Bihar School News: मिड-डे मील पर मंडराया रहा बड़ा संकट, दुकानदारों ने राशन देना इस कारण किया किया बंद

Bihar School News: बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 1.10 करोड़ बच्चों के निवाले पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

Bihar School News

Bihar School News: बिहार के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले करीब 1.10 करोड़ बच्चों के निवाले पर बड़ा संकट खड़ा हो गया है। पिछले छह महीने से मिड-डे मील यानी प्रधानमंत्री पोषण योजना के तहत स्कूलों को भोजन सामग्री खरीदने के लिए जरूरी राशि नहीं मिली है। अप्रैल से सितंबर तक प्रधान शिक्षक और हेडमास्टर स्थानीय दुकानदारों से उधार में दाल, तेल, सब्जी, मसाले और दूसरी जरूरी सामग्री खरीदकर बच्चों के लिए खाना बनवाते रहे। अब दुकानदारों का बकाया बढ़कर 1600 करोड़ रुपये से अधिक होने का दावा किया जा रहा है। लिहाजा कई दुकानदारों ने आगे उधार पर राशन देने से साफ इनकार कर दिया है।

इसका असर अब स्कूलों की रसोई तक पहुंच गया है। भागलपुर, सहरसा और पूर्णिया के ग्रामीण इलाकों के कई स्कूलों में मिड-डे मील बनना बंद होने की बात सामने आ रही है। भोजन नहीं मिलने से बच्चों की स्कूल में उपस्थिति पर भी असर पड़ रहा है। जिस योजना का मकसद बच्चों को स्कूल से जोड़ना और उन्हें पौष्टिक भोजन उपलब्ध कराना है, वही योजना अब फंड की कमी और भुगतान में देरी के बीच फंसती दिख रही है।

चावल सरकार देती है, बाकी सामान की जिम्मेदारी स्कूलों पर

सरकारी स्कूलों को भोजन के लिए मुख्य रूप से चावल की आपूर्ति की जाती है। स्कूल स्तर पर भोजन तैयार करने के लिए दाल, तेल, सब्जी, मसाले, ईंधन और अन्य सामग्री स्थानीय दुकानों से खरीदी जाती है। शिक्षकों का आरोप है कि सरकारी चावल की बोरियों में भी निर्धारित मात्रा से कम चावल मिलने की शिकायत रहती है। उनके मुताबिक, 50 किलो की बोरी में करीब 42 किलो चावल ही मिलता है।

कई स्कूलों में हर महीने भोजन तैयार करने पर करीब 15 हजार से 2 लाख रुपये तक का खर्च आने की बात कही जा रही है। शिक्षकों का कहना है कि फंड नहीं मिलने के कारण उन्हें दुकानदारों से उधारी लेनी पड़ रही थी। यहां तक कि कुछ शिक्षक 3300 से 6600 रुपये तक के कमर्शियल सिलेंडर का खर्च अपनी जेब से उठाने को मजबूर हैं। कई जगह गैस की जगह लकड़ी और कोयले से चूल्हा जलाकर भोजन तैयार किया जा रहा है।

78 हजार बैंक खातों के फेर में अटका पैसा

मिड-डे मील के फंड में देरी की एक बड़ी वजह प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव को बताया जा रहा है। केंद्र और राज्य के बीच 60:40 हिस्सेदारी वाली राशि के भुगतान की प्रक्रिया में बदलाव किया जा रहा है। पहले स्कूल स्तर पर शिक्षकों की भूमिका अधिक थी, जबकि अब जिम्मेदारी प्रखंड स्तर के अधिकारियों को देने की प्रक्रिया चल रही है।

बताया जा रहा है कि इस नई व्यवस्था के लिए करीब 78 हजार नए बैंक खाते खोलने की प्रक्रिया के कारण भुगतान अटक गया है। दूसरी तरफ महंगाई बढ़ने के बावजूद भोजन तैयार करने के लिए मिलने वाली सरकारी राशि और वास्तविक खर्च के बीच अंतर भी स्कूलों के लिए परेशानी बढ़ा रहा है।छह महीने तक उधारी के सहारे किसी तरह बच्चों की थाली सजती रही, लेकिन अब 1600 करोड़ रुपये से ज्यादा के कथित बकाये ने व्यवस्था की सांसें रोक दी हैं। अगर जल्द भुगतान नहीं हुआ, तो बिहार के सरकारी स्कूलों में मिड-डे मील की रसोई पर लगी यह आर्थिक तंगी बच्चों की पढ़ाई और उनकी उपस्थिति दोनों पर गहरा असर डाल सकती है।