंगेर ही नहीं बल्कि पड़ोसी जिलों जमुई, लखीसराय और शेखपुरा से आने वाले लोगों को भारी मानसिक और आर्थिक कष्ट झेलना पड़ रहा है।
खर्च की मार और गंगा पर 'प्रदूषण' का प्रहार
विद्युत शवदाह गृह के बंद होने से लोग खुले में लकड़ी से दाह संस्कार करने को मजबूर हैं। जहां विद्युत शवदाह का शुल्क मात्र 500 रुपये और मुखाग्नि शुल्क 400 रुपये तय है, वहीं लकड़ी से अंतिम संस्कार करने में परिजनों को हजारों रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ रहे हैं। इसके साथ ही, खुले में शव जलाने से निकलने वाला जहरीला धुआं वातावरण को प्रदूषित कर रहा है और दाह संस्कार के अवशेष सीधे गंगा में जाने से 'नमामि गंगे' जैसे अभियानों को गहरा धक्का लग रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि गंगा की धारा दूर चले जाने के कारण लकड़ी ढोकर ले जाना और खराब मौसम में संस्कार करना दूभर हो गया है।
दशकों का इंतजार और 10 कर्मियों की 'निशुल्क' तैनाती
हैरानी की बात यह है कि जिस शवदाह गृह में महीनों से ताला लटका है, वहां नगर निगम ने 10 कर्मियों की फौज तैनात कर रखी है। बिना किसी काम के इन कर्मियों की तैनाती प्रशासन की कार्यशैली पर बड़े सवाल खड़े करती है। वार्ड पार्षद अंशु माला ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह प्रोजेक्ट चालू रहने से ज्यादा बंद रहने के लिए जाना जाता है। उन्होंने मांग की है कि बार-बार मरम्मत के नाम पर खानापूर्ति करने के बजाय अब नई मशीन लगाकर इसका स्थायी समाधान निकाला जाए, ताकि लोगों को इस नारकीय स्थिति से मुक्ति मिल सके।
ऑपरेटर का आश्वासन और जमीनी हकीकत
विद्युत शवदाह गृह के ऑपरेटर रूपेश ने स्वीकार किया कि पिछले 8-9 महीनों में मशीन केवल एक सप्ताह ही चल पाई थी। हालांकि, उन्होंने एक नई उम्मीद जगाते हुए बताया कि अब नया मोटर लगाया जा रहा है और अगले एक सप्ताह के भीतर शवदाह गृह के पुनः शुरू होने की संभावना है। लेकिन स्थानीय नागरिक इस आश्वासन को संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं, क्योंकि पहले भी मरम्मत के नाम पर लाखों रुपये फूंके जा चुके हैं, पर नतीजा सिफर ही रहा है।
प्रशासनिक कुंभकर्णी नींद कब खुलेगी?
सवाल यह उठता है कि जब सरकार पर्यावरण और स्वच्छता को लेकर बड़े-बड़े विज्ञापनों पर खर्च कर रही है, तो जमीन पर करोड़ों के इस प्रोजेक्ट को सुचारू रखने में नगर निगम क्यों विफल है? क्या यह केवल तकनीकी खराबी है या भ्रष्टाचार और लापरवाही का कोई गहरा खेल? मुंगेर की जनता अब खोखले आश्वासनों से ऊब चुकी है और प्रशासन से जवाब मांग रही है कि आखिर कब तक उन्हें अपने परिजनों के अंतिम विदाई के लिए इस कदर जद्दोजहद करनी पड़ेगी।
इम्तियाज़ की रिपोर्ट