Bihar News: हल से कुलपति तक का सफर, पद्मश्री से नवाज़े गए डॉ गोपालजी त्रिवेदी, गांव-खेती-ज्ञान की सियासत का चमकता चेहरा

Bihar News: 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जब भारत सरकार ने पद्म पुरस्कारों का ऐलान किया, तो बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले के एक गांव में जश्न-ए-ख़ुशी की लहर दौड़ गई।

From Plough to VC Padma Shri for Dr Gopalji Trivedi
हल चलाने से कुलपति तक का सफर- फोटो : reporter

Bihar News: 77वें गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर जब भारत सरकार ने पद्म पुरस्कारों का ऐलान किया, तो बिहार के मुजफ्फरपुर ज़िले के एक गांव में जश्न-ए-ख़ुशी की लहर दौड़ गई। बंदरा प्रखंड के मतलूपुर निवासी, कृषि वैज्ञानिक, शिक्षाविद और डॉ राजेंद्र कृषि विश्वविद्यालय पूसा के पूर्व कुलपति डॉ गोपालजी त्रिवेदी को पद्मश्री सम्मान दिए जाने की घोषणा ने न सिर्फ़ उनके गांव, बल्कि पूरे सूबे को गौरवान्वित कर दिया। यह सम्मान किसी सियासी रसूख़ या सत्ता की मेहरबानी का नहीं, बल्कि मिट्टी, मेहनत और मिशनरी सोच का नतीजा है।

96 वर्ष की उम्र में भी डॉ गोपालजी त्रिवेदी कृषि के मैदान में एक जीवंत विचारधारा की तरह खड़े हैं। उनका जीवन इस बात की मिसाल है कि गांव और खेती को केंद्र में रखकर भी राष्ट्र निर्माण की राजनीति की जा सकती है। एक दौर ऐसा भी था जब पिता के निधन के बाद किशोर उम्र में उन्हें हल थामना पड़ा। हालात संगीन थे, मगर हौसले बुलंद। उन्होंने खेत और किताब दोनों से रिश्ता नहीं तोड़ा। यही जज़्बा उन्हें हल चलाने वाले किसान से कृषि वैज्ञानिक और फिर विश्वविद्यालय के कुलपति के ओहदे तक ले गया।

1992 में डॉ राजेंद्र प्रसाद कृषि विश्वविद्यालय पूसा से वाइस चांसलर के पद से रिटायर होने के बाद भी उन्होंने शहर की चकाचौंध को ठुकराया और गांव लौट आए। वहां रहकर उन्होंने किसानों को आधुनिक खेती के गुर सिखाए, नई तकनीकों से रूबरू कराया और साबित किया कि असली विकास की राजनीति गांव की चौपाल से शुरू होती है।

पद्मश्री की घोषणा के बाद मतलूपुर में ढोल-नगाड़ों के साथ खुशियां मनाई जा रही हैं। गांव वालों के लिए यह सिर्फ़ एक सम्मान नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान की तस्दीक है। खुद डॉ त्रिवेदी कहते हैं कि भारत गांव का देश है और कृषि में विकास के बावजूद आज भी कई ख़ामियां हैं। उनके मुताबिक़ उत्पादन, प्रोसेसिंग और मार्केटिंग इन तीनों मोर्चों पर ठोस रणनीति की ज़रूरत है।

सरकार द्वारा मिले सम्मान पर उन्होंने विनम्रता से आभार जताया और कहा कि उन्हें कभी उम्मीद नहीं थी कि उनका नाम पद्मश्री के लिए चुना जाएगा। डॉ गोपालजी त्रिवेदी की कहानी दरअसल उस सियासत की कहानी है, जहां सत्ता नहीं, सेवा सबसे बड़ा पद है।

रिपोर्ट-मणिभूषण शर्मा