बिहार विधानसभा चुनाव रद्द करने की मांग: जीरो पर सिमटने के बाद अब सुप्रीम कोर्ट पहुंची जन सुराज, नीतीश सरकार पर लगाया 'कैश फॉर वोट' का आरोप

बिहार  विधानसभा चुनाव रद्द  करने की मांग: जीरो पर सिमटने के

Patna - इंट्रो: 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में करारी शिकस्त झेलने वाली प्रशांत किशोर की 'जन सुराज' पार्टी ने अब कानूनी मोर्चा खोल दिया है। पार्टी ने नीतीश सरकार पर चुनावी लाभ के लिए सरकारी खजाने के दुरुपयोग का गंभीर आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। 

शून्य पर सिमटने के बाद कानूनी लड़ाई

प्रशांत किशोर की अगुवाई वाली जन सुराज पार्टी ने 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में बेहद आक्रामक तरीके से कदम रखा था। पार्टी ने राज्य की 243 में से 242 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन नतीजों ने सबको चौंका दिया। बड़े-बड़े दावों के बावजूद जन सुराज अपना खाता खोलने में भी नाकाम रही और 'जीरो' पर सिमट गई। अब इसी हार की पृष्ठभूमि में पार्टी ने चुनावी निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। 

मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना पर विवाद

जन सुराज की याचिका का मुख्य आधार नीतीश सरकार की 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' है। पार्टी का आरोप है कि सरकार ने इस कल्याणकारी योजना का इस्तेमाल मतदाताओं को लुभाने के लिए एक हथियार के रूप में किया। याचिका में दावा किया गया है कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग कर 'वोट बैंक' को प्रभावित करने की कोशिश की गई, जिससे नए राजनीतिक दलों को मिलने वाला 'लेवल प्लेइंग फील्ड' खत्म हो गया। 

आचार संहिता के उल्लंघन का गंभीर आरोप

याचिका में सबसे चौंकाने वाला दावा आदर्श आचार संहिता (MCC) के उल्लंघन को लेकर है। जन सुराज का कहना है कि जब राज्य में चुनाव की घोषणा हो चुकी थी और आचार संहिता लागू थी, उस दौरान भी नीतीश सरकार ने न केवल 25-35 लाख महिलाओं के बैंक खातों में 10-10 हजार रुपये ट्रांसफर किए, बल्कि इस योजना में नए लाभार्थियों को भी जोड़ा। पार्टी के अनुसार, चुनाव के बीचों-बीच किया गया यह वित्तीय लेन-देन सीधे तौर पर मतदाताओं को प्रभावित करने की 'गैरकानूनी' कोशिश थी। 

चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल

सुप्रीम कोर्ट में दायर इस याचिका में केवल बिहार सरकार ही नहीं, बल्कि भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को भी कटघरे में खड़ा किया गया है। जन सुराज का तर्क है कि शिकायत के बावजूद आयोग ने इस वित्तीय वितरण को रोकने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए। पार्टी का मानना है कि यदि चुनाव आयोग समय रहते इस पर रोक लगाता, तो चुनावी नतीजे कुछ और हो सकते थे। अब अदालत को यह तय करना है कि क्या यह वितरण वास्तव में एक रूटीन प्रशासनिक कार्य था या चुनावी लाभ की साजिश। 

6 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट में होगी सुनवाई

इस हाई-प्रोफाइल मामले की गंभीरता को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्य कांत ने याचिका को स्वीकार कर लिया है। कोर्ट ने इस मामले को शुक्रवार, 6 फरवरी (कल) को अपनी पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। राजनीतिक विशेषज्ञों की नजर अब शीर्ष अदालत की टिप्पणी पर टिकी है, क्योंकि यह फैसला भविष्य में चुनावों के दौरान घोषित होने वाली कल्याणकारी योजनाओं और आचार संहिता की सीमाएं तय कर सकता है।