Bihar toxic water: बिहार के मुंगेर में जहरीले पानी का कहर, फ्लोराइड से गांव बन रहा अपंगों की बस्ती

Bihar toxic water: बिहार के मुंगेर जिले के दूधपनिया गांव में फ्लोराइड युक्त पानी से लोग विकलांग हो रहे हैं और मौतें हो चुकी हैं। जानिए गांव की भयावह स्थिति।

Bihar toxic water
जहरीले पानी का कहर- फोटो : social media

Bihar toxic water: मध्य प्रदेश के इंदौर की तरह अब बिहार में भी जहरीले पानी का संकट गंभीर रूप लेता जा रहा है। मुंगेर जिले के हवेली खड़गपुर अनुमंडल के दूधपनिया गांव में फ्लोराइड युक्त पानी ने ग्रामीणों की जिंदगी तबाह कर दी है। हालात ऐसे हैं कि इस पानी को पीने से लोग धीरे-धीरे विकलांग हो रहे हैं और बीते एक साल में छह लोगों की मौत भी हो चुकी है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य सरकार को इस गांव में हर घर नल जल योजना तक अस्थायी रूप से रोकनी पड़ी है।

दूधपनिया गांव में हर घर की एक जैसी कहानी

दूधपनिया गांव करीब 50 घरों की आबादी वाला छोटा सा गांव है, लेकिन यहां शायद ही कोई परिवार ऐसा हो जो फ्लोराइड से जुड़ी बीमारी से अछूता हो। वर्षों से गांव के लोग दूषित और जहरीला पानी पीने को मजबूर हैं। मजबूरी इसलिए क्योंकि पीने का कोई दूसरा सुरक्षित स्रोत मौजूद नहीं है। गांव में लगाए गए पुराने और नए चापाकलों का पानी भी फ्लोराइड से भरा हुआ है। ग्रामीण बताते हैं कि जैसे ही लोग इस पानी का नियमित इस्तेमाल करते हैं, कुछ ही महीनों में शरीर जवाब देने लगता है। सबसे पहले पैरों पर असर दिखता है, फिर मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं और हड्डियों में असहनीय दर्द शुरू हो जाता है।

फ्लोराइड से कैसे बिगड़ती है सेहत

ग्रामीणों के अनुभव बताते हैं कि फ्लोराइड से होने वाली बीमारी धीरे-धीरे शरीर को जकड़ लेती है। चलना-फिरना मुश्किल हो जाता है, हड्डियां कमजोर होकर गलने लगती हैं और इंसान पूरी तरह दूसरों पर निर्भर हो जाता है। समय पर इलाज और साफ पानी न मिलने पर यह बीमारी जानलेवा भी साबित हो रही है। पिछले एक वर्ष में गांव के फूलमानी देवी, रमेश मुर्मू, मालती देवी, सलमा देवी, रंगलाल मरांडी और झुमरी देवी की मौत हो चुकी है। इन मौतों ने पूरे गांव को दहशत में डाल दिया है।

मीडिया में मामला आने के बाद हरकत में प्रशासन

जब दूधपनिया गांव की यह स्थिति मीडिया के माध्यम से सामने आई, तब जाकर प्रशासन और सरकार की नींद टूटी। जिला प्रशासन ने फ्लोराइड से मुक्त पानी उपलब्ध कराने के लिए गहरी बोरिंग कर नया चापाकल लगवाया, लेकिन दुर्भाग्यवश उसमें भी फ्लोराइड की मात्रा अधिक पाई गई। नतीजतन उस चापाकल को भी बंद करना पड़ा। इसके बाद नल-जल योजना की टंकी को दुरुस्त कर उसमें फिल्टर लगाया गया। ग्रामीणों को यह सलाह दी गई कि पानी को उबालकर ही इस्तेमाल करें, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि केवल पानी उबालना फ्लोराइड की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।

स्थायी समाधान के बिना नहीं बदलेगी तस्वीर

स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब तक गांव में फ्लोराइड ट्रीटमेंट प्लांट नहीं लगाया जाता, तब तक हालात में कोई बड़ा सुधार संभव नहीं है। फिलहाल ग्रामीण मजबूरी में उसी पानी का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो धीरे-धीरे उन्हें अपंग बना रहा है।स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार प्रशासन ने भरोसा दिलाया है कि जल्द ही दूधपनिया गांव को स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा, लेकिन जमीनी हकीकत अभी भी चिंता बढ़ाने वाली है।