रिश्वतखोर राजस्व कर्मचारियों पर गिरेगी गाज, ट्रैप केस में अब सीधे बर्खास्त होंगे कर्मचारी, प्रधान सचिव ने जारी किया आदेश
बिहार में रिश्वतखोर कर्मचारियों की अब खैर नहीं। राजस्व विभाग ने ट्रैप केस में फंसे हल्का कर्मचारियों को 15 अप्रैल तक सेवा से बर्खास्त करने का कड़ा निर्देश दिया है। जेल में बंद आरोपियों के लिए भी विभाग ने विशेष कार्ययोजना जारी की है।
Patna - : बिहार में भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' की नीति को और कड़ा करते हुए राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग ने रिश्वत लेते रंगे हाथों पकड़े गए कर्मचारियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई का मन बना लिया है। विभाग के प्रधान सचिव सी.के. अनिल ने राज्य के सभी समाहर्ताओं (DM) को पत्र जारी कर निर्देशित किया है कि ट्रैप केस में फंसे हल्का कर्मचारियों पर 15 अप्रैल, 2026 तक अंतिम आदेश पारित कर सूचित करें।
बर्खास्तगी के अलावा और कोई दंड न्यायोचित नहीं
प्रधान सचिव द्वारा जारी मार्गदर्शन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि रिश्वतखोरी के मामलों (Trap Cases) में सेवा से बर्खास्तगी के अलावा और कोई दंड देना न्यायोचित नहीं होगा। हालांकि, समाहर्ताओं को अपने विवेक का इस्तेमाल करने की छूट दी गई है, लेकिन विभाग की मंशा कठोरतम दंड की ओर है। विभागीय मंत्री द्वारा समीक्षा के दौरान यह खेद व्यक्त किया गया कि पटना को छोड़कर अन्य किसी जिले में समाहर्ताओं द्वारा अनुशासनिक प्राधिकार की शक्तियों का उपयोग कर कठोर दंड निर्धारित नहीं किया गया है।
जेल में बंद कर्मचारियों पर भी चलेगी विभागीय कार्रवाई
विभाग ने उन मामलों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए हैं जहाँ आरोपी कर्मचारी वर्तमान में जेल (बेउर जेल या अन्य) में बंद हैं। जेल में बंद कर्मचारियों के विरुद्ध कार्रवाई की प्रक्रिया इस प्रकार होगी:
आरोप-पत्र का तामिला: जेल अधीक्षक के माध्यम से आरोप-पत्र आरोपी तक पहुँचाया जाएगा।
15 दिनों की समय-सीमा: आरोपी कर्मचारी को अपना जवाब जेल अधीक्षक के माध्यम से ही 15 दिनों के भीतर समाहर्ता को देना होगा।
ADM करेंगे सुनवाई: संचालन पदाधिकारी (ADM) आरोपी के लिखित बचाव अभिकथन (Written Statement) पर विचार कर गुण-दोष के आधार पर मुखर आदेश पारित करेंगे।
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पारदर्शिता और 'ईज ऑफ लिविंग' पर जोर
प्रधान सचिव ने अपने आदेश में कहा कि राजस्व प्रशासन में पारदर्शिता और 'ईज ऑफ लिविंग' राज्य सरकार के सात निश्चय योजना का अभिन्न अंग है। ऐसे में हल्का कर्मचारी द्वारा अवैध उगाही करना प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1988 (यथासंशोधित 2018) के तहत एक संज्ञेय और दंडनीय अपराध है। विभाग ने साफ कर दिया है कि भ्रष्टाचार के मामलों में ढिलाई बरतने वाले प्राधिकारियों को अब जवाबदेह बनाया जाएगा।